IISER Aptitude Test 2026 Question Paper in Hindi is available for download. IISER conducted Aptitude Test 2026 on June 7 in single shift from 9 AM to 12 PM.
- IISER 2026 Question Paper consists of total 60 questions divided into 4 sections –Physics, Chemistry, Mathematics and Biology (15 questions each).
- As per the IISER 2026 exam pattern 4 marks are awarded for every correct answer and 1 mark is deducted for every wrong answer.
- The total duration of the exam is 3 hours.
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IISER Aptitude Test 2026 Question Paper with Solutions in Hindi
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निम्नलिखित में से कौन सी प्रक्रियाएं प्रकाश संश्लेषण के दौरान थाइलेकोइड झिल्ली के आर-पार प्रोटॉन प्रवणता के विकास में क्रियान्वित होती हैं?
i. प्लास्टोक्विनोन द्वारा थाइलेकोइड की अवकाशिका में प्रोटॉन्स की मुक्ति
ii. एनएडीपी+ (NADP+) के अपचयन के दौरान पीठिका में प्रोटॉन्स का उपभोग
iii. एटीपी सिंथेज द्वारा थाइलेкоइड की अवकाशिका में प्रोटॉन्स की मुक्ति
iv. जल विघटन प्रतिक्रिया द्वारा थाइलेकोइड की अवकाशिका में प्रोटॉन्स की मुक्ति
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न थाइलेकोइड झिल्ली के पार केमियोस्मोटिक परिकल्पना (Chemiosmotic Hypothesis) के अनुसार प्रोटॉन प्रवणता (proton gradient) के निर्माण से संबंधित है।
प्रकाश संश्लेषण के दौरान एटीपी (\(ATP\)) के संश्लेषण के लिए थाइलेकोइड की अवकाशिका (lumen) में प्रोटॉन्स की सांद्रता को बढ़ाना और पीठिका (stroma) में कम करना आवश्यक होता है।
हमें उन सही प्रक्रियाओं की पहचान करनी है जो अवकाशिका में प्रोटॉन सांद्रता को बढ़ाती हैं या पीठिका में कम करती हैं।
Step 2: Key Formula or Approach:
केमियोस्मोटिक सिद्धांत के अनुसार, प्रोटॉन प्रवणता तीन मुख्य कारणों से बनती है:
1. जल का प्रकाश-अपघटन जो थाइलेकोइड अवकाशिका की आंतरिक सतह पर होता है और प्रोटॉन्स मुक्त करता है।
2. प्लास्टोक्विनोन (\(PQ\)) द्वारा प्रोटॉन्स को पीठिका से अवकाशिका में स्थानांतरित करना।
3. एनएडीपी रिडक्टेस (\(NADP\) reductase) एंजाइम द्वारा पीठिका में एनएडीपी+ (\(NADP^+\)) के अपचयन के लिए प्रोटॉन्स का उपयोग करना।
Step 3: Detailed Explanation:
कथन i: प्लास्टोक्विनोन एक hydrogen वाहक है जो इलेक्ट्रॉनों के साथ-साथ प्रोटॉन्स को पीठिका (stroma) से प्राप्त करता है और उन्हें थाइलेकोइड की अवकाशिका (lumen) में मुक्त करता है। यह कथन सही है।
कथन ii: एनएडीपी+ (\(NADP^+\)) का अपचयन थाइलेकोइड झिल्ली की पीठिका (stroma) की ओर होता है। इस प्रक्रिया में पीठिका से प्रोटॉन्स (\(H^+\)) का उपयोग किया जाता है, जिससे पीठिका में प्रोटॉन की सांद्रता घटती है। यह कथन सही है।
कथन iii: एटीपी सिंथेज (\(ATP\) Synthase) के माध्यम से प्रोटॉन्स अवकाशिका से पीठिका की ओर गति करते हैं (अर्थात अवकाशिका से प्रोटॉन्स का निकास होता है, न कि अवकाशिका में मुक्ति)। इसलिए यह कथन गलत है।
कथन iv: जल का विघटन (splitting of water) थाइलेकोइड झिल्ली के अंदरूनी हिस्से (अवकाशिका की तरफ) होता है, जिससे उत्पन्न होने वाले प्रोटॉन्स सीधे अवकाशिका में जमा होते हैं। यह कथन सही है।
अतः सही कथन i, ii और iv हैं, जो विकल्प (A) में दिए गए हैं।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि कथन i, ii और iv मिलकर थाइलेकोइड झिल्ली के आर-पार एक मजबूत प्रोटॉन प्रवणता स्थापित करते हैं। Quick Tip: याद रखें कि थाइलेकोइड की अवकाशिका (lumen) में हमेशा प्रोटॉन सांद्रता (\(H^+\)) बढ़ती है और पीठिका (stroma) में प्रोटॉन सांद्रता घटती है।
एटीपी सिंथेज इस प्रवणता का उपयोग करके एटीपी बनाता है और अवकाशिका से प्रोटॉन्स बाहर निकालता है।
निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प स्तम्भ I में दिए गए अंगों को स्तम्भ II में विवरणित उनके संवहनी तंत्र की व्यवस्था से मेल करता है?
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Step 1: Understanding the Question:
इस प्रश्न में हमें द्विबीजपत्री (dicot) तथा एकबीजपत्री (monocot) पौधों के तनों और जड़ों में पाए जाने वाले संवहनी बंडलों (vascular bundles) के प्रकारों और व्यवस्था का सही मिलान करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
विभिन्न पादप अंगों में संवहनी बंडलों की पहचान करने के लिए निम्नलिखित नियमों का उपयोग करें:
1. जड़ों (Roots) में हमेशा संवहनी बंडल अरीय (radial) प्रकार के होते हैं।
2. तनों (Stems) में हमेशा संवहनी बंडल संयुक्त (conjoint) प्रकार के होते हैं।
3. एकबीजपत्री पौधों में कैम्बियम की अनुपस्थिति के कारण संवहनी बंडल बंद (closed) होते हैं, जबकि द्विबीजपत्री में कैम्बियम उपस्थित होने के कारण वे खुले (open) होते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
P. द्विबीजपत्री मूल (Dicot root): इनमें संवहनी बंडल अरीय (radial) होते हैं, और आदिदारुक (protoxylem) की संख्या द्वि-आदिदारुक से चतुर-आदिदारुक (diarch to tetrarch) होती है। विकास की प्रारंभिक अवस्था में ये बंद होते हैं परंतु बाद में इनमें द्वितीयक वृद्धि के लिए कैम्बियम बनता है, जिससे इन्हें खुला भी माना जाता है। यह विकल्प (i) से मेल खाता है।
Q. द्विबीजपत्री तना (Dicot stem): इनमें संवहनी बंडल छल्ले (ring) के रूप में व्यवस्थित होते हैं, संयुक्त (conjoint) और कैम्बियम की उपस्थिति के कारण खुले (open) होते हैं। यह विकल्प (ii) से मेल खाता है।
R. एकबीजपत्री मूल (Monocot root): इनमें संवहनी बंडल अरीय (radial) होते हैं, बंद (closed) होते हैं और जाइलम बंडलों की संख्या बहुत अधिक (polyarch या बहु-आदिदारुक) होती है। यह विकल्प (iii) से मेल खाता है।
S. एकबीजपत्री तना (Monocot stem): इनमें संवहनी बंडल भरण ऊतक में बिखरे हुए (scattered) होते हैं, संयुक्त (conjoint) और बंद (closed) होते हैं। यह विकल्प (iv) से मेल खाता है।
अतः, सही मिलान P - (i); Q - (ii); R - (iii); S - (iv) है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह सभी अंगों के संवहनी तंत्रों का पूर्णतः सही वैज्ञानिक मिलान प्रस्तुत करता है। Quick Tip: याद रखने की सरल ट्रिक:
'मूल' (Root) = 'अरीय' (Radial)
'तना' (Stem) = 'संयुक्त' (Conjoint)
'एकबीजपत्री' (Monocot) = 'बंद' (Closed)
'द्विबीजपत्री' (Dicot) = 'खुला' (Open)
निम्नलिखित आरेख दो जीवों, नामानुसार P और Q, के अकेले और साथ-साथ में वृद्धि के प्रतिरूप को प्रदर्शित करते हैं। इन वृद्धि प्रतिरूप के आधार पर निम्नलिखित में से कौन सा वक्तव्य सही है?
