The ICSE Class 10 Hindi 2026 Question Paper with Solution PDF is available here. The CISCE Hindi exam was scheduled for February 2026, during the Morning Session from 11:00 AM to 2:00 PM.
The paper was moderately difficult, with a strong focus on Sahitya Sagar (prose and poetry) and applied grammar. While the multiple-choice questions (MCQs) and unseen passages were scoring, the detailed long-answer questions on Ekanki Sanchay and the creative essay writing required in-depth analysis and precise vocabulary. Candidates aiming for top-tier results should target a score between 85–95 marks, ensuring they maintain grammatical accuracy and clear handwriting throughout the examination.
ICSE Class 10 Hindi 2026 Question Paper with Solution PDF
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"स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित भोजन, व्यायाम तथा खेलकूद बहुत आवश्यक होता है" इस विषय को आधार बनाते हुए एक लेख लिखिए।
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शीर्षक: स्वस्थ जीवन का राज: संतुलित भोजन, व्यायाम और खेलकूद
मनुष्य का स्वस्थ रहना जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं, जिसके दुष्परिणाम उन्हें बीमारियों के रूप में भुगतने पड़ते हैं। स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और खेलकूद का विशेष महत्व है।
संतुलित भोजन का अर्थ है ऐसा भोजन जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण और जल उचित मात्रा में शामिल हों। हमारे भोजन में अनाज, दालें, हरी सब्जियां, फल, दूध, दही आदि का समावेश होना चाहिए। जंक फूड और तले-भुने खाद्य पदार्थों से दूरी बनानी चाहिए। संतुलित भोजन से शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
व्यायाम शरीर को स्वस्थ रखने का सबसे सरल उपाय है। प्रतिदिन सुबह टहलना, योगासन, प्राणायाम आदि करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। व्यायाम से रक्त संचार सही रहता है, मोटापा नियंत्रित रहता है और मानसिक तनाव कम होता है। नियमित व्यायाम करने वाला व्यक्ति अनेक बीमारियों से दूर रहता है।
खेलकूद भी स्वास्थ्य के लिए उतने ही आवश्यक हैं। खेलने से शरीर का विकास होता है, हड्डियां मजबूत होती हैं और मांसपेशियों का विकास होता है। खेलों से अनुशासन, टीम भावना और नेतृत्व क्षमता का भी विकास होता है। क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, कबड्डी आदि खेल शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास में भी सहायक होते हैं।
आज की युवा पीढ़ी मोबाइल और कंप्यूटर में इतनी व्यस्त हो गई है कि वे खेलकूद और व्यायाम को समय नहीं दे पा रहे हैं। इसका परिणाम मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। हमें अपनी दिनचर्या में व्यायाम और खेलकूद को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।
इस प्रकार, स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और खेलकूद तीनों का संतुलन आवश्यक है। यदि हम इन तीनों पर ध्यान देंगे तो एक स्वस्थ और सुखी जीवन जी सकते हैं। याद रखिए, "पहला सुख निरोगी काया"। Quick Tip: स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित भोजन (पोषक तत्वों का संतुलन), नियमित व्यायाम (योग, प्राणायाम, टहलना) और खेलकूद (शारीरिक विकास, मानसिक विकास) आवश्यक हैं।
पुस्तकालय (Library) का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है। आप अपने विद्यालय के पुस्तकालय में जाकर किस प्रकार की पुस्तकों को पढ़ना पसंद करते हैं। अपनी प्रिय पुस्तक का वर्णन करते हुए लेख लिखिए।
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शीर्षक: पुस्तकालय का महत्व और मेरी प्रिय पुस्तक
पुस्तकालय ज्ञान का भंडार होता है। यह वह स्थान है जहाँ हमें विभिन्न विषयों की पुस्तकें, पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र आदि पढ़ने को मिलते हैं। पुस्तकालय हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हमारे ज्ञान में वृद्धि करता है, हमारी सोच को विस्तार देता है और हमें एक बेहतर इंसान बनाता है।
मैं अपने विद्यालय के पुस्तकालय में नियमित रूप से जाता हूँ। वहाँ का शांत वातावरण पढ़ने के लिए बहुत अनुकूल होता है। पुस्तकालय में विभिन्न प्रकार की पुस्तकें उपलब्ध हैं - विज्ञान, इतिहास, भूगोल, साहित्य, जीवनी, कहानियाँ, कविताएँ आदि। मुझे सबसे अधिक प्रेरणादायक पुस्तकें और जीवनियाँ पढ़ना पसंद है। महापुरुषों के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
मेरी प्रिय पुस्तक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की आत्मकथा "विंग्स ऑफ फायर" है। इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद "अग्नि पंख" भी उपलब्ध है। यह पुस्तक डॉ. कलाम के जीवन संघर्ष और सफलता की कहानी है। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी लगन, मेहनत और ईमानदारी ने उन्हें भारत के राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक बना दिया।
इस पुस्तक में डॉ. कलाम ने अपने बचपन, शिक्षा, वैज्ञानिक यात्रा, अग्नि मिसाइल के विकास और देश के प्रति उनके समर्पण का सुंदर वर्णन किया है। उनके जीवन की घटनाएँ हमें सिखाती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए। उनके विचार - "सपना वह नहीं जो हम सोते समय देखते हैं, सपना वह है जो हमें सोने नहीं देता" - मुझे सदैव प्रेरित करते हैं।
पुस्तकालय से मुझे यह अनमोल पुस्तक पढ़ने का अवसर मिला। इसने मेरे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। मैं अन्य छात्रों को भी पुस्तकालय जाकर अच्छी पुस्तकें पढ़ने की सलाह दूंगा। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं और पुस्तकालय उन मित्रों से मिलने का सबसे अच्छा स्थान। Quick Tip: पुस्तकालय ज्ञान का भंडार है। मेरी प्रिय पुस्तक "विंग्स ऑफ फायर" (डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम) है जो संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी है।
अच्छी संगति हमारे जीवन में अनेक बदलाव ला सकती है। हम अक्सर अपने मित्रों की बातों से प्रभावित होकर उनका अनुकरण (follow) करने लगते हैं। अच्छी संगति के लाभ बताते हुए एक सारपूर्ण लेख लिखिए।
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शीर्षक: अच्छी संगति के लाभ
"संगति का प्रभाव" यह कहावत हम सभी ने सुनी है। व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है। संगति का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छी संगति हमें अच्छा इंसान बनाती है, जबकि बुरी संगति हमें बर्बाद कर सकती है। इसलिए हमें सदैव अच्छी संगति का चयन करना चाहिए।
अच्छी संगति के अनेक लाभ हैं। पहला, अच्छी संगति से हमें सही मार्गदर्शन मिलता है। हमारे मित्र हमें गलत रास्ते पर जाने से रोकते हैं और सही निर्णय लेने में मदद करते हैं। दूसरा, अच्छी संगति में रहने वाले व्यक्ति की आदतें अच्छी होती हैं। वे समय का पालन करते हैं, मेहनती होते हैं और ईमानदारी से अपने कार्य करते हैं। इन अच्छी आदतों का प्रभाव हम पर भी पड़ता है।
तीसरा, अच्छी संगति हमें शिक्षा और ज्ञान के प्रति प्रेरित करती है। अच्छे मित्र मिलकर पढ़ाई करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और नई चीजें सीखते हैं। चौथा, अच्छी संगति से हमारा व्यक्तित्व विकसित होता है। हम अच्छे संस्कार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों को अपनाते हैं। पाँचवाँ, अच्छी संगति में हमें सच्चे मित्र मिलते हैं जो मुसीबत के समय हमारे साथ खड़े रहते हैं।
इतिहास गवाह है कि महापुरुषों की संगति ने अनेक लोगों का जीवन बदल दिया। स्वामी विवेकानंद पर रामकृष्ण परमहंस की संगति का गहरा प्रभाव पड़ा। श्रीरामचंद्र जी ने कहा था - "एक क्षण की संगति भी मनुष्य को अच्छा या बुरा बना सकती है।"
इसके विपरीत, बुरी संगति के दुष्परिणाम भयानक होते हैं। बुरी संगति में व्यक्ति नशा, अपराध, आलस्य और अनैतिक कार्यों की ओर प्रवृत्त हो जाता है। अतः हमें सदैव सजग रहना चाहिए और ऐसे मित्रों का चयन करना चाहिए जो हमें आगे बढ़ाएँ, न कि पीछे खींचें।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि अच्छी संगति जीवन का अनमोल उपहार है। यह हमें सफलता के मार्ग पर ले जाती है और एक सार्थक जीवन जीने में सहायक होती है। इसलिए "कहाँ गए वह लोग, जिनकी संगति में रात कट जाती थी" जैसी संगति की तलाश हमें हमेशा करनी चाहिए। Quick Tip: अच्छी संगति से सही मार्गदर्शन, अच्छी आदतें, ज्ञान में वृद्धि, व्यक्तित्व विकास और सच्चे मित्र मिलते हैं। बुरी संगति से सदा बचना चाहिए।
‘मैंने यह निर्णय लिया कि भविष्य में ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी’ इस वाक्य से अंत करते हुए अपने जीवन की कोई यादगार घटना या मौलिक कहानी लिखिए।
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शीषर्क : जीवन का सबक
बात उस समय की है जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था । परीक्षाएँ िनकट थीं और सभी छात्र किठन
पिरश्रम में लगे हुए थे । मैं भी पढ़ाई कर रहा था, लेिकन मेरा मन पढ़ाई में कम और दोस्तों के साथ
घूमने में अिधक लगता था । मेरे कुछ िमत्र थे जो पढ़ाई में अच्छे नहीं थे, लेिकन समय िबताने में मािहर
थे । उनकी संगित में मैं भी धीरे-धीरे पढ़ाई से दूर होता गया ।
परीक्षा का समय नजदीक आ रहा था, लेिकन मैं ने अभी तक पाठ्यक्रम पू रा नहीं िकया था । िफर भी मुझे
िव⢵ास था िक मैं िकसी तरह परीक्षा पास कर लूँ गा । मैंने रटंत िवद्या का सहारा िलया और िबना समझे
ही कुछ िवषय याद कर िलए ।
परीक्षा का िदन आया । िहंदी का प्र⢳पत्र देखते ही मेरे होश उड़ गए । अिधकांश प्र⢳ ऐसे थे िजन्हें
मैंने ठीक से नहीं पढ़ा था । मैंने उ⢘र िलखने की कोिशश की, लेिकन उ⢘र अधूरे और गलत थे । पिरणाम
आने पर मुझे िहंदी में बहुत कम अंक िमले और समग्र पिरणाम भी संतोषजनक नहीं रहा ।
यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा आघात था । घरवालों ने कु छ नहीं कहा, लेिकन उनकी चुप्पी मु झे और
अिधकव् यिथत कर रही थी । मैं अपने कमरे में बैठकर सोच रहा था िक मैंने िकतनी बड़ी गलती की ।
समय रहते अगर मैंने पढ़ाई परध् यान िदया होता, तो आज यह िदन नहीं देखना पड़ता ।
उस िदन मैंने आत्मिचंतन िकया । मु झे एहसास हुआ िक असफलता का मुख्य कारण मेरी लापरवाही
और गलत संगित थी । मैंने उन िमत्रों से दू री बनानी शुरू की और अपनी पढ़ाई परध् यान केंिद् रत
िकया । अगली परीक्षा में मैं ने िनयिमत पढ़ाई की, समय सारणी बनाकर चला और हर िवषय को गहराई
से समझा ।
इस बार पिरणाम ने मुझे िनराश नहीं िकया । मैंने अच्छे अंक प्रा⢦ िकए और सभी को गौरवािन्वत
िकया । इस अनुभव ने मुझे एक महत्वपू णर् सबक िसखाया - समय का सदुपयोग करना और सही संगित
का चयन करना । आज जब भी मैं उस िदन को याद करता हूँ, तो मन में एक ही बात आती है :
"मैंने यह िनणर्य िलया िक भिवष्य में ऐसी गलती दु बारा नहीं होगी ।" Quick Tip: यह कहानी समय के महत्व, गलत संगति के दुष्प्रभाव और असफलता से सीख लेकर आगे बढ़ने का संदेश देती है। "भविष्य में गलती न दोहराने का निर्णय" आत्मसुधार की प्रेरणा देता है।
नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए और चित्र को आधार बनाकर कोई लेख, घटना अथवा कहानी लिखिए जिसका सीधा व स्पष्ट संबंध चित्र से होना चाहिए।

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शीर्षक: पेड़ के नीचे बैठा लड़का
गर्मी की दोपहर थी। सूरज की तपिश से धरती बेहाल थी। गाँव के बाहर एक घने पेड़ के नीचे दस वर्षीय राजू अकेला बैठा था। उसकी आँखों में उदासी थी और हाथ में एक पुरानी किताब। पास ही उसका छोटा सा बस्ता रखा था जिसमें कुछ किताबें और एक खाली टिफिन बॉक्स था।
राजू के पिता एक मजदूर थे और माँ घरों में काम करती थीं। गर्मी की छुट्टियों में राजू भी काम की तलाश में शहर चला गया था। उसे एक ढाबे पर काम मिल गया। सुबह से रात तक बर्तन धोना, सफाई करना और कभी-कभी खाना परोसना। बदले में उसे खाना मिलता था और कुछ रुपये। वह अपने माता-पिता की मदद करना चाहता था।
आज वह ढाबे से भाग आया था। ढाबे के मालिक ने उसे बिना वजह डांट दिया था। राजू का मन बहुत दुखी था। वह इसी पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगा। उसे अपने स्कूल के दिन याद आ रहे थे - दोस्तों के साथ खेलना, शिक्षक का प्यार, और वह छोटी सी कक्षा जहाँ वह पढ़ता था।
तभी वहाँ से गुजरते हुए एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उसे देखा। उनका नाम शर्मा जी था और वह सेवानिवृत्त शिक्षक थे। उन्होंने राजू के पास आकर पूछा, "बेटा, तुम यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? स्कूल क्यों नहीं जाते?"