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Step 1: Understanding the Question:
इस प्रश्न में हमें दो प्रजातियों P और Q के अलग-अलग और एक साथ संवर्धन के दौरान उनकी जनसंख्या वृद्धि वक्रों का विश्लेषण करना है।
हमें यह निर्धारित करना है कि इनके बीच किस प्रकार की समष्टि पारस्परिक क्रिया (population interaction) हो रही है।
Step 2: Key Formula or Approach:
विभिन्न पारस्परिक क्रियाओं के प्रभाव इस प्रकार हैं:
1. परभक्षण (Predation): इसमें एक प्रजाति (परभक्षी) को लाभ (\(+\)) होता है और दूसरी (शिकार) को हानि (\(-\)) होती है।
2. सहोपकारिता (Mutualism): दोनों प्रजातियों को पारस्परिक लाभ (\(+\), \(+\)) होता है।
3. सहभोजिता (Commensalism): एक प्रजाति को लाभ (\(+\)) होता है और दूसरी अप्रभावित (\(0\)) रहती.
4. परजीविता (Parasitism): परजीवी को लाभ (\(+\)) और मेजबान को हानि (\(-\)) होती है, परंतु परजीवी अपने मेजबान के बिना जीवित नहीं रह सकता।
Step 3: Detailed Explanation:
अकेले वृद्धि: जब P और Q को अलग-अलग संवर्धित किया जाता है, तो दोनों ही अपनी वहन क्षमता (carrying capacity) तक पहुँचते हैं। इसका मतलब है कि दोनों स्वतंत्र रूप से जीवित रहने में सक्षम हैं।
साथ में वृद्धि: जब P और Q को एक साथ रखा जाता है, तो Q की वृद्धि सामान्य रहती है (यह वहन क्षमता तक पहुँचता है), लेकिन P की जनसंख्या तेजी से गिरकर शून्य के करीब पहुँच जाती है।
यह दर्शाता है कि Q की उपस्थिति P के लिए अत्यंत हानिकारक है। चूंकि P अकेले अच्छी तरह से बढ़ता है, इसलिए वह परजीवी नहीं हो सकता (क्योंकि परजीवी मेजबान के बिना जीवित नहीं रह सकता)।
यह व्यवहार तीव्र परभक्षण (predation) को दर्शाता है जहाँ Q एक परभक्षी है जो P (शिकार) को खा जाता है, जिससे P की समष्टि समाप्त हो जाती है।
अतः, दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर "Q परभक्षी है P का" है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है जो यह स्पष्ट करता है कि Q की उपस्थिति में P की समष्टि में गिरावट परभक्षण का परिणाम है। Quick Tip: यदि कोई प्रजाति अकेले स्वस्थ रूप से बढ़ती है लेकिन दूसरी प्रजाति की उपस्थिति में समाप्त हो जाती है, तो यह पारस्परिक क्रिया या तो स्पर्धा (competition) है या तीव्र परभक्षण (predation)।
चूंकि विकल्प में स्पर्धा नहीं है, इसलिए परभक्षण ही एकमात्र तार्किक विकल्प है।
pBR322 क्लोनिंग संवाहक में, टेट्रासाइक्लिन एवं एम्पीसिलीन प्रतिरोध को कुटलेखित करने के जीन हैं। एक बाहरी डीएनए जिसे क्लोन करना है, उसे टेट्रासाइक्लिन प्रतिरोधी जीन के बीच में अंतःस्थापित किया जाता है और पुनर्योगज प्लाज्मिड को ई.कोलाई कोशिकाओं में स्थानांतरित कर दिया जाता है। निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प इस क्लोनिंग प्रक्रिया का प्रतिफल होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न जैव प्रौद्योगिकी में प्रयुक्त प्लाज्मिड वाहक pBR322 और उसमें 'निवेशी अक्रियकरण' (insertional inactivation) की घटना पर आधारित है।
हमें यह निर्धारित करना है कि जब एक विजातीय डीएनए को विशिष्ट एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन में डाला जाता, तो कोशिकाओं के प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. pBR322 में दो प्रमुख वरणयोग्य चिन्हक (selectable markers) होते हैं: एम्पीसिलीन प्रतिरोधी जीन (\(amp^R\)) और टेट्रासाइक्लिन प्रतिरोधी जीन (\(tet^R\))।
2. जब बाहरी डीएनए को किसी विशिष्ट एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन (जैसे \(tet^R\)) के भीतर जोड़ा जाता है, तो वह जीन निष्क्रिय हो जाता है। इसे निवेशी अक्रियकरण कहते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
पुनर्योगज प्लाज्मिड (Recombinant Plasmid): चूंकि बाहरी डीएनए को टेट्रासाइक्लिन प्रतिरोधी जीन के बीच अंतःस्थापित किया गया है, इसलिए टेट्रासाइक्लिन प्रतिरोधकता नष्ट हो जाती है। लेकिन एम्पीसिलीन प्रतिरोधी जीन अप्रभावित रहता है।
इसके परिणामस्वरूप, पुनर्योगज कोशिकाएं एम्पीसिलीन युक्त माध्यम पर तो जीवित रह सकती हैं और बढ़ सकती हैं, लेकिन टेट्रासाइक्लिन युक्त माध्यम पर वे नष्ट हो जाएंगी।
अपुनर्योगज प्लाज्मिड (Non-recombinant Plasmid): इनमें कोई बाहरी डीएनए नहीं जुड़ता, इसलिए इनके दोनों जीन (\(amp^R\) और \(tet^R\)) सक्रिय रहते हैं। ये कोशिकाएं एम्पीसिलीन और टेट्रासाइक्लिन दोनों ही माध्यमों पर वर्धन कर सकती हैं।
अतः, विकल्प (A) इस वैज्ञानिक स्थिति का सही वर्णन करता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि पुनर्योगज कोशिकाएं निवेशी अक्रियकरण के कारण टेट्रासाइक्लिन के प्रति अपनी प्रतिरोधकता खो देती हैं। Quick Tip: जहाँ भी बाहरी जीन को डाला जाता है, वह विशिष्ट प्रतिरोधी जीन निष्क्रिय हो जाता है।
यदि \(tet^R\) स्थल पर क्लोनिंग की गई है, तो कोशिका टेट्रासाइक्लिन के प्रति संवेदनशील (sensitive) हो जाएगी लेकिन एम्पीसिलीन के प्रति प्रतिरोधी बनी रहेगी।
निम्नलिखित में से कौन से एंजाइम क्रियाविधि आरेख में क्रियाधार 'S' के लिए एंजाइम का Km 20 होगा? [S] क्रियाधार की सांद्रता को इंगित करता है।
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न एंजाइम गतिकी (enzyme kinetics) और माइकैलिस स्थिरांक (\(K_m\)) की अवधारणा पर आधारित है।
हमें दिए गए आरेखों में से उस ग्राफ की पहचान करनी है जिसके लिए \(K_m\) का मान 20 है।
Step 2: Key Formula or Approach:
माइकैलिस स्थिरांक (\(K_m\)) क्रियाधार की वह सांद्रता (\([S]\)) होती है जिस पर एंजाइम द्वारा उत्प्रेरित अभिक्रिया का वेग उसके अधिकतम वेग (\(V_{max}\)) का आधा होता है:
\[ V = \frac{V_{max}}{2} पर [S] = K_m \]
Step 3: Detailed Explanation:
दिए गए सभी आरेखों में अधिकतम वेग (\(V_{max}\)) का मान 16 है।
अतः आधे अधिकतम वेग का मान होगा:
\[ \frac{V_{max}}{2} = \frac{16}{2} = 8 \]
अब हमें वह आरेख खोजना है जिसमें वेग \(V = 8\) होने पर क्रियाधार सांद्रता \([S]\) का मान X-अक्ष पर 20 हो।
आरेख (a) में: जब हम Y-अक्ष पर \(V = 8\) देखते हैं, तो उसके संगत X-अक्ष पर क्रियाधार सांद्रता \([S]\) का मान बिल्कुल 20 है। अतः इस आरेख में एंजाइम का \(K_m = 20\) है।
आरेख (b) में: जब \(V = 8\) है, तो संगत सांद्रता का मान 40 है (अर्थात यहाँ \(K_m = 40\) है)।
आरेख (c) में: \(V = 8\) पर सांद्रता 10 से कम है।
आरेख (d) में: \(V = 8\) पर सांद्रता का मान 40 के पास है।
अतः केवल आरेख (a) ही दी गई शर्त को पूर्ण करता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है जो आरेख (a) को सही सिद्ध करता है। Quick Tip: \(K_m\) का पता लगाने के लिए हमेशा सबसे पहले ग्राफ में \(V_{max}\) का मान देखें।
उसका आधा करके Y-अक्ष से वक्र रेखा पर जाएं और नीचे X-अक्ष पर संबंधित क्रियाधार सांद्रता को पढ़ें।
निम्नलिखित मे से कौन सा विकल्प पुटिका प्रेरक हार्मोन एवं एस्ट्रोजेन के कार्य करने के तरीके को सही ढंग से विवरणित करता है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न हार्मोन की रासायनिक प्रकृति (पेप्टाइड बनाम स्टेरॉयड) और उनके विशिष्ट ग्राहियों (receptors) के प्रकारों से संबंधित है।
हमें पुटिका प्रेरक हार्मोन (FSH) और एस्ट्रोजेन की कार्यविधि की तुलना करनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. पेप्टाइड/प्रोटीन हार्मोन (जैसे FSH) जल-घुलनशील होते हैं और कोशिका झिल्ली को पार नहीं कर सकते। इसलिए वे झिल्ली-योजित ग्राहियों से जुड़ते हैं और द्वितीयक दूत (secondary messengers) जैसे चक्रिय AMP (\(cAMP\)) का निर्माण करते हैं।
2. स्टेरॉयड हार्मोन (जैसे एस्ट्रोजेन) लिपिड-घुलनशील होते हैं और कोशिका झिल्ली को आसानी से पार कर जाते हैं। वे सीधे कोशिका के भीतर अंतरकोशिकीय ग्राहियों (intracellular receptors) से जुड़कर कार्य करते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
पुटिका प्रेरक हार्मोन (FSH): यह एक ग्लाइकोप्रोटीन हार्मोन है। यह कोशिका की सतह पर स्थित झिल्ली-योजित ग्राहियों से बंधता है। इसके बाद यह कोशिका के भीतर एक द्वितीयक दूत, चक्रिय AMP (\(cAMP\)), का उत्पादन करता है जो कोशिकीय प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करता है।
एस्ट्रोजेन (Estrogen): यह एक स्टेरॉयड हार्मोन है। लिपिड-घुलनशील होने के कारण यह सीधे कोशिका झिल्ली को पार कर जाता है और केंद्रक के भीतर स्थित अंतरकोशिकीय ग्राहियों से जुड़ता है। यह हार्मोन-ग्राही सम्मिश्र सीधे जीन अभिव्यक्ति और प्रोटीन संश्लेषण का नियमन करता है।
अतः, विकल्प (A) इन दोनों हार्मोनों के कार्य करने के तरीकों का सही वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत करता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह हार्मोनों की रासायनिक प्रकृति के अनुसार उनकी सही कार्यविधि को दर्शाता है। Quick Tip: याद रखें:
पेप्टाइड/प्रोटीन हार्मोन = झिल्ली-योजित ग्राही + द्वितीयक दूत (cAMP, \(Ca^{2+}\))
स्टेरॉयड/थायराइड हार्मोन = अंतरकोशिकीय ग्राही + प्रत्यक्ष जीन नियमन
यदि कोशिका भित्ति को जीवों को वर्गीकृत करने के एकमात्र मापदंड के रूप में प्रयोग किया जाता, तो माईकोप्लाज्मा निम्नलिखित में से किस समूह से संबंधित होता?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न जैविक वर्गीकरण के सिद्धांतों पर आधारित एक वैचारिक प्रश्न है।
हमें यह निर्धारित करना है कि यदि वर्गीकरण का एकमात्र आधार केवल 'कोशिका भित्ति की उपस्थिति' को माना जाए, तो कोशिका भित्ति रहित माईकोप्लाज्मा को किस समूह में स्थान मिलेगा।
Step 2: Key Formula or Approach:
विभिन्न समूहों में कोशिका भित्ति की स्थिति निम्नलिखित है:
1. प्राणी (Animals): इनमें कोशिका भित्ति का पूर्ण अभाव होता है।
2. पादप (Plants): इनमें सेल्युलोज की बनी सुस्पष्ट कोशिका भित्ति होती है।
3. कवक (Fungi): इनमें काइटिन की बनी कोशिका भित्ति होती है।
4. माईकोप्लाज्मा (Mycoplasma): ये प्रोकैरियोटिक जीव हैं जिनमें कोशिका भित्ति का पूर्ण अभाव होता है।
Step 3: Detailed Explanation:
माईकोप्लाज्मा सबसे सरल और सबसे छोटे स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीव हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कोशिका भित्ति (cell wall) नहीं पाई जाती है।
यदि वर्गीकरण का एकमात्र मापदंड 'कोशिका भित्ति' की उपस्थिति या अनुपस्थिति को बनाया जाता, तो सभी कोशिका भित्ति वाले जीवों (जैसे पादप और कवक) को एक समूह में रखा जाता।
और जिन जीवों में कोशिका भित्ति का पूर्ण अभाव है (जैसे प्राणी), उन्हें दूसरे समूह में रखा जाता।
चूंकि माईकोप्लाज्मा में कोशिका भित्ति नहीं होती है, इसलिए इस काल्पनिक वर्गीकरण प्रणाली के अनुसार इसे 'प्राणी (एनीमल्स)' समूह के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाएगा।
अतः, विकल्प (A) इस वैचारिक प्रश्न का सबसे सटीक उत्तर है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति के कारण माईकोप्लाज्मा को प्राणी समूह में स्थान मिलता। Quick Tip: माईकोप्लाज्मा को अपनी कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति के कारण 'पादप जगत का जोकर' भी कहा जाता है क्योंकि ये अपना आकार बदलने में सक्षम होते हैं।
निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प दिए गए जीन के कूटलेखक रज्जु का सही अनुक्रम है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न डीएनए अनुलेखन (DNA transcription) की प्रक्रिया और कूटलेखक रज्जु (coding strand) की पहचान से संबंधित है।
हमें दिए गए जीन आरेख के अनुसार कूटलेखक रज्जु का सही अनुक्रम \(5' \rightarrow 3'\) दिशा में खोजना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. आरएनए पोलीमरेज हमेशा नए आरएनए का संश्लेषण \(5' \rightarrow 3'\) दिशा में करता है।
2. इसलिए, टेम्प्लेट रज्जु (template strand) की दिशा हमेशा अनुलेखन की दिशा में \(3' \rightarrow 5'\) होनी चाहिए।
3. कूटलेखक रज्जु (coding strand) का अनुक्रम नवनिर्मित आरएनए (mRNA) के समान होता है (केवल T के स्थान पर U होता है) और इसकी ध्रुवता अनुलेखन की दिशा में \(5' \rightarrow 3'\) होती है।
Step 3: Detailed Explanation:
दिए गए आरेख में, 'उन्नायक' (promoter) दाईं ओर है और 'समापक' (terminator) बाईं ओर है। तीर का निशान दाईं से बाईं ओर (right to left) निर्देशित है, जिसका अर्थ है कि अनुलेखन दाईं से बाईं ओर हो रहा है।
चूंकि अनुलेखन दाईं से बाईं ओर हो रहा है, इसलिए टेम्प्लेट रज्जु दाईं से बाईं ओर \(3' \rightarrow 5'\) दिशा में होना चाहिए।
ऊपर वाले रज्जु को देखें: बाईं ओर \(5'\) है और दाईं ओर \(3'\) है। दाईं से बाईं ओर जाने पर यह \(3' \rightarrow 5'\) दिशा में है। अतः ऊपर वाला रज्जु टेम्प्लेट रज्जु है।
नीचे वाले रज्जु को देखें: बाईं ओर \(3'\) है और दाईं ओर \(5'\) है। दाईं से बाईं ओर जाने पर यह \(5' \rightarrow 3'\) दिशा में है। अतः नीचे वाला रज्जु ही कूटलेखक रज्जु (coding strand) है।
अब हमें कूटलेखक रज्जु का अनुक्रम इसकी वास्तविक \(5' \rightarrow 3'\) दिशा (अर्थात दाईं से बाईं ओर) में पढ़ना होगा:
नीचे वाले रज्जु का अनुक्रम बाईं से दाईं ओर है:
\[ 3' - CACTTCGGCAATGTCGTG - 5' \]
इसे दाईं से बाईं ओर (\(5' \rightarrow 3'\)) पढ़ने पर हमें प्राप्त होगा:
\[ 5' - GTGCTGTAACGGCTTCAC - 3' \]
यह अनुक्रम विकल्प (A) से पूर्णतः मेल खाता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह अनुलेखन की दिशा के अनुसार कूटलेखक रज्जु का सही अनुक्रम प्रदर्शित करता है। Quick Tip: हमेशा याद रखें कि कूटलेखक रज्जु की ध्रुवता अनुलेखन की दिशा में हमेशा \(5' \rightarrow 3'\) होती है।
प्रमोटर की स्थिति से अनुलेखन की दिशा का निर्धारण करें और फिर कूटलेखक रज्जु का अनुक्रम लिखें।
निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प तंत्रिका-पेशीय संगम में एसिटिल कोलीन के मुक्त होने के उपरांत होने वाली पेशीय संकुचन में घटनाओं के सही क्रम को दर्शाता है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न तंत्रिका-पेशीय संगम (neuromuscular junction) पर एसिटिलकोलीन (ACh) के मुक्त होने के उपरांत पेशी संकुचन (muscle contraction) की घटनाओं के क्रम से संबंधित है।
हमें संकुचन के दौरान होने वाली भौतिक और रासायनिक कड़ियों के सही क्रम की पहचान करनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
पेशी संकुचन की क्रियाविधि (Sliding Filament Theory) के अनुसार घटनाओं का अनुक्रम इस प्रकार है:
1. तंत्रिका संवेग \(\rightarrow\) एसिटिलकोलीन का स्राव \(\rightarrow\) सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम से सार्कोप्लाज्म में \(Ca^{2+}\) का मुक्त होना।
2. \(Ca^{2+}\) का ट्रोपोनिन से जुड़ना \(\rightarrow\) एक्टिन फिलामेंट पर मायोसिन बंधन स्थलों का खुलना।
3. मायोसिन का एक्टिन से जुड़कर क्रॉस-ब्रिज बनाना \(\rightarrow\) सार्कोमियर का छोटा होना जिससे 'Z' रेखाएं अंदर की ओर खिंचती हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
सार्कोप्लाज्म में \(Ca^{2+}\) की वृद्धि: जब एसिटिलकोलीन सार्कोलेमा पर क्रिया विभव उत्पन्न करता है, तो यह सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम से कैल्शियम आयनों (\(Ca^{2+}\)) को सार्कोप्लाज्म में मुक्त करता है।
सक्रिय स्थानों का खुलना: मुक्त हुए कैल्शियम आयन एक्टिन पर उपस्थित ट्रोपोनिन से जुड़ते हैं, जिससे ट्रोपोमायोसिन अपनी स्थिति से हट जाता है और मायोसिन के जुड़ने के लिए सक्रिय स्थान खुल जाते हैं।
'Z' रेखा का अंदर खिंचना: मायोसिन सिर एक्टिन से जुड़कर उसे सार्कोमियर के केंद्र की ओर खींचता है। इसके परिणामस्वरूप सार्कोमियर छोटा हो जाता है और 'Z' रेखाएं अंदर की तरफ खिंच जाती हैं, जिससे पेशी संकुचन होता है।
यह क्रमिक व्यवस्था केवल विकल्प (A) में दी गई है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है जो पेशी संकुचन की घटनाओं के सही क्रम को दर्शाता है। Quick Tip: पेशी संकुचन के लिए हमेशा \(Ca^{2+}\) का बढ़ना और मायोसिन बाइंडिंग साइट्स का खुलना आवश्यक है।
संकुचन होने पर 'Z' रेखा हमेशा केंद्र की ओर (अंदर की ओर) खिंचती है।
निम्नलिखित में से कौन से विकल्प में प्रति-Rh प्रतिरक्षी (ऐन्टिबाडी) उपचार ईरीथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस (गर्भ रक्ताणु कोरकता) का निवारण कर सकता है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न गर्भ रक्ताणुकोरकता (Erythroblastosis fetalis) नामक गंभीर बीमारी के निवारण के लिए किए जाने वाले प्रति-Rh प्रतिरक्षी (anti-Rh antibody) उपचार के सही समय और स्थिति से संबंधित है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. गर्भ रक्ताणुकोरकता तब होती है जब एक Rh-नेगेटिव (Rh रहित) माँ के गर्भ में Rh-पॉजिटिव (Rh सहित) भ्रूण विकसित होता है।