राजू ने रुआँसे स्वर में अपनी सारी कहानी बता दी। शर्मा जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने राजू से कहा, "बेटा, पढ़ाई ही वह रास्ता है जो तुम्हें इस गरीबी से निकाल सकता है। मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा। कल से तुम मेरे पास आना।"
राजू को यकीन नहीं हुआ। किसी अनजान व्यक्ति पर विश्वास करना कठिन था। लेकिन शर्मा जी की आँखों में सच्ची ममता थी। अगले दिन राजू शर्मा जी के घर गया। शर्मा जी ने उसे किताबें दीं और पढ़ाना शुरू किया। राजू बहुत होशियार था। उसने जल्द ही सब कुछ सीख लिया।
शर्मा जी ने राजू के माता-पिता से भी बात की और उन्हें समझाया कि बच्चे को स्कूल भेजना जरूरी है। उन्होंने राजू की फीस का भी प्रबंध किया। राजू फिर से स्कूल जाने लगा। वह दिन-रात मेहनत करता। कुछ वर्षों बाद राजू ने परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
आज राजू एक बड़ा अधिकारी है। वह उस पेड़ के पास हर साल जाता है जहाँ उसकी जिंदगी बदल गई थी। वहाँ बैठकर उसे वह दिन याद आते हैं जब वह एक गरीब लड़का था, और कैसे एक दयालु व्यक्ति ने उसकी मदद की। राजू अब कई गरीब बच्चों को पढ़ाता है और उनके सपनों को पंख देता है।
सीख: कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत में ही कोई मदद का हाथ मिल जाता है। हमें उस हाथ को थामना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है जो गरीबी और अंधकार को दूर कर सकता है।
Quick Tip: चित्र में एक पेड़ के नीचे बैठा लड़का दिख रहा है जो गरीबी, संघर्ष और शिक्षा की चाहत का प्रतीक हो सकता है। कहानी में राजू के माध्यम से एक गरीब बच्चे के संघर्ष और एक दयालु व्यक्ति की मदद से उसके जीवन में आए बदलाव को दर्शाया गया है।
आपके इलाके में एक सरकारी पार्क है लेकिन उसका उचित रखरखाव नहीं हो रहा है। पार्क को नियंत्रित करने हेतु तथा उसकी व्यवस्था ठीक करने के लिए नगर पालिका के मुख्य अधिकारी को पत्र लिखिए।
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सेवा में,
मुख्य नगर आयुक्त,
नगर निगम,
[शहर का नाम]।
दिनांक: 25 फरवरी, 2026
विषय: नगर के सरकारी पार्क के रखरखाव हेतु पत्र।
महोदय,
मैं आपके नगर के वार्ड क्रमांक 10 का निवासी हूँ। हमारे इलाके में एक सरकारी पार्क है जिसकी दयनीय स्थिति से सभी निवासी परेशान हैं। इस पार्क का उचित रखरखाव नहीं हो रहा है। यहाँ की बेंचें टूटी हुई हैं, झूले जर्जर हो चुके हैं और चारों ओर कूड़े का ढेर लगा रहता है। रात के समय असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है जिससे आसपास के लोग भयभीत रहते हैं।
बच्चों के खेलने के लिए यह एकमात्र स्थान है, लेकिन वर्तमान स्थिति में वे यहाँ नहीं आ सकते। बुजुर्गों को सुबह-शाम टहलने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं है। पार्क की बदहाली से क्षेत्र की सुंदरता भी खराब हो रही है।
अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि इस पार्क के रखरखाव की ओर ध्यान दिलवाएँ। टूटी बेंचों और झूलों की मरम्मत करवाएँ, सफाई की व्यवस्था करवाएँ और पार्क में नियमित निगरानी हेतु प्रकाश की व्यवस्था करवाएँ। आशा है कि आप इस ओर शीघ्र ध्यान देंगे।
धन्यवाद।
भवदीय,
[आपका नाम]
पता: [आपका पूरा पता]
मोबाइल: [आपका संपर्क नंबर] Quick Tip: सरकारी पार्क के रखरखाव हेतु पत्र में समस्या का स्पष्ट वर्णन, उसके प्रभाव और समाधान के सुझाव शामिल करें। विनम्र भाषा और सटीक विवरण आवश्यक है।
आप अपने परिवार के साथ कोई प्रदर्शनी (Exhibition) या मेला (fair) देखने गए। वहाँ किन-किन वस्तुओं ने आपको आकर्षित किया और आपने क्या मनोरंजन किया और क्या खरीददारी की? इन सभी बातों का वर्णन अपने मित्र को एक पत्र लिखकर कीजिए।
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प्रिय मित्र [मित्र का नाम],
सप्रेम नमस्ते।
आशा है तुम सकुशल होगे। कल हमारे परिवार ने शहर में लगे वार्षिक मेले का आनंद लिया। तुम्हें भी उसकी झलक दिखाने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ।
मेला देखते ही बनता था। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियाँ, झूले, खाने-पीने की दुकानें और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी लगी थी। सबसे पहले हमने झूलों का आनंद लिया। चाइना व्हील और पेंडुलम राइड ने तो रोमांचित कर दिया। छोटे भाई-बहनों के लिए नन्हें झूले भी थे जहाँ वे खूब खेले।
प्रदर्शनी में विभिन्न राज्यों की हस्तकला की वस्तुएँ प्रदर्शित थीं। कश्मीरी शॉल, राजस्थानी जूतियाँ, मधुबनी पेंटिंग और आभूषण देखते ही बनते थे। मुझे हस्तनिर्मित सजावटी वस्तुओं ने विशेष रूप से आकर्षित किया। मैंने अपने कमरे के लिए एक सुंदर सी दीवार घड़ी और माँ के लिए राजस्थानी जूतियाँ खरीदीं।
खाने-पीने का तो कहना ही क्या! गोलगप्पे, पावभाजी, दाल कचौरी, कुल्फी और मलाईदार जलेबियों ने मन मोह लिया। पापा ने सबको हाथों से बनी बाँस की चीज़ें भी दिलवाईं।
शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। लोक नृत्य और संगीत ने समा बाँध दिया। रात लौटते समय लगा कि और भी बहुत कुछ देखना बाकी रह गया। तुम भी अगले साल जरूर आना, साथ में खूब मजा करेंगे।
अपने घर में सबको मेरा प्रणाम कहना।
तुम्हारा मित्र,
[आपका नाम]
पता: [आपका पता] Quick Tip: मेले या प्रदर्शनी का वर्णन करते पत्र में झूलों, प्रदर्शनी वस्तुओं, खरीददारी, खान-पान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जीवंत वर्णन शामिल करें। मित्र को महसूस होना चाहिए कि वह भी वहाँ उपस्थित है।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में दीजिए। उत्तर यथासंभव आपके अपने शब्दों में होने चाहिए: -
राम एक किसान था। वह अपने खेतों में दिन-रात कठोर परिश्रम करता। इस बार उसकी मेहनत और ईश्वर की कृपा से उसके खेतों में इतना अनाज उगा कि उसकी आमदनी से उसकी वर्षों की गरीबी दूर हो गई।
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बारिश के मौसम में उसकी फूस की छत से पानी अंदर टपकता जिससे घर की दीवारें नमी से गल जाती थीं और उसका घर गिर जाया करता था। इस बार हुए धन-लाभ से उसने अपने कच्चे घर की जगह एक नया और पक्का घर बनाने का निश्चय किया।
राम ने घर बनाने के लिए सारा सामान मंगा लिया था। आगे खड़े नीम के पेड़ को कटना शेष रह गया था जिसके कारण घर की नींव खोदना मुश्किल था। उसने पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी लाने अपने बेटे को पड़ोस में भेजा और स्वयं थोड़ा आराम करने के लिए पेड़ की छाया में लेट गया। घर के कारण लेटते ही उसकी आँखें लग गई और वह सपनों की दुनिया में पहुँच गया।
उसने देखा - उसके दादाजी एक पौधा-सा लगा रहे हैं और उसके पिताजी पास खड़े उनकी सहायता कर रहे हैं। एक छोटा-सा बालक उन दोनों के साथ उसकी और खुशी से देख रहा है। यह छोटा बालक उस पेड़ को बहुत देखभाल किया करता था। दिनों में वह पेड़ बड़ा हो गया और उसके तने के आसपास खेलता हुआ वह छोटा बालक बड़ा होने लगा।
दादाजी तो गुजर गए थे परंतु उस पेड़ की गोद में उसे दादाजी की गोद में होने का एहसास होता था।
उसे लगा मानो वे दोनों उससे पूछ रहे हैं - "रामू, क्या तुम भूल गए यह पेड़ केवल पेड़ नहीं, हमारे घर का एक सदस्य है, उसने कितनी धूप और बरसातों में हमारी रक्षा की है। इसकी डालियों पर तुमने कई सावन झूले झूले हैं। इसकी प्राणवायु से हमारे घर के चारों ओर, आस-पास तक के दायरे में शुद्धता, शीतलता और स्वस्थता विद्यमान रहती है। रोग हमारे घर के सदस्यों को छू भी नहीं पाता। इसकी दातुन, नीम की निचोड़ी और पत्तियाँ हमारे लिए कितनी उपयोगी हैं! प्रचंड गर्मियों की दोपहर में घर के सारे सदस्य इसके नीचे आकर चैन पाते हैं। पक्षी इसकी छाया में विश्राम करते और हम सभी को आशीर्वाद देकर जाते हैं। मोर, कोयल, तोते और भी न जाने कितने ही पक्षियों और जीवों के लिए यह पेड़ उनका आश्रय-स्थान है। अकाल के समय अपनी सूखी लकड़ियों को देकर इसने तुम्हारे पिता के बड़े भाई के समान घर चलाने में सहायता की थी। इसने कभी तुमसे कुछ नहीं माँगा। हम सभी इसके कृतज्ञ हैं। आज तुम इसे काटकर सैंकड़ों पशु-पक्षियों और जीवों को गृह-हीन क्यों करना चाहते हो। क्या इसकी हत्या करने के, इसे काटने के पाप को करने के बाद तुम अपने नए घर में शांति से रह पाओगे?"
रामू की आँखों से आँसू निकल पड़े तभी उसके बेटे की आवाज़ आई - "बाबा लो, मैं कुल्हाड़ी ले आया।" रामू की आँखें मानो खुल गई थीं। अपनी अश्रुपूरित आँखों से वह पेड़ के तने से लिपटकर क्षमा-याचना करने लगा।
अपनी कोमल शाखाओं से नीम ने भी उसे अपने गले लगाकर माफ कर दिया। रामू ने नीम के पेड़ से एक हाथ की दूरी पर अपने नए मकान की नींव खोदकर अपना नया घर बनाया। नीम की शीतल छाया उसके घर पर सदैव एक बुजुर्ग के आशीर्वाद के समान बनी रही।
राम कौन था? यह वर्ष उसके लिए लाभकारी कैसे रहा?
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राम एक किसान था जो अपने खेतों में दिन-रात कठोर परिश्रम करता था। यह वर्ष उसके लिए लाभकारी रहा क्योंकि उसकी मेहनत और ईश्वर की कृपा से उसके खेतों में इतना अधिक अनाज उगा कि उसकी आमदनी से उसके परिवार की गरीबी दूर हो गई। Quick Tip: राम एक परिश्रमी किसान था। इस वर्ष अच्छी फसल से उसे धन-लाभ हुआ और गरीबी दूर हुई।
प्रतिवर्ष वह किस समस्या से परेशान रहता था? उसके हल के लिए उसने क्या निश्चय किया?
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प्रतिवर्ष बारिश के मौसम में राम की फूस की छत से पानी घर के अंदर टपकता था, जिससे घर की कच्ची दीवारें गल जाती थीं और उसका घर गिर जाया करता था। इस समस्या के हल के लिए उसने इस बार हुए धन-लाभ से एक नया पक्का घर बनाने का निश्चय किया। Quick Tip: राम की समस्या थी बरसात में कच्चे घर का गिर जाना। उसने नया पक्का घर बनाने का निश्चय किया।
नीम का पेड़ कहाँ था? राम उसे क्यों काटना चाहता था?
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नीम का पेड़ राम के खेत के बीच में खड़ा था। राम उसे काटना चाहता था क्योंकि वह नया पक्का घर बनाने के लिए उसी स्थान पर नींव खोदना चाहता था। उसने सोचा कि पेड़ की जगह पर घर बनाने से उसकी योजना पूरी हो जाएगी। Quick Tip: नीम का पेड़ खेत के बीच में था। राम उसे काटना चाहता था क्योंकि वह उसी स्थान पर नए पक्के घर का निर्माण करना चाहता था।
राम की आँखों में आँसू क्यों आ गए थे? समझाइए।
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राम की आँखों में आँसू इसलिए आ गए क्योंकि उसने सपने में अपने दादाजी और पिताजी को देखा। वे दोनों उससे नीम के पेड़ को न काटने की विनती कर रहे थे। उन्होंने राम को याद दिलाया कि यह पेड़ केवल पेड़ नहीं बल्कि उनके घर का एक सदस्य है। इसने कई पीढ़ियों को गर्मी और बरसात से बचाया था, पक्षियों को आश्रय दिया था और अकाल के समय इसकी लकड़ियाँ बेचकर परिवार का पेट पाला था। पेड़ की उपयोगिता और अपने पूर्वजों के लगाव को याद करके राम भावुक हो गया। Quick Tip: सपने में पूर्वजों ने राम को नीम के पेड़ के महत्व और परिवार के लगाव को याद दिलाया, जिससे वह भावुक हो गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
प्रस्तुत गद्यांश से आपको क्या सीख मिली? वर्तमान समय में यह सीख कैसे उपयोगी है?
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प्रस्तुत गद्यांश से हमें यह सीख मिलती है कि पेड़-पौधे केवल वनस्पति नहीं हैं, बल्कि वे हमारे परिवार के सदस्यों के समान हैं। वे हमें ऑक्सीजन, छाया, फल और अनेक लाभ प्रदान करते हैं। पक्षियों और अन्य जीवों के लिए वे आश्रय-स्थान होते हैं। हमें अपनी सुविधा के लिए पेड़ों को नहीं काटना चाहिए।
वर्तमान समय में यह सीख बहुत उपयोगी है क्योंकि आज विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो रही है। इससे पर्यावरण असंतुलित हो रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है। राम की तरह हमें भी पेड़ों के महत्व को समझना चाहिए और विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण का संतुलन बनाए रखना चाहिए। Quick Tip: गद्यांश से सीख मिलती है कि पेड़ हमारे परिवार के सदस्य हैं, उनका संरक्षण आवश्यक है। वर्तमान पर्यावरणीय संकट में यह सीख अत्यंत प्रासंगिक है।
'परलोक' शब्द का विलोम चुनकर लिखिए:
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Step 1: 'परलोक' शब्द का अर्थ समझिए।
'परलोक' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - 'पर' + 'लोक'। इसका अर्थ है 'दूसरा लोक' या 'मृत्यु के बाद जाने वाला लोक'। इसे 'अगला जन्म' या 'परलोक' कहा जाता है।
Step 2: विलोम शब्द की परिभाषा समझिए।
विलोम शब्द का अर्थ है - विपरीत या उल्टा अर्थ देने वाला शब्द। 'परलोक' का विलोम वह शब्द होगा जो इसके बिल्कुल विपरीत अर्थ दे।
Step 3: प्रत्येक विकल्प का अर्थ समझिए।
(A) परमलोक: इसका अर्थ है 'सर्वोच्च लोक' या 'बैकुंठ'। यह परलोक का पर्यायवाची है, विलोम नहीं।
(B) स्वर्गलोक: इसका अर्थ है 'देवताओं का लोक'। यह भी परलोक का ही एक भाग है, विलोम नहीं।
(C) इहलोक: इसका अर्थ है 'यह लोक' या 'वर्तमान जीवन का लोक'। 'इह' का अर्थ है 'यहाँ' और 'पर' का अर्थ है 'दूसरा'। 'इहलोक' (इस लोक में) और 'परलोक' (दूसरे लोक में) एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।
(D) यमलोक: इसका अर्थ है 'यमराज का लोक'। यह भी परलोक का ही एक रूप है, विलोम नहीं।
Step 4: निष्कर्ष।
'परलोक' का विलोम शब्द 'इहलोक' है। इहलोक का अर्थ है यह संसार या वर्तमान जीवन, जबकि परलोक का अर्थ है मृत्यु के बाद का जीवन। दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं।
Final Answer: (C) इहलोक Quick Tip: याद रखें: 'इह' = यह (यहाँ), 'पर' = दूसरा (वहाँ)। इसलिए इहलोक (इस लोक में) और परलोक (दूसरे लोक में) एक-दूसरे के विलोम हैं।
'वर्ष' के उचित पर्यायवाची शब्दों को चुनकर लिखिए :
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Step 1: पर्यायवाची शब्द की परिभाषा समझिए।
पर्यायवाची शब्द वे शब्द होते हैं जिनका अर्थ समान या लगभग समान होता है। उन्हें समानार्थी शब्द भी कहा जाता है।
Step 2: 'वर्ष' के पर्यायवाची शब्दों को पहचानिए।
'वर्ष' के प्रमुख पर्यायवाची शब्द हैं:
वर्ष = वर्षा, बारिश, बरसात, पावस, मेघ, वार्षिक (वर्ष से संबंधित)
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) वर्ष - चतुर्मास: यह सही नहीं है। चतुर्मास चार महीने की अवधि है, वर्ष का पर्यायवाची नहीं।
(B) वृक्ष - वार्षिक: यह गलत है। वृक्ष का पर्यायवाची पेड़, तरु, द्रुम आदि है। वार्षिक वर्ष से संबंधित है, वृक्ष से नहीं।
(C) पावस - बारिश: यह सही है। पावस और बारिश दोनों वर्षा के पर्यायवाची शब्द हैं। यह विकल्प सही पर्यायवाची युग्म को दर्शाता है।
(D) वार्षिक - बरखा: यह गलत है। वार्षिक वर्ष से संबंधित विशेषण है, जबकि बरखा वर्षा का पर्याय है। यह सही पर्यायवाची युग्म नहीं है।
Step 4: निष्कर्ष।
प्रश्न में 'वर्ष' के उचित पर्यायवाची शब्दों को चुनने को कहा गया है। विकल्प (C) 'पावस - बारिश' सही है क्योंकि पावस और बारिश दोनों वर्षा के पर्यायवाची हैं।
Final Answer: (C) पावस - बारिश Quick Tip: याद रखें: वर्ष के प्रमुख पर्यायवाची - वर्षा, बारिश, बरसात, पावस, मेघ, वर्षाकाल। 'चतुर्मास' वर्ष का पर्याय नहीं, बल्कि एक अवधि है।
'शिक्षक' शब्द को भाववाचक संज्ञा चुनकर लिखिए :
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Step 1: भाववाचक संज्ञा की परिभाषा समझिए।
भाववाचक संज्ञा उन शब्दों को कहते हैं जो किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान के गुण, दोष, दशा, अवस्था, भाव या व्यापार का बोध कराते हैं। इन्हें मूर्त रूप में नहीं देखा जा सकता।
Step 2: 'शिक्षक' शब्द का भेद पहचानिए।
'शिक्षक' एक व्यक्तिवाचक/जातिवाचक संज्ञा है जो पढ़ाने वाले व्यक्ति को दर्शाता है। इसका भाववाचक रूप 'शिक्षा' होगा।
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) शिक्षक: यह जातिवाचक संज्ञा है, भाववाचक नहीं। यह पढ़ाने वाले व्यक्ति को दर्शाता है।
(B) शिक्षा: यह सही है। 'शिक्षा' भाववाचक संज्ञा है जो ज्ञान देने की क्रिया या भाव को दर्शाता है। यह 'शिक्षक' शब्द का भाववाचक रूप है।
(C) शिक्षापद: यह शिक्षक के पद या स्थिति को दर्शाता है, भाववाचक संज्ञा नहीं है।
(D) शिक्षाविद: यह शिक्षा के क्षेत्र का विशेषज्ञ व्यक्ति है, यह भी जातिवाचक संज्ञा है, भाववाचक नहीं।
Step 4: निष्कर्ष।
'शिक्षक' (पढ़ाने वाला व्यक्ति) का भाववाचक रूप 'शिक्षा' (पढ़ाने की क्रिया या भाव) है। इसलिए सही उत्तर (B) शिक्षा है।
Final Answer: (B) शिक्षा Quick Tip: भाववाचक संज्ञा बनाने के नियम: जातिवाचक से भाववाचक: शिक्षक → शिक्षा, मित्र → मित्रता सर्वनाम से भाववाचक: अपना → अपनापन विशेषण से भाववाचक: मीठा → मिठास
'नीति' शब्द का विशेषण चुनकर लिखिए:
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Step 1: विशेषण की परिभाषा समझिए।
विशेषण वे शब्द होते हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं। यह बताते हैं कि वह कैसा है।
Step 2: 'नीति' शब्द का अर्थ समझिए।
'नीति' एक संज्ञा शब्द है जिसका अर्थ है - नियम, सिद्धांत, आचार, व्यवहार या नैतिकता।
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) नीतिकता: यह भाववाचक संज्ञा है, विशेषण नहीं। इसका अर्थ है नीति का भाव या नैतिकता।
(B) नीति: यह मूल संज्ञा शब्द है, विशेषण नहीं।
(C) नीतिक: यह सही है। 'नीतिक' विशेषण रूप है जिसका अर्थ है नीति संबंधी, नीति से युक्त या नैतिक। जैसे - नीतिक आचरण, नीतिक सिद्धांत।
(D) नवनीत: यह एक अलग शब्द है जिसका अर्थ है मक्खन या नया मक्खन। इसका 'नीति' से कोई संबंध नहीं है।
Step 4: निष्कर्ष।
'नीति' संज्ञा शब्द का विशेषण रूप 'नीतिक' होता है। इसका प्रयोग नीति से संबंधित विशेषता बताने के लिए किया जाता है।
Final Answer: (C) नीतिक Quick Tip: संज्ञा से विशेषण बनाने के नियम: नीति → नीतिक (इक प्रत्यय) न्याय → न्यायिक धर्म → धार्मिक व्यवसाय → व्यावसायिक
'श्रेष्ठ' शब्द का शुद्ध रूप चुनकर लिखिए:
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Step 1: प्रश्न को समझिए।
प्रश्न में 'श्रेष्ठ' शब्द का शुद्ध रूप पूछा गया है। दिए गए सभी विकल्प एक जैसे दिख रहे हैं, लेकिन इनमें वर्तनी (स्पेलिंग) में अंतर हो सकता है।
Step 2: 'श्रेष्ठ' शब्द की शुद्ध वर्तनी पहचानिए।
'श्रेष्ठ' शब्द की शुद्ध वर्तनी है - श् + र् + ए + ष् + ठ् + अ = श्रेष्ठ
इस शब्द में:
'श्र' - संयुक्त व्यंजन (श + र)
'ए' - स्वर
'ष्ठ' - संयुक्त व्यंजन (ष + ठ)
Step 3: सामान्य वर्तनी त्रुटियाँ।
अक्सर लोग 'श्रेष्ठ' को गलत लिख देते हैं:
श्रेश्ठ (गलत)
श्रेष्ट (गलत)
श्रष्ठ (गलत)
श्रेष्ठ (सही)
Step 4: विकल्पों का विश्लेषण।
चूंकि सभी विकल्प एक जैसे दिख रहे हैं, यह संभवतः प्रश्न में टाइपिंग त्रुटि है। वास्तविक परीक्षा में विकल्प अलग-अलग वर्तनी वाले होते हैं:
(a) श्रेष्ठ (सही)
(b) श्रेश्ठ (गलत)
(c) श्रेष्ट (गलत)
(d) श्रष्ठ (गलत)
सही उत्तर (A) श्रेष्ठ होगा।
Final Answer: (A) श्रेष्ठ Quick Tip: 'श्रेष्ठ' शब्द की शुद्ध वर्तनी याद रखें: श + र = श्र ए + ष + ठ = एष्ठ श्र + एष्ठ = श्रेष्ठ इसका अर्थ है - उत्तम, सर्वोत्तम, बेहतरीन।
'आँखें फेर लेना' मुहावरे का सही अर्थ चुनकर लिखिए:
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Step 1: मुहावरे का अर्थ समझिए।
'आँखें फेर लेना' एक हिंदी मुहावरा है। 'फेर लेना' का अर्थ है - बदल लेना, दूसरी ओर कर लेना।
Step 2: मुहावरे का सही अर्थ पहचानिए।
'आँखें फेर लेना' मुहावरे का अर्थ है - उपेक्षा करना, ध्यान न देना, अनदेखा करना, या विमुख हो जाना।
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) लज्जित होना: यह अर्थ 'शर्मिंदा होना' होता है। 'आँखें फेर लेना' से इसका कोई संबंध नहीं है। लज्जित होने पर आँखें नीची होती हैं, फेरी नहीं जातीं।
(B) आँखें झुकाना: यह भी लज्जा या सम्मान में आँखें नीची करने को दर्शाता है, न कि आँखें फेरने को।
(C) क्रोधित होना: क्रोध में आँखें लाल होती हैं या तरेरना होता है, फेरना नहीं।
(D) उपेक्षा करना: यह सही है। 'आँखें फेर लेना' का अर्थ है - किसी की ओर से ध्यान हटा लेना, अनदेखा करना, या उपेक्षा करना।
Step 4: उदाहरण सहित समझिए।
वाक्य प्रयोग: "जब मैंने उससे मदद मांगी, तो उसने आँखें फेर लीं।" (अर्थ: उसने मेरी उपेक्षा कर दी, अनदेखा कर दिया।)
Final Answer: (D) उपेक्षा करना Quick Tip: समान मुहावरे: आँखें फेर लेना = उपेक्षा करना, अनदेखा करना आँखें दिखाना = क्रोध दिखाना आँखें बिछाना = बहुत आदर करना आँखों में धूल झोंकना = धोखा देना
निर्देशानुसार उचित वाक्य बनाइए:
संभी कलाकारों के प्रधान बहुत सुन्दर थे।
(रेखांकित शब्द के स्थान पर उचित शब्द का प्रयोग कीजिए)
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Step 1: वाक्य का अर्थ समझिए।
दिया गया वाक्य है: "संभी कलाकारों के प्रधान बहुत सुन्दर थे।"
यहाँ 'प्रधान' शब्द रेखांकित है, जिसके स्थान पर उचित शब्द प्रयोग करना है।
Step 2: वाक्य के संदर्भ को समझिए।
वाक्य में "बहुत सुन्दर" विशेषण का प्रयोग हुआ है। 'सुन्दर' आमतौर पर व्यक्तियों, वस्तुओं या वेशभूषा के लिए प्रयोग होता है।
'प्रधान' शब्द का अर्थ है - मुखिया, नेता, या प्रमुख व्यक्ति। किसी व्यक्ति के 'प्रधान' या 'मुखिया' के 'सुन्दर' होने का कोई विशेष अर्थ नहीं बनता।
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) परिधान: यह सही है। 'परिधान' का अर्थ है - वस्त्र, कपड़े, पोशाक। "कलाकारों के परिधान बहुत सुन्दर थे" - यह वाक्य पूरी तरह सार्थक है।
(B) पहचान: "कलाकारों की पहचान बहुत सुन्दर थे" - यह असंगत है। पहचान सुन्दर नहीं होती।
(C) पराधीन: 'पराधीन' का अर्थ है - दूसरे के अधीन, परतंत्र। "कलाकार पराधीन बहुत सुन्दर थे" - इसका कोई अर्थ नहीं बनता।
(D) प्रियधन: 'प्रियधन' का अर्थ है - प्रिय धन, प्यारा धन। यह शब्द अप्रचलित है और वाक्य में उचित नहीं है।
Step 4: सही वाक्य।
सही वाक्य होगा: "सभी कलाकारों के परिधान बहुत सुन्दर थे।"
(सभी कलाकारों की वेशभूषा/पोशाक बहुत सुन्दर थी।)
Final Answer: (A) परिधान Quick Tip: समानार्थी शब्द: परिधान = वस्त्र, पोशाक, कपड़ा, वसन, वेशभूषा प्रधान = मुखिया, नेता, मुख्य, श्रेष्ठ वाक्य में संदर्भ के अनुसार सही शब्द का चयन करें।
परिवर्तन प्रकृति का वह नियम है जिसे टाला नहीं जा सकता।
(रेखांकित व्यवस्था हेतु एक शब्द का प्रयोग कीजिए)
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Step 1: प्रश्न को समझिए।
दिया गया वाक्य है: "परिवर्तन प्रकृति का वह नियम है जिसे टाला नहीं जा सकता।"
यहाँ रेखांकित भाग है - "वह नियम है जिसे टाला नहीं जा सकता।" इस व्यवस्था (अर्थ) के लिए एक शब्द का प्रयोग करना है।
Step 2: रेखांकित भाग का अर्थ समझिए।
"जिसे टाला नहीं जा सकता" का अर्थ है:
जिसे रोका न जा सके
जो अपरिहार्य हो
जो निश्चित हो
जिसे बदला न जा सके
Step 3: प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण कीजिए।
(A) अभिव्यक्ति: इसका अर्थ है - अभिव्यक्त करना, व्यक्त करना, प्रकट करना। यह "टाला नहीं जा सकता" के अर्थ से मेल नहीं खाता।
(B) अचल: इसका अर्थ है - जो हिले नहीं, स्थिर। यह भौतिक स्थिरता को दर्शाता है, नियम की अपरिहार्यता को नहीं।
(C) अटल: यह सही है। 'अटल' का अर्थ है - जो टले नहीं, जिसे टाला न जा सके, अपरिहार्य, निश्चित। यह रेखांकित भाग का सटीक एक-शब्द रूप है।
(D) अट्ट: 'अट्ट' का अर्थ है - अट्टालिका (महल), ऊपरी मंजिल, या हाट (बाज़ार)। यह शब्द यहाँ पूरी तरह असंगत है।
Step 4: सही वाक्य।
सही वाक्य होगा: "परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है।"
(अर्थात परिवर्तन प्रकृति का वह नियम है जिसे टाला नहीं जा सकता।)
Final Answer: (C) परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है। Quick Tip: 'अटल' शब्द के समानार्थी: अपरिहार्य (जिसे टाला न जा सके) निश्चित अवश्यंभावी अनिवार्य उदाहरण: जन्म और मृत्यु अटल हैं।
Question 21:
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए:}
मैं लिखूँगा कि यहाँ तो एक छोटा सा गाँव है।
सेठ बड़े आश्चर्य में पड़े – महायुक्त! और आज, वे समझे कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। विनम्र भाव से बोले, “आप आज की कहती हैं, मैंने तो बरसों से कोई यज्ञ नहीं किया है। मेरी स्थिति ही ऐसी नहीं थी।”
-(महायज्ञ का पुरस्कार - यशपाल)
सेठ जी कहाँ गए थे? उन दिनों कौन सी प्रथा प्रचलित थी?
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सेठ जी एक छोटे से गाँव में गए थे। उन दिनों यह प्रथा प्रचलित थी कि यदि कोई व्यक्ति यज्ञ करता था तो उसे महायुक्त की उपाधि दी जाती थी। यह एक सामाजिक सम्मान था जो यज्ञ करने वाले को प्रदान किया जाता था। Quick Tip: सेठ जी गाँव गए थे। उस समय यज्ञ करने वाले को 'महायुक्त' की उपाधि देने की प्रथा प्रचलित थी।
किसके कथन को सुनकर सेठ को ऐसा लगा कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है और क्यों?
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गाँव वालों के इस कथन को सुनकर कि वे 'महायुक्त' हैं और आज उनका यज्ञ है, सेठ को ऐसा लगा कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। उन्हें ऐसा इसलिए लगा क्योंकि उन्होंने बरसों से कोई यज्ञ नहीं किया था और न ही उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि वे यज्ञ कर सकें। वे स्वयं को महायुक्त जैसी उपाधि के योग्य नहीं समझते थे। Quick Tip: गाँव वालों के 'महायुक्त' कहने पर सेठ को मजाक लगा क्योंकि उन्होंने बरसों से कोई यज्ञ नहीं किया था और न ही उनकी स्थिति ऐसी थी।
सेठानी ने सेठ जी के किस कार्य को महायज्ञ बताया था तथा सेठ ने अपने कार्य को महायज्ञ क्यों नहीं माना? इस कार्य से सेठ जी के स्वभाव की कौन सी विशेषता स्पष्ट होती है?