2. प्रथम प्रसव के समय, शिशु का कुछ रक्त माँ के परिसंचरण में मिल सकता है, जिससे माँ का शरीर Rh एंटीजन के विरुद्ध प्रतिरक्षी (antibodies) बनाना शुरू कर देता है।
3. इस संवेदीकरण (sensitization) को रोकने के लिए, माँ को पहले प्रसव के तुरंत बाद निष्क्रिय प्रति-Rh प्रतिरक्षी दिए जाते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
यह विकार केवल तभी उत्पन्न हो सकता है जब माँ का रक्त Rh रहित (Rh-negative) हो और भ्रूण का रक्त Rh सहित (Rh-positive) हो।
यदि पहला शिशु Rh सहित उत्पन्न होता है, तो प्रसव के दौरान माँ का शरीर इन लाल रक्त कोशिकाओं के संपर्क में आ सकता है और स्थाई मेमोरी कोशिकाएं बना सकता है।
इससे बचने के लिए, प्रथम शिशु के जन्म के तुरंत बाद माँ को प्रति-Rh प्रतिरक्षी (Anti-D) का इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन माँ के रक्त में प्रवेश करने वाले शिशु के Rh एंटीजन को निष्क्रिय कर देता है।
अतः, यह उपचार हमेशा "Rh रहित माँ को प्रथम Rh सहित शिशु के जन्म के उपरांत" दिया जाना चाहिए। यह कथन विकल्प (A) में दिया गया है।
अतः, विकल्प (A) ही वैज्ञानिक रूप से सही उपचार प्रोटोकॉल को वर्णित करता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है जो इस विसंगति को रोकने का सही उपाय है। Quick Tip: हमेशा याद रखें कि विसंगति केवल "Rh-नेगेटिव माँ" और "Rh-पॉजिटिव बच्चे" के बीच होती है।
उपचार हमेशा माँ को दिया जाता है, ताकि उसका प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय न हो पाए।
निम्नलिखित में से कौन सी संरचनाएं एक लैक (lac) ओपेरान को सही से दर्शाती हैं जो कि ऋणात्मक नियमित हो सकते हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न लैक ओपेरान (lac operon) की संरचनात्मक व्यवस्था और उसके ऋणात्मक नियमन (negative regulation) की क्षमता से संबंधित है।
हमें यह पहचानना है कि दी गई संरचनाओं में से कौन सी संरचनाएं ऋणात्मक रूप से नियमित होने में सक्षम हैं।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. ऋणात्मक नियमन के लिए एक नियामक जीन (\(i\) जीन) का होना आवश्यक है जो दमनकारी (repressor) प्रोटीन बना सके।
2. संरचनात्मक जीन (\(z, y, a\)) एक प्रमोटर (\(P\)) और ऑपरेटर (\(O\)) के नियंत्रण में होने चाहिए ताकि दमनकारी ऑपरेटर से जुड़कर अनुलेखन को रोक सके।
3. दमनकारी प्रोटीन एक 'trans-acting' कारक है, जिसका अर्थ है कि नियामक जीन (\(i\)) का ओपेरान के ठीक बगल में होना अनिवार्य नहीं है, वह कहीं से भी विसरित होकर ऑपरेटर से जुड़ सकता है।
Step 3: Detailed Explanation:
संरचना i: \([P] [i] [P] [O] [z] [y] [a]\) - यह सामान्य जंगली प्रकार का लैक ओपेरान है। यहाँ \(i\) जीन का अपना प्रमोटर है और संरचनात्मक जीन \(z-y-a\) सुव्यवस्थित हैं। यह पूरी तरह से ऋणात्मक रूप से नियमित हो सकता है।
संरचना iii: \([P] [i] [P] [O] [y] [z] [a]\) - यहाँ यद्यपि संरचनात्मक जीनों का क्रम बदल गया है (\(y\) पहले है), लेकिन नियमन के सभी आवश्यक घटक (\(i\) जीन और \(P-O\) नियंत्रण) अभी भी उपस्थित हैं। चूंकि दमनकारी प्रोटीन एक trans-acting प्रोटीन है, यह अभी भी ऑपरेटर से जुड़कर इस ओपेरान को ऋणात्मक रूप से नियमित कर सकता है।
संरचनाएं ii और iv में नियंत्रण तत्वों की व्यवस्था त्रुटिपूर्ण है जो सामान्य नियमन की अनुमति नहीं देती।
अतः, संरचनाएं i और iii दोनों ही ऋणात्मक रूप से नियमित हो सकती हैं।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि दोनों ही मामलों में दमनकारी प्रोटीन ऑपरेटर से जुड़कर अनुलेखन को ऋणात्मक रूप से नियंत्रित कर सकता है। Quick Tip: नियामक जीन (\(i\) जीन) द्वारा बनाया गया दमनकारी प्रोटीन विसरणशील होता है।
इसलिए इसकी सापेक्ष स्थिति नियमन को प्रभावित नहीं करती जब तक कि संरचनात्मक जीन ऑपरेटर के अधीन हों।
निम्न में से कौन से जनकों की संतानों का रुधिर वर्ग उनमें से किसी भी जनक के समान नहीं होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न मानव में एबीओ (ABO) रक्त समूह की वंशागति से संबंधित है जो बहु-एलीलता (multiple allelism) और सह-प्रभाविता (codominance) का एक उदाहरण है।
हमें यह निर्धारित करना है कि किस माता-पिता के युग्म से उत्पन्न संतानों का रक्त समूह माता-पिता दोनों में से किसी से भी मेल नहीं खाएगा।
Step 2: Key Formula or Approach:
एबीओ रक्त समूह तीन एलील्स द्वारा नियंत्रित होता है: \(I^A\), \(I^B\) और \(i\)।
विभिन्न रक्त समूहों के संभावित जीनोटाइप इस प्रकार हैं:
- रक्त समूह AB: \(I^A I^B\)
- रक्त समूह O: \(ii\)
- रक्त समूह A: \(I^A I^A\) या \(I^A i\)
- रक्त समूह B: \(I^B I^B\) या \(I^B i\)
Step 3: Detailed Explanation:
विकल्प (A) का विश्लेषण: पिता का रक्त समूह AB है, जिसका जीनोटाइप केवल \(I^A I^B\) हो सकता है। माता का रक्त समूह O है, जिसका जीनोटाइप केवल \(ii\) हो सकता है।
पिता द्वारा बनाए गए युग्मक: \(I^A\) और \(I^B\)
माता द्वारा बनाए गए युग्मक: केवल \(i\)
जब इन युग्मकों का निषेचन होता है, तो संतानों के निम्नलिखित जीनोटाइप और फेनोटाइप संभव हैं:
1. \(I^A i\) \(\rightarrow\) रक्त समूह A
2. \(I^B i\) \(\rightarrow\) रक्त समूह B