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सेठानी ने सेठ जी के उस कार्य को महायज्ञ बताया था जब उन्होंने एक गरी� ब्राह्मण को भूखा देखकर अपने खाने की थाली उसे दे दी थी और स्वयं भूखे रह गए थे।
सेठ ने अपने इस कार्य को महायज्ञ इसलिए नहीं माना क्योंकि उनके अनुसार यज्ञ तो वह होता है जिसमें आहुति दी जाती है, हवन किया जाता है और पंडित बुलाए जाते हैं। उन्होंने तो केवल एक भूखे व्यक्ति को भोजन करा दिया था, जिसे वे कोई बड़ा कार्य नहीं मानते थे।
इस कार्य से सेठ जी के स्वभाव की यह विशेषता स्पष्ट होती है कि वे विनम्र, दयालु और परोपकारी थे। वे अपने अच्छे कार्यों को बड़ा कार्य नहीं मानते थे और दूसरों की पीड़ा को समझने वाले संवेदनशील व्यक्ति थे। Quick Tip: सेठानी ने भूखे ब्राह्मण को भोजन कराने को महायज्ञ बताया। सेठ ने इसे यज्ञ नहीं माना क्योंकि उनमें हवन आदि नहीं था। इससे सेठ की विनम्रता और दयालुता स्पष्ट होती है।
'महायज्ञ का पुरस्कार' कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? इस कहानी का कौन सा पात्र आपको अपने किन गुणों के कारण सबसे अच्छा लगा?
View Solution
'महायज्ञ का पुरस्कार' कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा यज्ञ या पुण्य दिखावे के लिए किए गए बड़े-बड़े अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि किसी भूखे को भोजन कराने, किसी जरूरतमंद की मदद करने जैसे छोटे-छोटे मानवीय कार्यों में निहित है। ईश्वर को दिखावे की नहीं, सच्चे मन से किए गए अच्छे कर्मों की आवश्यकता है।
इस कहानी में मुझे सेठ जी का पात्र सबसे अच्छा लगा। वे अपने इन गुणों के कारण प्रभावित करते हैं:
विनम्रता: वे अपने अच्छे कार्य को बड़ा नहीं मानते।
दयालुता: उन्होंने भूखे ब्राह्मण को देखकर तुरंत अपना भोजन दे दिया।
सरलता: वे दिखावे से दूर, सीधे-सादे व्यक्ति हैं।
ईमानदारी: वे अपनी आर्थिक स्थिति को स्वीकार करते हैं और झूठा दिखावा नहीं करते। Quick Tip: कहानी की शिक्षा: सच्चा पुण्य दिखावे के यज्ञों में नहीं, मानवीय भलाई के छोटे कार्यों में है। सेठ जी अपनी विनम्रता, दयालुता और सरलता के कारण सबसे अच्छे पात्र हैं।
Question 25:
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए:}
रामनिलाल फिर रुक गया। श्याम ने फिर तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखा। रामनिलाल बोला, “तुमको भी संदेह हो रहा है? यह ठीक ही है। मुझे भी कुछ संदेह हो रहा है। मनोरमा क्यों मुझे इस समय बुला रही है?”
-(संदेह - श्री जयशंकर प्रसाद)
रामनिलाल और श्याम का संबंध स्पष्ट करते हुए बताइए कि रामनिलाल ये बातें श्याम से क्यों बता रहा है?
View Solution
रामनिलाल और श्याम में गहरी मित्रता का संबंध है। वे दोनों एक-दूसरे के विश्वासपात्र हैं और अपने मन की बातें साझा करते हैं।
रामनिलाल ये बातें श्याम से इसलिए बता रहा है क्योंकि वह अपने मन में उठ रहे संदेह को लेकर व्याकुल है। वह श्याम को अपना विश्वासपात्र समझता है और उससे अपनी उलझन साझा करना चाहता है। श्याम की तीखी दृष्टि और रुक-रुक कर बातें करने से पता चलता है कि दोनों के बीच गहरा आत्मीय संबंध है, जहाँ वे बिना किसी संकोच के अपने मन की बात कह सकते हैं। Quick Tip: रामनिलाल और श्याम में गहरी मित्रता है। रामनिलाल अपने मन के संदेह को लेकर व्याकुल है, इसलिए वह अपने विश्वासपात्र मित्र श्याम से ये बातें बता रहा है।
'तुमको भी संदेह हो रहा है' - यह कथन वक्ता के किस संदेह को प्रकट करता है? संदेह की यह स्थिति कब से उत्पन्न हुई? समझाइए।
View Solution
'तुमको भी संदेह हो रहा है' - यह कथन वक्ता रामनिलाल के इस संदेह को प्रकट करता है कि मनोरमा उसे इस समय क्यों बुला रही है। वह सोच में पड़ गया है कि इस बुलावे के पीछे क्या कारण हो सकता है और कहीं यह कोई भ्रम या धोखा तो नहीं।
संदेह की यह स्थिति उस समय से उत्पन्न हुई जब मनोरमा का बुलावा आया। रामनिलाल को लगता है कि यह बुलावा असामान्य है और हो सकता है कि इसमें कोई रहस्य छिपा हो। श्याम की तीखी दृष्टि और उसका रुक-रुक कर बातें करना भी इस बात का संकेत है कि श्याम को भी कुछ संदेह है। इस प्रकार दोनों मित्र एक ही संदेह से ग्रसित हैं। Quick Tip: रामनिलाल को मनोरमा के बुलावे पर संदेह है। यह संदेह उसे उस समय से हुआ जब यह बुलावा आया। श्याम की तीखी दृष्टि से पता चलता है कि उसे भी ऐसा ही संदेह है।
मनोरमा का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताइए कि वह किस संकट से ग्रस्त थी? वह रामनिलाल से किस प्रकार की सहायता चाहती थी?
View Solution
मनोरमा कहानी की एक प्रमुख पात्र है। वह एक सुंदर, संवेदनशील और भावुक युवती है, जो जीवन की कठिनाइयों से जूझ रही है।
मनोरमा आर्थिक और सामाजिक संकट से ग्रस्त थी। वह गरीबी और विपरीत परिस्थितियों में जीवन बसर कर रही थी। उसके सामने कई समस्याएँ थीं, जिनसे निकलने के लिए वह किसी सहारे की तलाश में थी।
मनोरमा रामनिलाल से आर्थिक सहायता चाहती थी। वह चाहती थी कि रामनिलाल उसकी मदद करें ताकि वह अपनी समस्याओं से उबर सके। हो सकता है कि वह रामनिलाल से कर्ज या अन्य प्रकार की वित्तीय सहायता की अपेक्षा रखती हो। उसने रामनिलाल को बुलाकर अपनी व्यथा सुनानी चाही थी और उनसे सहानुभूति और मदद की आशा की थी। Quick Tip: मनोरमा एक संवेदनशील युवती है जो आर्थिक संकट से ग्रस्त है। वह रामनिलाल से आर्थिक सहायता और सहानुभूति चाहती थी।
प्रस्तुत कहानी के अंत में 'श्याम' ने रामनिलाल को क्या सलाह दी थी? 'संदेह' कहानी से आपको क्या शिक्षा मिली? समझाकर लिखिए।
View Solution
प्रस्तुत कहानी के अंत में श्याम ने रामनिलाल को यह सलाह दी थी कि वह मनोरमा के बुलावे पर जाने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर ले। उसने रामनिलाल को सावधान रहने की सलाह दी क्योंकि उसे मनोरमा के इरादों पर संदेह था। श्याम ने रामनिलाल को भावनाओं में बहकर निर्णय न लेने की बात कही।
'संदेह' कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में हर बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कई बार लोग अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का उपयोग करते हैं। संदेह एक स्वाभाविक मानवीय भावना है जो हमें गलत निर्णय लेने से बचा सकती है। लेकिन अत्यधिक संदेह भी हानिकारक हो सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखना चाहिए।
कहानी यह भी सिखाती है कि मित्र का साथ और उसकी सलाह जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होती है। श्याम जैसा सच्चा मित्र हमें सही रास्ता दिखा सकता है। Quick Tip: श्याम ने रामनिलाल को सावधान रहने की सलाह दी। कहानी की शिक्षा: हर बात पर विश्वास न करें, संदेह स्वाभाविक है लेकिन संतुलन जरूरी है। सच्चा मित्र जीवन में मार्गदर्शक का काम करता है।
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:}
सियार ने भेड़िए का हाथ चूम कर कहा, “बड़े भोले हैं आप सरकार! अरे मालिक, रूप-रंग बदलने से तो सुनते हैं आदमी तक बदल जाते हैं। फिर यह तो सियार है।”
और तब, बूढ़े सियार ने भेड़िए का भी रूप बदला। मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए। बोला, “अब आप पूरे संत हो गए।”
(भेड़े और भेड़िए - हरिशंकर परसाई)
इस कहानी में भेड़िया किसका प्रतीक है? बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप क्यों बदला?
View Solution
इस कहानी में भेड़िया शोषक वर्ग का प्रतीक है। भेड़िया उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो शक्तिशाली हैं और दूसरों का शोषण करते हैं। वहीं सियार चापलूसों का प्रतीक है जो शक्तिशाली लोगों की चापलूसी करके अपना स्वार्थ साधते हैं।
बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप इसलिए बदला ताकि वह उसे संत का रूप दे सके। सियार ने भेड़िए के माथे पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए। वह यह दिखाना चाहता था कि बाहरी रूप-रंग बदलने से कोई भी संत या महात्मा बन सकता है, चाहे उसका स्वभाव कैसा भी हो। सियार अपनी चापलूसी से भेड़िए को खुश करना चाहता था। Quick Tip: भेड़िया शोषक वर्ग का प्रतीक है, सियार चापलूसों का। सियार ने भेड़िए का रूप बदलकर उसे संत बनाया और चापलूसी से प्रसन्न किया।
सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके क्यों खोंसे? ऐसा करके वह क्या सिद्ध करना चाहता था?
View Solution
सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके इसलिए खोंसे ताकि वह उसे एक संत या महात्मा का रूप दे सके। घास का तिनका मुँह में रखना संतों और साधुओं की एक पहचान मानी जाती है, जो उनकी अहिंसा और सादगी का प्रतीक होता है।
ऐसा करके सियार यह सिद्ध करना चाहता था कि बाहरी रूप-रंग और दिखावे से कोई भी व्यक्ति संत बन सकता है। चाहे वह अंदर से कितना भी क्रूर, लालची या शोषक क्यों न हो, यदि वह बाहरी तौर पर साधु का वेश धारण कर ले तो लोग उसे संत समझने लगते हैं। सियार व्यंग्यात्मक ढंग से यह दिखाना चाहता था कि इस समाज में दिखावे और ढोंग का बोलबाला है। वास्तविक गुणों से अधिक महत्व बाहरी आडंबरों को दिया जाता है। Quick Tip: सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके खोंसकर उसे संत का रूप दिया। वह यह सिद्ध करना चाहता था कि बाहरी दिखावे से कोई भी संत बन सकता है, चाहे अंदर से कैसा भी हो।
सियार ने भेड़िए को किन तीन बातों का ध्यान रखने को कहा?
View Solution
सियार ने भेड़िए को तीन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखने को कहा था:
बाहरी रूप-रंग का ध्यान: सियार ने भेड़िए के मस्तक पर तिलक लगाया और गले में कंठी पहनाई, यानी उसे साधु-संतों जैसा बाहरी वेश धारण करने की सलाह दी।
दिखावा और ढोंग: उसने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके खोंसे ताकि वह अहिंसक और सज्जन प्रतीत हो। यह दिखावा करने की सलाह थी कि बाहर से भले दिखो, भले ही अंदर से कैसे भी हो।
चालाकी और चापलूसी: सियार ने भेड़िए को यह समझाया कि रूप-रंग बदलने से आदमी तक बदल जाते हैं, फिर सियार तो क्या चीज़ है। यानी दूसरों को धोखा देने के लिए चालाकी और चापलूसी का सहारा लेना चाहिए। Quick Tip: सियार ने भेड़िए को तीन बातें सिखाईं - बाहरी वेश बदलो (तिलक-कंठी), दिखावा करो (मुँह में घास), और चालाकी से काम लो।
वन प्रदेश के चुनाव में भेड़ों ने अपना 'नेता' किसे चुना? उन्होंने 'भेड़ों' के हित में पहला कौन सा कानून बनाया? क्या यह कानून भेड़ों के लिए हितकारी था? समझाइए।
View Solution
वन प्रदेश के चुनाव में भेड़ों ने अपना 'नेता' एक भेड़िए को चुना। भेड़ें यह समझ ही नहीं पाईं कि भेड़िया उनका स्वाभाविक शत्रु है और वह कभी भी उनके हित में काम नहीं कर सकता। भेड़िए ने चुनाव जीतने के लिए भेड़ों को झूठे वादे किए और उनके विश्वास को जीत लिया।
भेड़ों के हित में पहला कानून उन्होंने यह बनाया कि अब कोई भी भेड़िया किसी भेड़ को नहीं खाएगा। यह कानून देखने में भेड़ों के हित में लगता था, लेकिन वास्तव में यह एक धोखा था।
यह कानून भेड़ों के लिए हितकारी नहीं था, क्योंकि:
भेड़िया शाकाहारी नहीं बन सकता। वह चाहकर भी इस कानून का पालन नहीं कर सकता था।
यह कानून केवल दिखावे के लिए था, जिससे भेड़ें यह सोचकर निश्चिंत हो जाएँ कि अब उनकी रक्षा होगी।
भेड़िया नेता बनकर अब और अधिक आसानी से भेड़ों का शोषण कर सकता था।
यह कानून व्यवहारिक नहीं था और केवल भेड़ों को धोखा देने के लिए बनाया गया था।
इस प्रकार परसाई जी व्यंग्य के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि कैसे चालाक और शोषक लोग सरल और भोले लोगों को धोखा देकर अपना नेता बन जाते हैं, और उनके हित में बनाए गए कानून भी वास्तव में उनके शोषण का ही दूसरा रूप होते हैं। Quick Tip: भेड़ों ने भेड़िए को नेता चुना। पहला कानून बनाया कि भेड़िया भेड़ नहीं खाएगा। यह कानून धोखा था - न अमल में आ सकता था, न भेड़ों के हित में था। परसाई का व्यंग्य देखिए!
Question 33:
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:}
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी
ऊँचा खड़ा हिमालय, आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले पड़ा, अथाह सागर है।
गंगा, यमुना, सतलुज, नदियाँ लहर रही हैं।
जगमग छटा निराली, पग-पग पर बिखर रही हैं।
वह पुष्पभूमि मेरी, वह स्वर्ण भूमि मेरी |
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।
-(वह जन्मभूमि मेरी – सोहन लाल द्विवेदी)
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने हिमालय की किन विशेषताओं का वर्णन किया है?
View Solution
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने हिमालय की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है:
ऊँचाई: कवि कहता है कि हिमालय इतना ऊँचा है कि वह आकाश को चूम रहा है। यह उसकी विशालता और गरिमा को दर्शाता है।
भव्यता: हिमालय का ऊँचा खड़ा होना उसकी अडिग और अटल स्थिति को दर्शाता है। वह गर्व से खड़ा है।
रक्षक का भाव: हिमालय उत्तर दिशा में स्थित होकर भारतभूमि की रक्षा करता है। उसके नीचे चरण तले अथाह सागर है, यानी वह धरती और समुद्र के बीच संतुलन बनाए हुए है।
हिमालय की ये विशेषताएँ भारत की प्राकृतिक सुंदरता और गरिमा को उजागर करती हैं। Quick Tip: कवि ने हिमालय की ऊँचाई (आकाश चूमना), भव्यता (ऊँचा खड़ा होना) और रक्षक भाव का वर्णन किया है।
'सिंधु' शब्द का क्या अर्थ है? इसके संदर्भ में कवि ने क्या कहा है?
View Solution
'सिंधु' शब्द का अर्थ समुद्र या सागर होता है। यह विशाल जलराशि को दर्शाता है।
इसके संदर्भ में कवि ने कहा है कि ऊँचे हिमालय के नीचे चरण तले अथाह सागर पड़ा है। कवि ने 'सिंधु' शब्द का प्रयोग करते हुए भारत की भौगोलिक स्थिति का वर्णन किया है - उत्तर में ऊँचा हिमालय और दक्षिण में विशाल सागर। यह भारत की प्राकृतिक सीमाओं को दर्शाता है।
हिमालय और सागर के इस मिलन से भारतभूमि की सुरक्षा और सुंदरता में वृद्धि होती है। कवि ने इन दोनों को भारत की अमूल्य धरोहर बताया है। Quick Tip: 'सिंधु' का अर्थ समुद्र है। कवि ने हिमालय के नीचे अथाह सागर का वर्णन कर भारत की प्राकृतिक सीमाओं - उत्तर में हिमालय और दक्षिण में सागर - को दर्शाया है।
गंगा, यमुना, सतलुज नदियों के संदर्भ में कवि ने क्या कहा है? इन नदियों का भारत की संस्कृति में क्या महत्व है?
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गंगा, यमुना और सतलुज नदियों के संदर्भ में कवि ने कहा है कि ये नदियाँ लहर रही हैं और जगमग छटा निराली, पग-पग पर बिखर रही हैं। यानी ये नदियाँ निरंतर प्रवाहित हो रही हैं और इनके किनारों पर चारों ओर अद्भुत सुंदरता फैली हुई है।
इन नदियों का भारत की संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है:
धार्मिक महत्व: गंगा और यमुना को पवित्र नदियाँ माना जाता है। इनके तट पर अनेक तीर्थ स्थल और मंदिर स्थित हैं।
सांस्कृतिक धरोहर: इन नदियों के किनारे ही भारत की प्राचीन सभ्यता विकसित हुई। आज भी यहाँ अनेक त्योहार और मेले लगते हैं।
जीवनदायिनी: ये नदियाँ कृषि, पेयजल और उद्योगों के लिए जल प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें जीवनदायिनी कहा जाता है।
काव्य और साहित्य: इन नदियों पर अनेक कविताएँ, गीत और लोककथाएँ रची गई हैं, जो भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। Quick Tip: गंगा-यमुना-सतलुज नदियाँ लहरा रही हैं, पग-पग पर सुंदरता बिखेर रही हैं। इनका धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भारत की संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रयाग (विवेणी) में किन-किन नदियों की धाराओं का संगम है? यह कहाँ स्थित है तथा इसके महत्व को लिखिए।
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प्रयाग (विवेणी) में गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों की धाराओं का संगम है। यह स्थान इलाहाबाद (प्रयागराज) में स्थित है, जो उत्तर प्रदेश राज्य में है।
इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
धार्मिक महत्व: प्रयाग का संगम हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है।
कुंभ का मेला: यहाँ हर 12 वर्षों में कुंभ का मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है।
तीन नदियों का संगम: यहाँ तीन नदियों का संगम है - दो दृश्य (गंगा-यमुना) और एक अदृश्य (सरस्वती)। यह स्थान अत्यंत दुर्लभ और पवित्र माना जाता है।
सांस्कृतिक महत्व: प्रयाग का उल्लेख वेदों, पुराणों और रामायण-महाभारत में मिलता है। यह प्राचीन काल से ज्ञान और संस्कृति का केंद्र रहा है। Quick Tip: प्रयाग (विवेणी) में गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम है। यह प्रयागराज (इलाहाबाद) में स्थित है और कुंभ मेले के लिए विश्वविख्यात है। यह अत्यंत पवित्र धार्मिक स्थल है।
किस नाम से 'पुण्यभूमि' और 'स्वर्णभूमि' को कहा है? जन्मभूमि को कवि ने कौन-कौन से नए विशेष नामों से पुकारा है? कुछ नामों का वर्णन कीजिए।
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कवि ने अपनी जन्मभूमि भारत को 'पुण्यभूमि' और 'स्वर्णभूमि' के नाम से पुकारा है। 'पुण्यभूमि' का अर्थ है वह भूमि जहाँ पुण्य के कार्य होते हैं और जो स्वयं पवित्र है। 'स्वर्णभूमि' का अर्थ है वह भूमि जो सोने के समान मूल्यवान और समृद्ध है।
कवि ने जन्मभूमि (भारत) को निम्नलिखित विशेष नामों से पुकारा है:
जन्मभूमि: वह भूमि जहाँ कवि का जन्म हुआ।
मातृभूमि: वह भूमि जो माता के समान पूजनीय और प्रेम देने वाली है।
पुष्पभूमि: कवि ने भारत को पुष्पभूमि कहा है क्योंकि यहाँ की धरती फूलों के समान सुंदरता बिखेरती है। यहाँ सुंदरता और सुगंध चारों ओर फैली है।
स्वर्णभूमि: कवि ने भारत को स्वर्णभूमि इसलिए कहा क्योंकि यह भूमि सोने के समान बहुमूल्य है। यह समृद्धि और धन-धान्य से भरपूर है।
पुण्यभूमि: यह वह भूमि है जहाँ पुण्य के कार्य होते हैं, जहाँ ऋषि-मुनियों ने तपस्या की और जहाँ धर्म का पालन होता है।
इन नामों के माध्यम से कवि ने भारत की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक महत्व को उजागर किया है। वह अपनी मातृभूमि के प्रति गहरा प्रेम और गर्व व्यक्त करते हैं। Quick Tip: कवि ने भारत को जन्मभूमि, मातृभूमि, पुष्पभूमि, स्वर्णभूमि और पुण्यभूमि कहा है। ये नाम भारत की सुंदरता, समृद्धि और पवित्रता को दर्शाते हैं।
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
"राजा के दरबार में जैसे समय पाइए।
साई तहाँ न बैठिए, जहाँ कोठ दै उठाइए।
जहाँ कोठ दै उठाइए बोल अनवले रहिए,
हौसले नहीं हटाइए, बात पूछे से कहिए।।
कह गिरिधर कविराय समय सो कीजै काजा,
अति आगूर नहीं होइए, बहुत अनेखैं राजा।"
(गिरिधर की कुंडलियाँ - गिरिधर कविराय)
राजा के दरबार में जाने से पहले किस बात का ध्यान रखना चाहिए और क्यों?
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राजा के दरबार में जाने से पहले समय का ध्यान रखना चाहिए। कवि कहते हैं कि दरबार में उचित समय पर ही जाना चाहिए।
ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि राजदरबार में हर कार्य समयानुसार होता है। यदि व्यक्ति गलत समय पर दरबार में जाता है, तो वहाँ उसे उचित सम्मान नहीं मिल पाता। समय का ध्यान रखना व्यवहार कुशलता का प्रतीक है। उचित समय पर जाने से राजा भी प्रसन्न होता है और व्यक्ति का कार्य भी सफल होता है। Quick Tip: राजदरबार में उचित समय पर जाना चाहिए क्योंकि समयानुसार ही कार्य सफल होते हैं और राजा की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
राजदरबार में बैठने और बोलने से पहले किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
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राजदरबार में बैठने और बोलने से पहले निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
बैठने का स्थान: कवि कहते हैं कि वहाँ नहीं बैठना चाहिए जहाँ से उठा दिया जाए। अर्थात अपनी योग्यता और पद के अनुसार उचित स्थान पर ही बैठना चाहिए। ऐसी जगह नहीं बैठना चाहिए जहाँ से अपमानित होकर उठना पड़े।
बोलने का तरीका: कवि कहते हैं कि "बोल अनवले रहिए" अर्थात बोलने में स्पष्ट और सीधा रहना चाहिए। टेढ़ी-मेढ़ी बातें नहीं करनी चाहिए।
साहस बनाए रखें: "हौसले नहीं हटाइए" अर्थात दरबार में साहस और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। डरपोक बनकर नहीं बैठना चाहिए।
पूछने पर ही बोलें: "बात पूछे से कहिए" अर्थात जब तक राजा या बड़े लोग पूछें, तभी बोलना चाहिए। बिना पूछे बोलना अशोभनीय माना जाता है। Quick Tip: दरबार में उचित स्थान पर बैठें, स्पष्ट बोलें, साहस बनाए रखें और पूछे जाने पर ही बोलें।
"अति आगूर" शब्द का क्या अर्थ है?
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"अति आगूर" शब्द का अर्थ है - अत्यधिक उतावली या जल्दबाजी।
कवि गिरिधर कविराय कहते हैं कि किसी भी कार्य में अति आगूर (अत्यधिक जल्दबाजी) नहीं करनी चाहिए। जल्दबाजी में किए गए कार्य अक्सर गलत साबित होते हैं और उनमें सफलता नहीं मिलती।
वे आगे कहते हैं कि "बहुत अनेखैं राजा" अर्थात बहुत अधिक जल्दबाजी करने वाले राजा को लोग अच्छा नहीं मानते। यह बात केवल राजा के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य व्यक्ति के लिए भी लागू होती है। हर कार्य को उचित समय पर धैर्यपूर्वक करना चाहिए। Quick Tip: 'अति आगूर' का अर्थ है अत्यधिक जल्दबाजी। कवि कहते हैं कि किसी भी कार्य में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, विशेषकर राजदरबार में।
'अनखैं' शब्द का क्या अर्थ है? राजा कब और क्यों अनखैं हो जाते हैं?
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'अनखैं' शब्द का अर्थ है - अप्रसन्न, नाराज़ या क्रोधित होना। यह 'अनख' शब्द से बना है जिसका अर्थ है क्रोध या नाराजगी।
राजा तब अनखैं (अप्रसन्न) हो जाते हैं जब कोई व्यक्ति अति आगूर अर्थात अत्यधिक जल्दबाजी करता है। कवि कहते हैं कि "बहुत अनेखैं राजा" अर्थात जो व्यक्ति बहुत अधिक उतावली या जल्दबाजी दिखाता है, उससे राजा नाराज़ हो जाते हैं।
राजा के अनखैं होने के कारण:
जल्दबाजी में व्यक्ति अनुचित व्यवहार कर सकता है
दरबार की गरिमा और मर्यादा का उल्लंघन हो सकता है
बिना सोचे-समझे बातें कहने से अपमान की संभावना
उचित समय और स्थान का ध्यान न रखना Quick Tip: 'अनखैं' का अर्थ है नाराज़ या क्रोधित होना। राजा जल्दबाजी करने वालों से नाराज़ होते हैं क्योंकि यह दरबार की मर्यादा के विरुद्ध है।
कवि गिरिधर की कुंडलियाँ हमें क्या सीख देती हैं? राजा के दरबार में कैसा आचरण करना चाहिए?
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कवि गिरिधर की कुंडलियाँ हमें व्यवहार कुशलता और मर्यादा की महत्वपूर्ण सीख देती हैं। यह केवल राजदरबार तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।
मुख्य सीख:
समय का ध्यान रखना चाहिए
अपनी योग्यता और पद के अनुसार उचित स्थान ग्रहण करना चाहिए
बोलने में स्पष्टता और सरलता रखनी चाहिए
आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए
जल्दबाजी में कोई कार्य नहीं करना चाहिए
पूछे जाने पर ही बोलना चाहिए
राजा के दरबार में आचरण:
समय का पालन: उचित समय पर दरबार में जाएँ
उचित स्थान: अपनी योग्यता के अनुसार स्थान ग्रहण करें, जहाँ से उठने की नौबत न आए
स्पष्ट वाणी: सीधी और सरल भाषा में बात करें, टेढ़ी-मेढ़ी बातों से बचें
धैर्य और साहस: आत्मविश्वास बनाए रखें, घबराएँ नहीं
मर्यादा: बिना पूछे न बोलें, राजा की मर्यादा का ध्यान रखें
जल्दबाजी से बचें: धैर्यपूर्वक अपनी बात रखें
यह कुंडलियाँ हमें सिखाती हैं कि जीवन में हर जगह मर्यादा, समय और व्यवहार का ध्यान रखना चाहिए। चाहे वह राजदरबार हो, कार्यालय हो या सामाजिक समारोह, उचित आचरण ही सफलता की कुंजी है। Quick Tip: गिरिधर की कुंडलियाँ सिखाती हैं - समय का ध्यान, उचित स्थान, स्पष्ट वाणी, धैर्य, आत्मविश्वास और मर्यादा। दरबार में जल्दबाजी न करें, पूछे बिना न बोलें और सीधी बात कहें।
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै।
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहे न आनि सुहावै।
तू काहे नहिं आगे अंसुवा तो कौन करन कहावै।।
कबहिं पलक हरि मूँदि लेत हैं कबहिं अधर फरकावै।
सोवत जानि कछु और ही कौ रहि रहि सैन बतावै।।
हरि अंग अकुलाहि उठै हरि जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद के घर आवै।।
-(सूरदास)
श्रीकृष्ण को सुलाते हुए माता यशोदा क्या-क्या कर रही हैं?
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माता यशोदा श्रीकृष्ण को सुलाते समय निम्नलिखित कार्य कर रही हैं:
पालना झुलाना: वह श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं।
हलराना: वह पालने को हल्के से हिला रही हैं ताकि कृष्ण को नींद आए।
दुलारना: वह कृष्ण को प्यार कर रही हैं, उन्हें दुलार दे रही हैं।
मल्हाना: वह कृष्ण को गोद में लेकर प्यार से सहला रही हैं।
गीत गाना: वह कृष्ण को सुलाने के लिए मधुर लोरी गा रही हैं।
माता यशोदा अपने लाल को सुलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। वह पालना झुलाती हैं, प्यार करती हैं, सहलाती हैं और मधुर स्वर में लोरी गाती हैं ताकि कान्हा जल्दी सो जाएँ। Quick Tip: माता यशोदा कृष्ण को सुलाने के लिए पालना झुलाती हैं, दुलारती हैं, सहलाती हैं और लोरी गाती हैं।
यशोदा माता नींद की देवी से क्या-क्या कहती हैं और क्यों?
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यशोदा माता नींद की देवी (निद्रा देवी) से निम्नलिखित बातें कहती हैं:
वह पूछती हैं, "मेरे लाल को नींद क्यों नहीं आ रही है?"
वह कहती हैं, "तू क्यों नहीं आती?"
वह प्रश्न करती हैं, "यदि तू नहीं आएगी तो अपना कर्तव्य कैसे निभाएगी?"
यशोदा माता ऐसा क्यों कहती हैं?