इस प्रकार, उत्पन्न होने वाली सभी संतानों का रक्त समूह या तो A होगा या B होगा।
इनमें से कोई भी संतान अपने पिता (AB) या माता (O) के समान रक्त समूह वाली नहीं होगी।
अन्य सभी विकल्पों (B, C, D) में कुछ ऐसी संतानें उत्पन्न हो सकती हैं जिनका रक्त समूह माता या पिता के समान हो।
अतः, विकल्प (A) ही वांछित परिणाम देता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि AB और O माता-पिता से केवल A और B रक्त समूह के बच्चे ही जन्म ले सकते हैं। Quick Tip: यह रक्त समूह वंशागति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानक नियम है:
रक्त समूह AB और O वाले माता-पिता की संतान कभी भी AB या O नहीं हो सकती, वे हमेशा केवल A या B ही होंगी।
निम्नलिखित में से कौन सा अणु, आरएनए अंतरक्षेप (RNA interference) के लिए उपयोग मे आ सकता है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न आरएनए अंतरक्षेप (RNA interference - RNAi) तकनीक के मूल सिद्धांत से संबंधित है।
हमें पहचानना है कि दी गई संरचनाओं में से कौन सा अणु आरएनए अंतरक्षेप की प्रक्रिया को प्रारंभ करने के लिए उपयुक्त है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. आरएनए अंतरक्षेप यूकेरियोटिक कोशिकाओं में कोशिकीय सुरक्षा की एक प्राकृतिक विधि है।
2. यह प्रक्रिया द्विरज्जुकीय आरएनए (double-stranded RNA - dsRNA) की उपस्थिति से शुरू होती है।
3. अतः, हमें एक ऐसे द्विरज्जुकीय अणु की पहचान करनी है जिसमें आरएनए के विशिष्ट नाइट्रोजनस क्षार जैसे यूरेसिल (\(U\)) उपस्थित हों।
Step 3: Detailed Explanation:
विकल्प (A): यह एक द्विरज्जुकीय अणु है जिसके दोनों रज्जुओं में थाइमिन (\(T\)) के स्थान पर यूरेसिल (\(U\)) उपस्थित है। यह दर्शाता है कि यह एक द्विरज्जुकीय आरएनए (dsRNA) है। यह पूरक रज्जु हाइड्रोजन बंधों द्वारा आपस में पूर्णतः जुड़े हुए हैं, जो RNAi को सक्रिय करने के लिए आवश्यक है।
विकल्प (B): यह केवल एक एकल रज्जुकीय आरएनए (ssRNA) है, जो अकेले RNAi को ट्रिगर नहीं कर सकता।
विकल्प (C): यह एक एकल रज्जुकीय डीएनए (ssDNA) है क्योंकि इसमें थाइमिन (\(T\)) उपस्थित है।
विकल्प (D): यह एक द्विरज्जुकीय डीएनए (dsDNA) है। डीएनए सीधे आरएनए अंतरक्षेप की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता।
अतः, केवल विकल्प (A) ही RNAi के लिए उपयुक्त अणु है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि आरएनए अंतरक्षेप केवल पूरक द्विरज्जुकीय आरएनए (dsRNA) द्वारा ही संभव है। Quick Tip: RNAi का मूल आधार 'द्विरज्जुकीय आरएनए' (dsRNA) है।
विकल्पों में हमेशा थाइमिन (\(T\)) और यूरेसिल (\(U\)) की उपस्थिति को देखकर डीएनए और आरएनए में अंतर स्पष्ट करें।
निम्न वंशावली विश्लेषण आरेख एक परिवार में एक विरल आनुवंशिक विकार की वंशागति को प्रदर्शित करता है (भरी हुई आकृतियाँ प्रभावित लोगों को दर्शाती हैं)। निम्नलिखित विकल्पों में से कौन इस विकार की वंशागति का बहु-संभावित प्रतिकृति है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न वंशावली विश्लेषण (pedigree analysis) से संबंधित है।
हमें दिए गए आरेख का विश्लेषण करके यह निर्धारित करना है कि यह विकार किस प्रकार की आनुवंशिक वंशागति (inheritance pattern) का अनुसरण करता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
विभिन्न वंशागति पैटर्नों को पहचानने के नियम इस प्रकार हैं:
1. सूत्रकणिकीय/माइटोकोंड्रियल वंशागति (Maternal Inheritance): यह केवल माता से ही उसकी सभी संतानों (पुत्र और पुत्री दोनों) में जाती है। प्रभावित पिता कभी भी इस विकार को अपनी संतानों में प्रेषित नहीं करता।
2. Y-लग्न वंशागति: यह केवल पुरुषों में पाई जाती है और प्रभावित पिता से सभी पुत्रों में जाती है।
3. X-लग्न वंशागति: इसमें आड़े-तिरछे (criss-cross) वंशागति का पैटर्न देखा जाता है।
Step 3: Detailed Explanation:
पहली पीढ़ी का विश्लेषण: पहली पीढ़ी में माता सामान्य (सफ़ेद वृत्त) है और पिता प्रभावित (काला वर्ग) है। इनके सभी बच्चे (दूसरी पीढ़ी के सीधे वंशज) पूरी तरह से सामान्य हैं। इससे सिद्ध होता है कि प्रभावित पिता इस विकार को आगे प्रेषित नहीं कर सकता।
दूसरी पीढ़ी का विश्लेषण: दूसरी पीढ़ी में, जहाँ भी माता प्रभावित (काली वृत्त) है, उसके सभी बच्चे (पुत्र और पुत्री दोनों) पूरी तरह से प्रभावित हैं।
वहीं दूसरी ओर, जहाँ पिता प्रभावित है लेकिन माता सामान्य है, वहाँ एक भी संतान प्रभावित नहीं है।
यह शत-प्रतिशत मातृ वंशागति (maternal inheritance) का विशिष्ट उदाहरण है। क्योंकि मानव में युग्मनज (zygote) को अधिकांश कोशिकाद्रव्य और माइटोकोंड्रिया केवल अंड कोशिका (माता) से ही प्राप्त होते हैं।
अतः, यह पैटर्न केवल सूत्रकणिकीय (माइटोकोंड्रियल) वंशागति को प्रदर्शित करता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (D) है क्योंकि यह वंशावली पूर्णतः मातृ/सूत्रकणिकीय वंशागति के नियमों का पालन करती है। Quick Tip: माइटोकोंड्रियल वंशागति को पहचानने की सबसे आसान ट्रिक:
यदि प्रभावित माता के सभी बच्चे प्रभावित हों और प्रभावित पिता का कोई भी बच्चा प्रभावित न हो, तो वह हमेशा माइटोकोंड्रियल वंशागति होती है।
एक बच्ची उसके सम्पूर्ण जीवनकाल में आवश्यक सभी प्राथमिक अंडकों (प्राइमरी ऊसाईटस) के साथ जन्म लेती है। जन्म के समय ये प्राथमिक अंडक कोशिका विभाजन की किस अवस्था में पाए जाते हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न अंडजनन (oogenesis) और अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) के चरणों से संबंधित है।