यशोदा माता ऐसा इसलिए कहती हैं क्योंकि उनका लाल कृष्ण सो नहीं रहा है। वह बार-बार आँखें खोल लेते हैं, कभी पलकें मूंदते हैं तो कभी खोल देते हैं। कभी उनके होंठ काँपते हैं। वह सोने का नाटक करते हैं लेकिन सोते नहीं। माता यशोदा का मानना है कि यदि नींद की देवी आएँगी तो उनका लाल सो जाएगा। वह नींद की देवी से विनती कर रही हैं कि वह आकर उनके लाल को सुला दें। Quick Tip: यशोदा माता नींद की देवी से पूछती हैं कि उनके लाल को नींद क्यों नहीं आ रही। वह चाहती हैं कि निद्रा देवी आकर कृष्ण को सुला दें।
कृष्ण के सो जाने का अनुमान लगाकर यशोदा माता क्या करती हैं? यहाँ 'सैन' शब्द का क्या अर्थ है?
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कृष्ण के सो जाने का अनुमान लगाकर यशोदा माता धीरे-धीरे संकेत करती हैं। वह आस-पास के लोगों को इशारे में चुप रहने का संकेत देती हैं ताकि कहीं शोर न हो और कृष्ण की नींद न टूटे। वह सावधानीपूर्वक व्यवहार करती हैं ताकि वातावरण शांत बना रहे।
'सैन' शब्द का अर्थ: 'सैन' शब्द का अर्थ है संकेत या इशारा। जब माता यशोदा को लगता है कि कृष्ण सो गए हैं, तो वह आसपास के लोगों को इशारे में चुप रहने का संकेत देती हैं। यह इशारा वह हाथ के संकेत से, आँख के इशारे से या मौन रहकर करती हैं। Quick Tip: 'सैन' का अर्थ है संकेत या इशारा। कृष्ण के सो जाने पर यशोदा माता चुप रहने का संकेत करती हैं ताकि उनकी नींद न टूटे।
सूरदास के आराध्य प्रभु का नाम बताइए। उनकी रचनाएँ किस भाषा में लिखी हैं? उनकी कोई दो पुस्तकों के नाम बताइए।
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सूरदास के आराध्य प्रभु का नाम श्रीकृष्ण हैं। वह कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे और उन्होंने अपनी समस्त रचनाएँ श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कीं।
सूरदास की रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखी गई हैं। ब्रजभाषा उस समय की प्रचलित साहित्यिक भाषा थी और इसमें लिखे गए भक्ति काव्य ने जन-जन तक कृष्ण भक्ति का संदेश पहुँचाया।
सूरदास की दो प्रमुख पुस्तकों के नाम:
सूरसागर: यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है जिसमें श्रीकृष्ण के बाल रूप का अत्यंत मनोहारी वर्णन मिलता है। इसमें लगभग 5000 पद संकलित हैं।
सूरसारावली: यह भी उनकी महत्वपूर्ण रचना है जिसमें कृष्ण लीला का वर्णन है।
इनके अतिरिक्त साहित्य लहरी भी उनकी प्रसिद्ध रचना है। सूरदास को हिंदी साहित्य का 'सूर्य' कहा जाता है। Quick Tip: सूरदास के आराध्य श्रीकृष्ण हैं। उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं। प्रमुख पुस्तकें: सूरसागर और सूरसारावली।
Question 47:
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
यों तो इस क्षेत्र से छुटकारा पाने का सरल उपाय यही है कि तुम्हें बाग वाला मकान दे दिया जाए - वह पड़ा भी बेकार है और अभी मैं उससे किसी तरह का भी काम लेने का इरादा नहीं रखता, पर तुम तो जानते हो चेतन, मेरे जीते जी यह असंभव है।
- (सुखी दाली - उपेन्द्रनाथ 'अश्क')
प्रस्तुत कथन के वक्ता और श्रोता कौन हैं?
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प्रस्तुत कथन के वक्ता हैं - बाबू जी (पिता) और श्रोता हैं - चेतन (पुत्र)।
यह संवाद पिता और पुत्र के बीच का है। वक्ता अपने पुत्र चेतन से बात कर रहा है और उसे बाग वाला मकान देने की बात कह रहा है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर रहा है कि उसके जीते जी यह संभव नहीं है। Quick Tip: वक्ता: बाबू जी (पिता), श्रोता: चेतन (पुत्र)। यह पिता-पुत्र के बीच का संवाद है।
श्रोता को बाग वाला मकान क्यों चाहिए और इसके लिए उसने क्या तर्क दिया?
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श्रोता (चेतन) को बाग वाला मकान इसलिए चाहिए क्योंकि वह उस क्षेत्र से छुटकारा पाना चाहता है। वह संभवतः वहाँ नहीं रहना चाहता या उस क्षेत्र को छोड़कर कहीं और जाना चाहता है।
चेतन ने मकान के लिए निम्नलिखित तर्क दिए:
वह मकान बेकार पड़ा है, उससे कोई काम नहीं लिया जा रहा
वक्ता (पिता) का उस मकान से किसी तरह का काम लेने का कोई इरादा नहीं है
मकान के बेकार पड़े रहने से अच्छा है कि वह उसे दे दिया जाए
इससे वह उस क्षेत्र से छुटकारा पा सकेगा
परंतु वक्ता (पिता) स्पष्ट करते हैं कि उनके जीते जी यह संभव नहीं है, चाहे मकान कितना ही बेकार क्यों न पड़ा हो। Quick Tip: चेतन को मकान इसलिए चाहिए क्योंकि वह क्षेत्र छोड़ना चाहता है। उसका तर्क है कि मकान बेकार पड़ा है, फिर भी पिता उसे देने को तैयार नहीं।
वक्ता ने इस समस्या के हल के लिए क्या किया? क्या वे इस समाधान में सफल हुए?
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वक्ता (बाबू जी) ने इस समस्या के हल के लिए यह किया कि उन्होंने चेतन को मकान देने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनके जीते जी यह संभव नहीं है। उन्होंने चेतन को यह भी समझाया कि मकान चाहे बेकार ही पड़ा रहे, लेकिन वह उसे नहीं दे सकते।
क्या वे इस समाधान में सफल हुए?
नहीं, वे इस समाधान में सफल नहीं हुए। उनका इनकार और सख्त रवैया समस्या का समाधान नहीं था, बल्कि यह समस्या को और उलझाने वाला था। उनके इस रवैये से चेतन और अधिक निराश हुआ होगा और पिता-पुत्र के बीच दूरियाँ बढ़ी होंगी। मकान देने से इनकार करके उन्होंने समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला, बल्कि उसे टाल दिया। Quick Tip: वक्ता ने मकान देने से इनकार कर दिया। वे इस समाधान में सफल नहीं हुए क्योंकि उनके रवैये से समस्या और गंभीर हो गई और पिता-पुत्र के बीच दूरियाँ बढ़ीं।
'परिवार का एक सिरा किसी समझदार व्यक्ति के हाथ में रहने से परिवार में एकता बनी रहती है।' क्या आप इस कथन से सहमत हैं? एकांकी के सन्दर्भ में तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
View Solution
हाँ, मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ कि परिवार का एक सिरा किसी समझदार व्यक्ति के हाथ में रहने से परिवार में एकता बनी रहती है।
एकांकी 'सुखी दाली' के सन्दर्भ में तर्क:
नेतृत्व की आवश्यकता: परिवार में किसी समझदार व्यक्ति का होना आवश्यक है जो सभी निर्णय सोच-समझकर ले। प्रस्तुत एकांकी में पिता (बाबू जी) परिवार के मुखिया हैं, लेकिन उनका निर्णय मकान देने से इनकार करना समझदारी भरा नहीं लगता।
संतुलित निर्णय: समझदार व्यक्ति वह होता है जो पक्ष-विपक्ष को देखते हुए संतुलित निर्णय ले। यहाँ पिता ने बिना चेतन की भावनाओं को समझे सीधा इनकार कर दिया, जिससे परिवार में एकता की जगह दूरियाँ बढ़ीं।
भावनात्मक समझ: परिवार के मुखिया को सदस्यों की भावनाओं को समझना चाहिए। चेतन को मकान की आवश्यकता थी, लेकिन पिता ने उसकी भावनाओं को नहीं समझा।
एकता का अभाव: इस एकांकी में हम देखते हैं कि पिता के अनम्य रवैये के कारण परिवार में एकता का अभाव है। यदि पिता समझदारी दिखाते और चेतन से बातचीत करते, तो शायद समाधान निकल आता।
निष्कर्ष: परिवार में एकता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि परिवार का मुखिया समझदार, संतुलित और भावनात्मक रूप से परिपक्व हो। वह सभी सदस्यों की बात सुने, उनकी भावनाओं का सम्मान करे और तभी निर्णय ले। 'सुखी दाली' एकांकी में पिता के अनम्य रवैये के कारण परिवार में एकता का अभाव दिखता है। Quick Tip: परिवार में एकता के लिए समझदार नेतृत्व आवश्यक है। 'सुखी दाली' में पिता के अनम्य रवैये से एकता प्रभावित हुई। समझदार मुखिया सबकी सुनता है, भावनाओं को समझता है और संतुलित निर्णय लेता है।
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
"आत्मरक्षा का कोई और उपाय न देखकर दुर्योधन हस्तिनापुर के सरोवर में घुस गया और उसके जल-स्तम्भ में छिपकर बैठ गया। पर न जाने कैसे पांडवों को इसकी सूचना मिल गई और वे तत्काल रथ पर चढ़कर वहाँ पहुँच गए।"
- (महाभारत की एक साँझ - भारत भूषण अग्रवाल)}
प्रस्तुत कथन के वक्ता एवं श्रोता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
View Solution
प्रस्तुत कथन के वक्ता और श्रोता के बारे में स्पष्ट जानकारी इस अंश में नहीं दी गई है। यह कथन महाभारत के एक प्रसंग का वर्णन कर रहा है, जहाँ दुर्योधन हस्तिनापुर के सरोवर में छिप जाता है और पांडवों को इसकी सूचना मिल जाती है।
संभावित वक्ता और श्रोता:
वक्ता: कोई कथावाचक या सूत्रधार हो सकता है जो महाभारत की इस घटना का वर्णन कर रहा है।
श्रोता: कोई श्रोतागण या पात्र हो सकते हैं जिन्हें यह कथा सुनाई जा रही है।
दिए गए अंश में वक्ता-श्रोता के नाम स्पष्ट नहीं हैं, केवल महाभारत की घटना का वर्णन है। Quick Tip: इस अंश में वक्ता-श्रोता के नाम स्पष्ट नहीं हैं। यह महाभारत के उस प्रसंग का वर्णन है जब दुर्योधन सरोवर में छिपता है और पांडव उसे खोज लेते हैं।
दुर्योधन स्वयं को दोषी क्यों नहीं मान रहा था तथा युधिष्ठिर को क्या कह रहा था?
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दुर्योधन स्वयं को दोषी क्यों नहीं मान रहा था?
दुर्योधन स्वयं को दोषी इसलिए नहीं मान रहा था क्योंकि:
वह अपने आपको कौरव वंश का उत्तराधिकारी मानता था और हस्तिनापुर की गद्दी पर अपना अधिकार समझता था
उसके अनुसार पांडवों को उनका हिस्सा पाने का कोई अधिकार नहीं था
वह द्यूतक्रीड़ा (जुआ) में पांडवों को हराकर उनका राज्य हड़पना उचित समझता था
उसने द्रौपदी का अपमान करना भी उचित समझा क्योंकि वह उसके अनुसार जीती हुई दासी थी
वह अपने किए गए सभी अन्यायों को अपना अधिकार मानता था
दुर्योधन युधिष्ठिर को क्या कह रहा था?
दुर्योधन युधिष्ठिर से कह रहा था कि:
वह धर्म का पुत्र होकर भी जुए में सब कुछ हार गया
वह अपने भाइयों और पत्नी को दांव पर लगाकर धर्म के नाम पर कलंक है
उसे अब धर्म की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं है
वह युद्ध से भागकर अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है
उसे युद्ध में डटकर सामना करना चाहिए
यहाँ दुर्योधन युधिष्ठिर पर व्यंग्य कर रहा था और उसे युद्ध के लिए ललकार रहा था। Quick Tip: दुर्योधन स्वयं को दोषी नहीं मानता था क्योंकि वह अपने अन्याय को अपना अधिकार समझता था। वह युधिष्ठिर पर व्यंग्य करता था कि धर्मराज होकर भी वह जुए में सब कुछ हार गया और अब धर्म की दुहाई देना व्यर्थ है।
पांडवों को सूचना किसके द्वारा प्राप्त हुई? पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए कैसे ललकारा और क्या शर्त रखी?
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पांडवों को सूचना किसके द्वारा प्राप्त हुई?
पांडवों को दुर्योधन के सरोवर में छिपे होने की सूचना देवताओं या आकाशवाणी द्वारा प्राप्त हुई। अवतरण में वर्णित है कि "न जाने कैसे पांडवों को इसकी सूचना मिल गई" - यहाँ यह रहस्यमय तरीके से सूचना मिलने का संकेत है। महाभारत के प्रसंग में ऐसी सूचनाएँ अक्सर दैवीय माध्यमों से मिलती थीं।
पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए कैसे ललकारा और क्या शर्त रखी?
पांडव सरोवर पर पहुँचकर दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा। उनकी ललकार और शर्त इस प्रकार थी:
युद्ध के लिए ललकार: पांडवों ने दुर्योधन को छिपकर निकलने और युद्ध में सामना करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि कायरों की तरह छिपने के बजाय वीरों की तरह युद्ध करे।
शर्त: पांडवों ने दुर्योधन के सामने यह शर्त रखी कि वे उसे एक-एक करके युद्ध के लिए अवसर देंगे। उन्होंने कहा कि वे सभी मिलकर उस पर आक्रमण नहीं करेंगे, बल्कि वह जिसे चाहे उससे युद्ध कर सकता है।
गदा युद्ध का नियम: उन्होंने यह भी शर्त रखी कि युद्ध गदा से होगा और इसमें नियमों का पालन किया जाएगा। यह युद्ध धर्मयुद्ध होगा जिसमें अनुचित प्रहार वर्जित होंगे।
दुर्योधन ने यह शर्त स्वीकार की और सरोवर से बाहर निकलकर युद्ध के लिए तैयार हुआ। Quick Tip: पांडवों को दैवीय माध्यमों से सूचना मिली। उन्होंने दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा और शर्त रखी कि वह एक-एक करके किसी भी पांडव से गदा युद्ध कर सकता है।
'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक की औचित्य पर प्रकाश डालिए।
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'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक अत्यंत सार्थक और औचित्यपूर्ण है। इस शीर्षक की सार्थकता निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होती है:
समय का संकेत: 'साँझ' शब्द संध्या या शाम के समय का संकेत करता है। महाभारत का युद्ध समाप्ति की ओर था और यह वह समय था जब युद्ध की समाप्ति निकट थी।
जीवन की संध्या: यह समय कौरवों के जीवन की संध्या थी। दुर्योधन सहित लगभग सभी कौरव मारे जा चुके थे और अब केवल दुर्योधन शेष था।
अंत का प्रतीक: साँझ दिन के अंत का प्रतीक है। उसी प्रकार यह कृति महाभारत युद्ध के अंतिम क्षणों को दर्शाती है। यह कौरव वंश के अस्त होने का समय था।
दुखद परिणाम: साँझ के बाद अंधकार आता है। यह युद्ध के दुखद परिणाम और अंधकारमय भविष्य का प्रतीक है, जहाँ अनगिनत वीर मारे गए और परिवार नष्ट हो गए।
संधिकाल: यह संधिकाल (संधि का समय) भी था जब युद्ध समाप्त हो रहा था और शांति की संभावनाएँ बन रही थीं, हालाँकि बहुत देर हो चुकी थी।
एक विशेष संध्या: 'एक साँझ' का अर्थ है वह विशेष संध्या जो महाभारत के इतिहास में अमर हो गई - जब दुर्योधन छिपा, पांडवों ने उसे ललकारा और अंतिम युद्ध हुआ।
निष्कर्ष: 'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक पूर्णतः औचित्यपूर्ण है क्योंकि यह महाभारत युद्ध के अंतिम क्षणों, कौरवों के अस्त होने के समय और उस ऐतिहासिक संध्या का सटीक चित्रण करता है जब महाभारत का महान युद्ध अपने चरम और अंतिम पड़ाव पर था। Quick Tip: 'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक सार्थक है क्योंकि यह युद्ध के अंतिम क्षणों, कौरवों के अस्त होने के समय और उस ऐतिहासिक संध्या को दर्शाता है जब महाभारत का महान युद्ध समाप्ति की ओर था।
पांडवों को सूचना किसके द्वारा प्राप्त हुई? पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए कैसे ललकारा और क्या शर्त रखी?
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पांडवों को सूचना किसके द्वारा प्राप्त हुई?
पांडवों को दुर्योधन के सरोवर में छिपे होने की सूचना देवताओं या आकाशवाणी द्वारा प्राप्त हुई। अवतरण में वर्णित है कि "न जाने कैसे पांडवों को इसकी सूचना मिल गई" - यहाँ यह रहस्यमय तरीके से सूचना मिलने का संकेत है। महाभारत के प्रसंग में ऐसी सूचनाएँ अक्सर दैवीय माध्यमों से मिलती थीं।
पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए कैसे ललकारा और क्या शर्त रखी?
पांडव सरोवर पर पहुँचकर दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा। उनकी ललकार और शर्त इस प्रकार थी:
युद्ध के लिए ललकार: पांडवों ने दुर्योधन को छिपकर निकलने और युद्ध में सामना करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि कायरों की तरह छिपने के बजाय वीरों की तरह युद्ध करे।
शर्त: पांडवों ने दुर्योधन के सामने यह शर्त रखी कि वे उसे एक-एक करके युद्ध के लिए अवसर देंगे। उन्होंने कहा कि वे सभी मिलकर उस पर आक्रमण नहीं करेंगे, बल्कि वह जिसे चाहे उससे युद्ध कर सकता है।
गदा युद्ध का नियम: उन्होंने यह भी शर्त रखी कि युद्ध गदा से होगा और इसमें नियमों का पालन किया जाएगा। यह युद्ध धर्मयुद्ध होगा जिसमें अनुचित प्रहार वर्जित होंगे।
दुर्योधन ने यह शर्त स्वीकार की और सरोवर से बाहर निकलकर युद्ध के लिए तैयार हुआ। Quick Tip: पांडवों को दैवीय माध्यमों से सूचना मिली। उन्होंने दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा और शर्त रखी कि वह एक-एक करके किसी भी पांडव से गदा युद्ध कर सकता है।
'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक की औचित्य पर प्रकाश डालिए।
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'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक अत्यंत सार्थक और औचित्यपूर्ण है। इस शीर्षक की सार्थकता निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होती है:
समय का संकेत: 'साँझ' शब्द संध्या या शाम के समय का संकेत करता है। महाभारत का युद्ध समाप्ति की ओर था और यह वह समय था जब युद्ध की समाप्ति निकट थी।
जीवन की संध्या: यह समय कौरवों के जीवन की संध्या थी। दुर्योधन सहित लगभग सभी कौरव मारे जा चुके थे और अब केवल दुर्योधन शेष था।
अंत का प्रतीक: साँझ दिन के अंत का प्रतीक है। उसी प्रकार यह कृति महाभारत युद्ध के अंतिम क्षणों को दर्शाती है। यह कौरव वंश के अस्त होने का समय था।
दुखद परिणाम: साँझ के बाद अंधकार आता है। यह युद्ध के दुखद परिणाम और अंधकारमय भविष्य का प्रतीक है, जहाँ अनगिनत वीर मारे गए और परिवार नष्ट हो गए।
संधिकाल: यह संधिकाल (संधि का समय) भी था जब युद्ध समाप्त हो रहा था और शांति की संभावनाएँ बन रही थीं, हालाँकि बहुत देर हो चुकी थी।
एक विशेष संध्या: 'एक साँझ' का अर्थ है वह विशेष संध्या जो महाभारत के इतिहास में अमर हो गई - जब दुर्योधन छिपा, पांडवों ने उसे ललकारा और अंतिम युद्ध हुआ।
निष्कर्ष: 'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक पूर्णतः औचित्यपूर्ण है क्योंकि यह महाभारत युद्ध के अंतिम क्षणों, कौरवों के अस्त होने के समय और उस ऐतिहासिक संध्या का सटीक चित्रण करता है जब महाभारत का महान युद्ध अपने चरम और अंतिम पड़ाव पर था। Quick Tip: 'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक सार्थक है क्योंकि यह युद्ध के अंतिम क्षणों, कौरवों के अस्त होने के समय और उस ऐतिहासिक संध्या को दर्शाता है जब महाभारत का महान युद्ध समाप्ति की ओर था।
Question 57:
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“मैं जानता था, तुम वहाँ नहीं जा सकोगी और जाने से भी क्या होता है। जब तुम उस नीची श्रेणी की विजातीय बहू को घर नहीं ला सकती, तब तक प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है। तुम सब निर्मम हो, निर्मम. . . ।”
- (संस्कार और भावना – विष्णु प्रभाकर)
प्रस्तुत कथन का वक्ता कौन है? ‘तुम वहाँ नहीं जा सकोगी’ ऐसा वक्ता ने श्रोता से क्यों कहा?
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प्रस्तुत कथन का वक्ता: इस कथन के वक्ता पिता हैं। वे अपनी पुत्री (श्रोता) से ये बातें कह रहे हैं।
‘तुम वहाँ नहीं जा सकोगी’ – ऐसा वक्ता ने श्रोता से क्यों कहा?
वक्ता (पिता) ने श्रोता (पुत्री) से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि:
पुत्री किसी दूसरी जगह या परिवार में जाना चाहती थी, संभवतः अपनी बहू या किसी नवविवाहिता के पास
पिता को पता था कि समाज के रूढ़िवादी विचारों के कारण पुत्री ऐसा नहीं कर पाएगी
वह जानते थे कि परिवार में फैली सामाजिक बुराइयाँ और संकीर्णता पुत्री को वहाँ जाने से रोकेंगी
पिता ने पुत्री के प्रेम और ममता के दावे को चुनौती दी कि यदि वह सच में प्रेम करती है तो उस नीची श्रेणी की बहू को घर ले आए, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती
पिता समाज के पाखंड और ऊँच-नीच के भेद को उजागर कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि केवल प्रेम और ममता की बातें करने से कुछ नहीं होता जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। Quick Tip: वक्ता पिता हैं। उन्होंने पुत्री से कहा कि वह वहाँ नहीं जा सकेगी क्योंकि समाज के रूढ़िवादी विचार और ऊँच-नीच का भेद उसे रोकेगा। वे प्रेम के व्यवहारिक रूप पर बल दे रहे हैं।
‘विजातीय’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? उसका परिचय दीजिए।
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‘विजातीय’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है?
‘विजातीय’ शब्द उस बहू की ओर संकेत करता है जो भिन्न जाति या समुदाय से संबंधित है। इसका अर्थ है – दूसरी जाति का, भिन्न जाति का, या जो अपनी जाति से अलग हो।
उसका परिचय:
वह एक विवाहिता स्त्री है जो किसी दूसरी जाति से आई है
वह 'नीची श्रेणी' की बताई गई है, जो समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को दर्शाता है
समाज के रूढ़िवादी लोग उसे अपने बराबर नहीं मानते
उसे घर की मुख्य धारा से अलग रखा जाता है
वह प्रेम और ममता की हकदार होते हुए भी सामाजिक भेदभाव का शिकार है
परिवार के लोग उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते
इस शब्द के माध्यम से लेखक ने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच और संकीर्णता पर प्रहार किया है। ‘विजातीय’ कहकर उस बहू को अलग करना समाज की मानसिकता को दर्शाता है जहाँ जाति इंसानियत से बड़ी है। Quick Tip: 'विजातीय' शब्द भिन्न जाति की बहू की ओर संकेत करता है। वह समाज में जातिगत भेदभाव का शिकार है। लेखक ने इस शब्द के माध्यम से सामाजिक संकीर्णता पर प्रहार किया है।
'प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है' - यह पंक्ति किस संदर्भ में कही गई है? श्रोता किन संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी?
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'प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है' - यह पंक्ति किस संदर्भ में कही गई है?
यह पंक्ति उस संदर्भ में कही गई है जब श्रोता (पुत्री) प्रेम और ममता की बातें तो कर रही थी, लेकिन व्यवहार में वह उस 'विजातीय' बहू को अपने घर नहीं ला सकती थी। पिता कह रहे हैं कि जब तुम उस नीची श्रेणी की बहू को घर नहीं ला सकती, तब तक केवल प्रेम और ममता की दुहाई देना व्यर्थ है। प्रेम और ममता केवल शब्दों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहार में दिखाना चाहिए। यहाँ पिता समाज के पाखंड पर कटाक्ष कर रहे हैं।
श्रोता किन संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी?
श्रोता (पुत्री) निम्नलिखित संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी:
जातिगत संस्कार: वह जाति-प्रथा के बंधन में बंधी थी, जहाँ ऊँच-नीच का भेद बहुत गहरा था।
सामाजिक रूढ़ियाँ: समाज में प्रचलित रूढ़िवादी परंपराओं और मान्यताओं से वह मुक्त नहीं हो पा रही थी।
पारिवारिक मर्यादाएँ: परिवार में स्थापित मर्यादाओं और नियमों के कारण वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही थी।
लोक-लाज का भय: समाज में क्या कहेंगे, इस भय ने उसे जकड़ रखा था।
पूर्वाग्रह: उसमें भी वही पूर्वाग्रह थे जो समाज में व्याप्त थे, भले ही वह प्रेम और ममता की बात करती हो। Quick Tip: पिता ने कहा कि बहू को घर न ला सकने पर प्रेम-ममता की दुहाई व्यर्थ है। श्रोता जातिगत संस्कारों, सामाजिक रूढ़ियों और लोक-लाज के भय में जकड़ी थी।
'संस्कार एवं भावना' एकांकी से हमें क्या शिक्षा प्राप्त होती है? आज के समाज के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए अपने विचार लिखिए।
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'संस्कार एवं भावना' एकांकी से प्राप्त शिक्षा:
जातिगत भेदभाव का विरोध: यह एकांकी हमें सिखाती है कि जाति के नाम पर किया जाने वाला भेदभाव गलत है। इंसान को इंसानियत से देखना चाहिए, जाति से नहीं।
प्रेम का व्यवहारिक रूप: केवल प्रेम और ममता की बातें करना पर्याप्त नहीं है, उसे व्यवहार में लाना आवश्यक है।
संकीर्ण संस्कारों से मुक्ति: हमें पुरानी रूढ़ियों और संकीर्ण संस्कारों से मुक्त होकर मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए।
समाज के पाखंड पर प्रहार: यह एकांकी समाज के उस पाखंड पर प्रहार करती है जहाँ लोग बातें तो ऊँची करते हैं, लेकिन व्यवहार संकीर्ण होता है।
आज के समाज के संदर्भ में मेरे विचार:
आज के समाज में स्थिति पहले से बेहतर जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह नहीं बदली:
आज भी कई स्थानों पर जातिगत भेदभाव देखने को मिलता है, खासकर विवाह के मामलों में
अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों को आज भी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है
शिक्षित और आधुनिक होने के बावजूद लोग पुराने संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाए हैं
शहरी क्षेत्रों में स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र आज भी रूढ़ियों से जकड़े हैं
आवश्यकता है कि हम अपने संस्कारों का पुनर्मूल्यांकन करें और मानवीय मूल्यों को अपनाएँ
शिक्षा का प्रसार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही इन रूढ़ियों से मुक्ति दिला सकता है
निष्कर्ष: 'संस्कार एवं भावना' एकांकी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में थी। यह हमें सिखाती है कि हमें अपने संस्कारों को मानवीय मूल्यों के अनुरूप ढालना चाहिए, न कि मानवीय भावनाओं को संकीर्ण संस्कारों के अनुरूप। Quick Tip: एकांकी से शिक्षा: जातिगत भेदभाव गलत है, प्रेम व्यवहारिक होना चाहिए। आज भी समाज में ये समस्याएँ हैं। हमें मानवीय मूल्यों को अपनाना होगा और रूढ़ियों से मुक्त होना होगा।
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
कोठा का दरवाज़ा खोलते ही जैसे ही उस स्थान में अंदर प्रवेश किया उन्हें लगा मानो स्वर्ग में आ गए हैं। कोठा के बाहर लॉन में मखमल के समान घास बिछी थी। लॉन में चारों ओर सुंदर रंग-बिरंगी कुर्सियाँ पड़ी थीं। रंग-बिरंगे फूलों के गमले कोठे की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे।
‘उस स्थान’ का प्रयोग किनके लिए किया गया है? वे कहाँ आए हैं?
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‘उस स्थान’ का प्रयोग किनके लिए किया गया है?
‘उस स्थान’ का प्रयोग अंतिम (वर-वधू) के लिए किया गया है। यह उनके ससुराल या विवाह स्थल की ओर संकेत करता है जहाँ वे आए हैं।
वे कहाँ आए हैं?
वे अपने नए वैवाहिक जीवन के स्थान पर आए हैं। यह संभवतः:
वर या वधू का नया घर (ससुराल) है
एक सुंदर सजा हुआ कोठा (मकान) है
जहाँ उनका स्वागत हो रहा है
जहाँ वे अपने जीवनसाथी के साथ रहेंगे Quick Tip: ‘उस स्थान’ का प्रयोग अंतिम (वर-वधू) के लिए किया गया है। वे अपने नए वैवाहिक जीवन के स्थान (ससुराल) पर आए हैं।
अंतिम के माता-पिता इस रिश्ते से प्रसन्न क्यों थे? कारण बताइए।
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अंतिम के माता-पिता इस रिश्ते से निम्नलिखित कारणों से प्रसन्न थे:
सुंदर और भव्य स्थान: उन्होंने देखा कि उनकी पुत्री/पुत्र जिस स्थान पर आया है, वह स्वर्ग के समान सुंदर है। यह देखकर वे प्रसन्न हुए।
समृद्धि का प्रतीक: कोठे की सजावट, मखमल जैसी घास, सुंदर कुर्सियाँ और रंग-बिरंगे फूलों के गमले उस परिवार की समृद्धि और सुंदर रुचि को दर्शाते हैं।
अच्छा भविष्य: इतने सुंदर और सजे-धजे स्थान को देखकर उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी संतान का भविष्य यहाँ सुखमय होगा।
स्वागत की भावना: इस सजावट से यह भी पता चलता है कि दूसरे पक्ष ने उनका पूरे मन से स्वागत किया है और उन्हें अपनाया है।
सामाजिक प्रतिष्ठा: इस प्रकार के भव्य स्थान से परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा का भी पता चलता है, जिससे माता-पिता प्रसन्न हुए।
इस प्रकार, अंतिम के माता-पिता नए स्थान की सुंदरता और समृद्धि को देखकर इस रिश्ते से अत्यंत प्रसन्न थे। Quick Tip: अंतिम के माता-पिता इस रिश्ते से प्रसन्न थे क्योंकि उन्होंने स्थान की सुंदरता, समृद्धि और भव्यता देखी, जिससे उन्हें अपनी संतान के सुखद भविष्य का विश्वास हुआ।
लड़की पसंद न होने पर भी अभित्र विवाह के लिए मना क्यों नहीं कर रहा था? वास्तव में अभित्र के हृदय में किसने स्थान बना लिया था?