हमें यह निर्धारित करना है कि नवजात शिशु (बच्ची) के अंडाशय में प्राथमिक अंडक अर्धसूत्री विभाजन की किस अवस्था में निलंबित रहते हैं।
Step 2: Detailed Explanation:
मादाओं में अंडजनन (oogenesis) की प्रक्रिया भ्रूणीय विकास (embryonic development) के दौरान ही शुरू हो जाती है, जहाँ लाखों आदिम जनन कोशिकाएं (oogonia) बनती हैं।
ये ऊगोनिया अर्धसूत्री विभाजन-I (meiosis-I) की पूर्वावस्था-I (Prophase-I) में प्रवेश करती हैं और वहां अस्थायी रूप से निलंबित (arrested) हो जाती हैं।
इस अवस्था में इन्हें प्राथमिक अंडक (primary oocytes) कहा जाता है।
जन्म के समय, एक बच्ची के अंडाशय में मौजूद सभी प्राथमिक अंडक पूर्वावस्था-I (Prophase-I), विशेष रूप से डिप्लोटीन (diplotene) उप-अवस्था में ही रुके रहते हैं।
ये अंडक यौवनारंभ (puberty) के बाद ही अपना विभाजन आगे बढ़ाते हैं।
अतः, विकल्प (A) ही पूर्णतः सही उत्तर है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि जन्म के समय सभी प्राथमिक अंडक अर्धसूत्री विभाजन-I की पूर्वावस्था I में रुके रहते हैं। Quick Tip: याद रखें कि जन्म के समय प्राथमिक अंडक हमेशा 'पूर्वावस्था-I' में अवरुद्ध होते हैं, जबकि अंडोत्सर्ग (ovulation) के समय द्वितीयक अंडक 'मध्यावस्था-II' (Metaphase-II) में अवरुद्ध होते हैं।
निम्नलिखित अष्टफलकीय संकुलों में किस का 'केवल-प्रचक्रण' (spin only) चुम्बकीय आघूर्ण सर्वाधिक होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न उपसहसंयोजक यौगिकों (coordination compounds) के चुंबकीय गुणों से संबंधित है।
हमें दिए गए अष्टफलकीय संकुलों में से उस संकुल की पहचान करनी है जिसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों (unpaired electrons) की संख्या सर्वाधिक होगी, क्योंकि केवल-प्रचक्रण चुंबकीय आघूर्ण सीधे अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
केवल-प्रचक्रण चुंबकीय आघूर्ण (\(\mu\)) का सूत्र:
\[\mu = \sqrt{n(n+2)} B.M.\]
जहाँ \(n\) अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
Step 3: Detailed Explanation:
[Cr(H2O)4(OH)2] में: क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। \(Cr^{2+}\) का विन्यास \(d^4\) होता है। चूँकि \(H_2O\) और \(OH^-\) दुर्बल क्षेत्र लिगेंड (WFL) हैं, इसलिए क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन कम होता है और इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता। अतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\(n\)) = 4 है।
[V(H2O)4I2]+ में: वैनेडियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है। \(V^{3+}\) का विन्यास \(d^2\) है। यहाँ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\(n\)) = 2 है।
[Fe(NH3)4(CN)2]+ में: आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है। \(Fe^{3+}\) का विन्यास \(d^5\) है। यहाँ प्रबल क्षेत्र लिगेंड (\(CN^-\)) की उपस्थिति के कारण निम्न-प्रचक्रण संकुल बनता है और इलेक्ट्रॉनों का युग्मन हो जाता है। अतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\(n\)) = 1 है।
[Co(NH3)4Cl2] में: कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। \(Co^{2+}\) का विन्यास \(d^7\) है। यहाँ \(n\) का मान अधिकतम 3 (उच्च-प्रचक्रण में) हो सकता है।
चूँकि संकुल (A) में सर्वाधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (\(n = 4\)) हैं, इसलिए इसका चुंबकीय आघूर्ण सर्वाधिक होगा।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या (4) सर्वाधिक है। Quick Tip: चुंबकीय आघूर्ण का निर्धारण करने के लिए सबसे पहले केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात करें, फिर लिगेंड की प्रबलता (SFL या WFL) के आधार पर इलेक्ट्रॉनों का वितरण करके अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों (\(n\)) की गणना करें।
जलीय अम्लीय माध्यम में, [Cr2O7]2− का Cr3+ में अपचयन करने के लिए क्रमशः कितने प्रोटोनों (H+) एवं इलेक्ट्रॉनों (e−) की आवश्यकता होगी?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन (\([Cr_2O_7]^{2-}\)) के अपचयन की संतुलित अर्ध-अभिक्रिया (half-reaction) से संबंधित है।
हमें इस अभिक्रिया को संतुलित करके आवश्यक प्रोटॉनों और इलेक्ट्रॉनों की सटीक संख्या ज्ञात करनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
आयनों और आवेशों को संतुलित करने के लिए आयन-इलेक्ट्रॉन विधि (ion-electron method) का उपयोग किया जाता है।
Step 3: Detailed Explanation:
डाइक्रोमेट आयन (\([Cr_2O_7]^{2-}\)) में क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +6 है, जो अपचयित होकर \(Cr^{3+}\) बनाता है।
क्रोमियम परमाणुओं को संतुलित करने के लिए दाईं ओर 2 से गुणा करते हैं:
\[ [Cr_2O_7]^{2-} \rightarrow 2 Cr^{3+} \]
ऑक्सीजन परमाणुओं (7) को संतुलित करने के लिए दाईं ओर \(7 H_2O\) जोड़ते हैं:
\[ [Cr_2O_7]^{2-} \rightarrow 2 Cr^{3+} + 7 H_2O \]
हाइड्रोजन परमाणुओं को संतुलित करने के लिए बाईं ओर \(14 H^+\) आयन जोड़ते हैं:
\[ [Cr_2O_7]^{2-} + 14 H^+ \rightarrow 2 Cr^{3+} + 7 H_2O \]
अब दोनों तरफ के आवेश को संतुलित करने के लिए बाईं ओर इलेक्ट्रॉन जोड़ते हैं।
बाईं ओर कुल आवेश = \((-2) + 14 = +12\)
दाईं ओर कुल आवेश = \(2 \times (+3) = +6\)
अतः, बाईं ओर 6 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होगी:
\[ [Cr_2O_7]^{2-} + 14 H^+ + 6 e^- \rightarrow 2 Cr^{3+} + 7 H_2O \]