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लड़की पसंद न होने पर भी अभित्र विवाह के लिए मना क्यों नहीं कर रहा था?
अभित्र लड़की पसंद न होने पर भी विवाह के लिए इसलिए मना नहीं कर रहा था क्योंकि:
वह अपने माता-पिता की इच्छा का सम्मान करता था और उन्हें दुखी नहीं देखना चाहता था
पारिवारिक मर्यादाओं और सामाजिक बंधनों में बंधा होने के कारण वह विरोध नहीं कर पा रहा था
वह एक जिम्मेदार पुत्र था जो माता-पिता के निर्णय को स्वीकार करने में विश्वास रखता था
शायद वह यह भी सोच रहा था कि शादी के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा
वास्तव में अभित्र के हृदय में किसने स्थान बना लिया था?
वास्तव में अभित्र के हृदय में सरिता ने स्थान बना लिया था। अभित्र सरिता से प्रेम करता था और उसके मन में सरिता के प्रति गहरी भावनाएँ थीं। इस कारण वह किसी और से विवाह करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था, फिर भी पारिवारिक दबाव के कारण वह खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा था। Quick Tip: अभित्र माता-पिता की इच्छा और पारिवारिक मर्यादाओं के कारण विरोध नहीं कर पा रहा था, जबकि उसके हृदय में सरिता ने स्थान बना लिया था।
अभित्र और सरिता को अकेले में मिलने का अवसर मिलने पर दोनों के बीच क्या बातचीत हुई? क्या अभित्र उस मुलाकात से संतुष्ट था?
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अभित्र और सरिता के बीच बातचीत:
अभित्र और सरिता को अकेले में मिलने का अवसर मिलने पर दोनों के बीच भावनात्मक और गंभीर बातचीत हुई:
दोनों ने एक-दूसरे के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया
अभित्र ने सरिता को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और माता-पिता की इच्छा के बारे में बताया
सरिता ने भी अपनी भावनाएँ प्रकट कीं और अभित्र की स्थिति को समझने की कोशिश की
दोनों अपने भविष्य को लेकर चिंतित और अनिश्चित थे
शायद उन्होंने एक-दूसरे से वादा किया या अपनी मजबूरियाँ बताईं
क्या अभित्र उस मुलाकात से संतुष्ट था?
नहीं, अभित्र उस मुलाकात से संतुष्ट नहीं था। इसके कारण:
वह सरिता से मिलकर खुश था, लेकिन उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रही
वह सरिता को कोई पुख्ता आश्वासन नहीं दे पाया
पारिवारिक दबाव और सामाजिक बंधनों के कारण वह अपनी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाया
मुलाकात के बाद भी उसके मन में दुविधा और असंतोष बना रहा
वह चाहकर भी सरिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पा रहा था Quick Tip: अभित्र और सरिता की मुलाकात भावनात्मक रही, लेकिन अभित्र संतुष्ट नहीं था क्योंकि वह सरिता को कोई आश्वासन नहीं दे पाया और भविष्य अनिश्चित बना रहा।
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
मौनू अमित के कमरे में प्रवेश किया तो देखा कि अमित अपने पलंग पर लेटा हुआ अपनी माँ से बातें कर रहा था। मौनू को देखकर उन्होंने प्रेमपूर्वक बैठाया। उसे देखकर अमित के उदास चेहरे पर भी खुशी की लहर दौड़ गई।
मौनू अमित से मिलने कहाँ गई थी? जाते समय उसके मन में क्या विचार उठ रहे थे?
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मौनू अमित से मिलने कहाँ गई थी?
मौनू अमित से मिलने उसके घर गई थी। वह अमित के कमरे में गई जहाँ अमित अपने पलंग पर लेटा हुआ था।
जाते समय उसके मन में क्या विचार उठ रहे थे?
जाते समय मौनू के मन में निम्नलिखित विचार उठ रहे होंगे:
वह अमित से मिलने को लेकर उत्सुक और घबराई हुई थी
उसे यह चिंता थी कि अमित की तबीयत कैसी है
वह सोच रही होगी कि अमित उसे देखकर कैसी प्रतिक्रिया देगा
उसके मन में अमित के प्रति प्रेम और सहानुभूति के भाव थे
वह अमित के उदास चेहरे को देखकर दुखी थी और उसे खुश करना चाहती थी Quick Tip: मौनू अमित के घर उससे मिलने गई थी। जाते समय वह अमित की तबीयत को लेकर चिंतित और उत्सुक थी।
कमरे में प्रवेश करते ही मौनू ने क्या देखा? अमित के साथ क्या दुर्घटना घटी थी?
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कमरे में प्रवेश करते ही मौनू ने क्या देखा?
कमरे में प्रवेश करते ही मौनू ने देखा कि:
अमित अपने पलंग पर लेटा हुआ था
वह अपनी माँ से बातें कर रहा था
अमित का चेहरा उदास था
मौनू को देखकर अमित की माँ ने उसे प्रेमपूर्वक बैठाया
अमित के साथ क्या दुर्घटना घटी थी?
अमित के साथ कोई दुर्घटना घटी थी जिसके कारण वह पलंग पर लेटा हुआ था। संभवतः:
वह बीमार था या उसे कोई चोट आई थी
किसी कारणवश उसकी तबीयत ठीक नहीं थी
वह कमजोर या अशक्त अवस्था में था
इसी कारण वह उठकर बैठ भी नहीं पा रहा था और लेटा हुआ था
अमित के उदास चेहरे से भी यह स्पष्ट होता है कि उसके साथ कुछ बुरा हुआ था, लेकिन मौनू को देखकर उसके चेहरे पर खुशी आ गई। Quick Tip: मौनू ने देखा कि अमित पलंग पर लेटा हुआ अपनी माँ से बातें कर रहा था। उसके साथ कोई दुर्घटना घटी थी जिससे वह बीमार या घायल था।
अपनी माँ और मौनू के बीच हुई किस बात को सुनकर अमित प्रसन्न हुआ? दूसरे शब्दों में उसके प्रसन्नता का क्या कारण था?
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अपनी माँ और मौनू के बीच हुई किस बात को सुनकर अमित प्रसन्न हुआ?
अमित तब प्रसन्न हुआ जब उसने अपनी माँ और मौनू के बीच यह बातचीत सुनी कि मौनू उसके घर पर ही रुकने वाली है। माँ ने मौनू से कहा होगा कि वह कुछ दिनों के लिए उनके घर पर रुक जाए, और मौनू ने यह स्वीकार कर लिया।
दूसरे शब्दों में उसके प्रसन्नता का क्या कारण था?
अमित की प्रसन्नता का कारण था:
मौनू का उसके घर पर रुकना, जिससे वह उसे अधिक समय दे सकेगा
उसकी बीमारी या दुर्बलता के समय में मौनू का पास होना
मौनू के प्रति उसके मन में गहरा लगाव और प्रेम था, इसलिए उसकी उपस्थिति से वह खुश था
वह मौनू से बातें कर सकेगा, उसे देख सकेगा और उसका साथ पा सकेगा
मौनू के आने से उसका अकेलापन दूर हो जाएगा
इस प्रकार, मौनू के घर पर रुकने की बात सुनकर अमित अत्यंत प्रसन्न हुआ। Quick Tip: अमित तब प्रसन्न हुआ जब उसने सुना कि मौनू उसके घर पर रुकने वाली है। इससे उसे मौनू का साथ मिल सकेगा और उसका अकेलापन दूर होगा।
'नया रास्ता' उपन्यास द्वारा लेखिका ने पाठकों को क्या संदेश दिया है?
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'नया रास्ता' उपन्यास द्वारा लेखिका ने पाठकों को निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं:
जीवन में नए मार्ग का चयन: उपन्यास का शीर्षक 'नया रास्ता' स्वयं इस बात का संकेत है कि जीवन में पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं को छोड़कर नए मार्ग पर चलने का साहस करना चाहिए।
प्रेम और भावनाओं का सम्मान: उपन्यास हमें सिखाता है कि हमें अपनी भावनाओं और प्रेम का सम्मान करना चाहिए, न कि केवल सामाजिक दबाव में आकर निर्णय लेने चाहिए।
सामाजिक बंधनों से मुक्ति: लेखिका ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, जातिगत भेदभाव और पारिवारिक दबावों से मुक्त होकर अपने निर्णय स्वयं लेने का संदेश दिया है।
आत्मनिर्भरता: उपन्यास में स्त्री-पुरुष दोनों को आत्मनिर्भर बनने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की प्रेरणा दी गई है।
मानवीय मूल्यों की प्राथमिकता: लेखिका ने बताया है कि जाति, धर्म, वर्ग से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
साहस और संघर्ष: उपन्यास यह संदेश देता है कि जीवन में सही रास्ता चुनने के लिए साहस और संघर्ष की आवश्यकता होती है, लेकिन अंत में यही रास्ता सुख और संतोष देता है।
निष्कर्ष: 'नया रास्ता' उपन्यास पाठकों को प्रेरित करता है कि वे पुरानी रूढ़ियों को तोड़ें, अपनी भावनाओं का सम्मान करें और जीवन में नए मार्ग पर चलने का साहस करें। यह उपन्यास सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर मानवीय मूल्यों को अपनाने का संदेश देता है। Quick Tip: 'नया रास्ता' उपन्यास का संदेश: पुरानी रूढ़ियाँ छोड़ो, नए मार्ग पर चलो, अपनी भावनाओं का सम्मान करो, आत्मनिर्भर बनो और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दो।
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
मौनू सीधे अपनी माँ के कमरे में चली गई। माँ उसकी राह देखकर अभी-अभी बिस्तर पर लेटी थी। मौनू भी माँ के पास पलंग पर जाकर लेट गई। मौनू और माँ बहुत देर तक लेटे-लेटे बातें करती रहीं। यह जाने मौनू को कब नींद आ गई। फिर सुबह 6:00 बजे उसकी आँख खुली।
मौनू कहाँ से आई थी? उसे छोड़ने कौन आया था?
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मौनू कहाँ से आई थी?
मौनू अमित के घर से आई थी। वह अमित से मिलने गई थी और वहाँ से लौटकर अपने घर आई थी।
उसे छोड़ने कौन आया था?
मौनू को छोड़ने अमित के घर से कोई व्यक्ति आया था। संभवतः:
अमित के परिवार का कोई सदस्य
अमित का कोई नौकर या ड्राइवर
कोई रिश्तेदार या परिचित
यह व्यक्ति मौनू को सुरक्षित उसके घर तक छोड़ गया था। Quick Tip: मौनू अमित के घर से आई थी। उसे छोड़ने अमित के घर से कोई व्यक्ति आया था।
मौनू के देर होने का क्या कारण था? उसके मन की चिंता का वर्णन कीजिए।
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मौनू के देर होने का क्या कारण था?
मौनू के देर होने का कारण था कि वह अमित से मिलने उसके घर गई थी और वहाँ अधिक समय तक रुक गई। अमित की बीमारी या दुर्बलता के कारण वह वहाँ देर तक रुकी और बातें करती रही।
उसके मन की चिंता का वर्णन:
मौनू के मन में निम्नलिखित चिंताएँ थीं:
वह इस बात को लेकर चिंतित थी कि उसके देर से घर आने पर माँ क्या सोचेंगी
उसे डर था कि माँ नाराज़ न हो जाएँ
वह सोच रही थी कि माँ से क्या बहाना बनाएगी
अमित की बीमारी और उसकी हालत को लेकर भी वह चिंतित थी
उसके मन में अमित के प्रति प्रेम और उसकी स्थिति को लेकर दुविधा थी
वह यह भी सोच रही थी कि भविष्य में क्या होगा
लेकिन जब वह घर पहुँची और माँ से मिली, तो माँ ने उसे प्यार से बैठाया और बातें कीं। माँ के साथ बातें करते-करते उसे नींद आ गई और उसकी सारी चिंताएँ कुछ देर के लिए कम हो गईं। Quick Tip: मौनू के देर होने का कारण अमित के घर पर अधिक समय तक रुकना था। वह माँ की नाराज़गी और अमित की बीमारी को लेकर चिंतित थी।
सुबह उठते ही माँ के हाथ की चाय मिलते ही मौनू को कैसी अनुभूति हुई और क्यों?
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सुबह उठते ही माँ के हाथ की चाय मिलते ही मौनू को कैसी अनुभूति हुई?
सुबह उठते ही माँ के हाथ की चाय मिलते ही मौनू को अपार सुख, शांति और सुरक्षा की अनुभूति हुई। उसे लगा मानो सारी थकान और चिंताएँ दूर हो गई हों।
ऐसी अनुभूति क्यों हुई?
मौनू को ऐसी अनुभूति होने के निम्नलिखित कारण थे:
माँ का हाथ की चाय में उनके प्यार और ममता का अहसास था
माँ की चाय ने उसे वह सुकून दिया जो दुनिया की कोई और चीज़ नहीं दे सकती
रात भर की चिंताओं और थकान के बाद माँ का यह स्नेहिल स्पर्श उसके लिए अमृत समान था
माँ का प्यार उसकी सबसे बड़ी ताकत थी और उसे हमेशा सुरक्षा का एहसास कराता था
चाय के साथ माँ का आशीर्वाद और दुलार भी मिला होगा
इस प्रकार, माँ के हाथ की चाय ने मौनू को न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक सुकून भी प्रदान किया। Quick Tip: माँ के हाथ की चाय पीकर मौनू को अपार सुख और शांति मिली क्योंकि इसमें माँ के प्यार, ममता और आशीर्वाद का अहसास था।
नीलिमा के घर जाते समय मौनू ने किस रंग का सूट पहना? सूट पहने देखकर माँ ने क्या कहा? उनकी बात का मौनू ने क्या जवाब दिया?
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नीलिमा के घर जाते समय मौनू ने किस रंग का सूट पहना?
नीलिमा के घर जाते समय मौनू ने लाल रंग का सूट पहना था। लाल रंग उत्साह, ऊर्जा और सौंदर्य का प्रतीक है।
सूट पहने देखकर माँ ने क्या कहा?
मौनू को लाल सूट पहने देखकर माँ ने प्रसन्नता और प्रशंसा भरे शब्द कहे। संभवतः माँ ने कहा:
"बहुत सुंदर लग रही है बेटा"
"लाल रंग तुझ पर बहुत खिल रहा है"
"आज बहुत अच्छी लग रही हो"
माँ की बातों में बेटी के प्रति गर्व और प्रेम झलक रहा था।
उनकी बात का मौनू ने क्या जवाब दिया?
माँ की बात का मौनू ने विनम्र और स्नेहिल जवाब दिया। संभवतः उसने कहा:
"माँ, आपको अच्छा लगा तो मुझे बहुत खुशी हुई"
"आपने सिखाया है तो ऐसे ही तो रहना होगा"
या फिर वह शर्मा कर मुस्कुरा दी
मौनू के जवाब से उसकी माँ के प्रति प्रेम और सम्मान का पता चलता है। Quick Tip: मौनू ने नीलिमा के घर जाते समय लाल रंग का सूट पहना। माँ ने उसकी प्रशंसा की और मौनू ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया।







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