इस प्रकार, हमें 14 प्रोटॉनों (\(H^+\)) और 6 इलेक्ट्रॉनों (\(e^-\)) की आवश्यकता होगी।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि संतुलित समीकरण में 14 प्रोटॉन और 6 इलेक्ट्रॉन प्रयुक्त होते हैं। Quick Tip: डाइक्रोमेट (\([Cr_2O_7]^{2-}\)) का \(Cr^{3+}\) में अपचयन एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रयोगशाला अभिक्रिया है।
इसकी संतुलित संतुलित समीकरण को हमेशा याद रखें क्योंकि यह कई रेडॉक्स गणनाओं में सीधे प्रयुक्त होती है।
निम्नलिखित अणुओं में से कौन से अणु का आबंध कोटि (bond order) इसके उच्चतम अधिग्रहित आण्विक कक्षक (highest occupied molecular orbital) से इलेक्ट्रॉन के निकलने पर बढ़ जायेगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न आणविक कक्षक सिद्धांत (Molecular Orbital Theory) और आबंध कोटि (bond order) की गणना पर आधारित है।
हमें उस अणु की पहचान करनी है जिसके उच्चतम अधिग्रहित आणविक कक्षक (HOMO) से इलेक्ट्रॉन निकालने पर उसकी आबंध कोटि बढ़ जाती है।
Step 2: Key Formula or Approach:
आबंध कोटि का सूत्र:
\[आबंध कोटि = \frac{N_b - N_a}{2}\]
जहाँ \(N_b\) आबंधी इलेक्ट्रॉनों की संख्या है और \(N_a\) प्रति-आबंधी इलेक्ट्रॉनों (antibonding electrons) की संख्या है।
यदि इलेक्ट्रॉन को प्रति-आबंधन आणविक कक्षक (ABMO) से निकाला जाता है, तो \(N_a\) का मान घटता है जिससे आबंध कोटि बढ़ जाती है।
Step 3: Detailed Explanation:
F2 (18 इलेक्ट्रॉन) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
σ1s2 σ*1s2 σ2s2 σ*2s2 σ2pz2 (π2px2 = π2py2) (π*2px2 = π*2py2)
यहाँ HOMO एक प्रति-आबंधन कक्षक \(\pi^*_{2p}\) है।
जब इससे एक इलेक्ट्रॉन निकाला जाता है, तो \(N_a\) का मान 8 से घटकर 7 हो जाता है। अतः \(F_2^+\) की आबंध कोटि:
\[ B.O. = \frac{10 - 7}{2} = 1.5 \]
जो कि \(F_2\) की मूल आबंध कोटि (1.0) से अधिक है।
अन्य अणुओं (\(N_2, C_2, B_2\)) में HOMO आबंधन आणविक कक्षक (BMO) होते हैं। अतः इनसे इलेक्ट्रॉन निकालने पर आबंध कोटि घटती है।
इसलिए केवल \(F_2\) की आबंध कोटि इलेक्ट्रॉन निकलने पर बढ़ती है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि \(F_2\) के प्रति-आबंधन कक्षक (HOMO) से इलेक्ट्रॉन निकलने पर आबंध मजबूत होता है। Quick Tip: शॉर्टकट ट्रिक: यदि किसी अणु में प्रति-आबंधन कक्षक (Antibonding MO) में इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं और वे ही उच्चतम ऊर्जा वाले (HOMO) कक्षक हैं, तो इलेक्ट्रॉन निकालने पर हमेशा आबंध कोटि बढ़ेगी और स्थायित्व बढ़ेगा।
Mn2(CO)10 एवं [MnO4]− में, धातु-लिगन्ड \(\pi\)-आबंध बनने के लिए धातु एवम् लिगन्ड के बीच इलेक्ट्रॉन युगल का दान आवश्यक होता है। निम्न में से कौन सा विकल्प इलेक्ट्रॉन युगल दान की दिशा को सही से दर्शाता है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न संक्रमण धातु संकुलों में धातु-लिगेंड \(\pi\)-आबंधन की प्रकृति से संबंधित है।
हमें दो विशिष्ट यौगिकों—एक धातु कार्बोनिल \(Mn_2(CO)_{10}\) और एक धातु ऑक्सोएनायन \([MnO_4]^-\) में \(\pi\)-आबंध के निर्माण के दौरान इलेक्ट्रॉन दान की दिशा की तुलना करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
\(Mn_2(CO)_{10}\) (धातु कार्बोनिल) में: इसमें धातु और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) के बीच सहक्रियात्मक आबंधन (synergic bonding) होता है। यहाँ धातु के भरे हुए d-कक्षक अपने इलेक्ट्रॉन युग्म को CO लिगेंड के रिक्त प्रति-आबंधन \(\pi^*\) कक्षकों में दान करते हैं। इसे पश्च-बंधन (back-bonding) कहते हैं। अतः इलेक्ट्रॉन दान की दिशा **धातु कक्षक \(\rightarrow\) लिगन्ड कक्षक** होती है।
\([MnO_4]^-\) (परमैंगनेट आयन) में: यहाँ केंद्रीय धातु मैंगनीज अपनी उच्चतम +7 ऑक्सीकरण अवस्था में है, जिससे इसके पास कोई d-इलेक्ट्रॉन नहीं बचता (\(d^0\) विन्यास)। इसमें \(\pi\)-आबंध का निर्माण ऑक्सीजन लिगेंड के भरे हुए p-कक्षकों से खाली मैंगनीज d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉन दान द्वारा होता है (LMCT)। अतः इलेक्ट्रॉन दान की दिशा **लिगन्ड कक्षक \(\rightarrow\) धातु कक्षक** होती है।
अतः, विकल्प (A) ही इन दोनों की दिशाओं को सही रूप में दर्शाता है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह दोनों यौगिकों में इलेक्ट्रॉन दान की सही दिशा को वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध करता है। Quick Tip: याद रखें कि कम ऑक्सीकरण अवस्था वाले धातु कार्बोनिल हमेशा पश्च-आबंधन (धातु \(\rightarrow\) लिगेंड) दर्शाते हैं, जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्था वाले ऑक्सो-ऋणायन हमेशा लिगेंड-टू-मेटल (लिगेंड \(\rightarrow\) धातु) आबंधन दर्शाते हैं।
C=S & C=Te में परस्पर तथा Cl—Cl & F—F में परस्पर आबंध ऊर्जा का सही क्रम क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न रासायनिक आबंधों की आबंध ऊर्जा (bond energy) को प्रभावित करने वाले कारकों जैसे परमाणु आकार, कक्षक अतिव्यापन और एकाकी युग्म प्रतिकर्षण पर आधारित है।
हमें दो विभिन्न युग्मों में आबंध ऊर्जा का सही क्रम ज्ञात करना है।
Step 2: Detailed Explanation:
C=S बनाम C=Te: आवर्त सारणी में सल्फर (S) तीसरे आवर्त का तत्व है जबकि टेल्यूरियम (Te) पांचवें आवर्त का तत्व है। सल्फर का आकार टेल्यूरियम से छोटा होता है। छोटा आकार होने के कारण कार्बन और सल्फर के कक्षकों के बीच अतिव्यापन अधिक मजबूत होता है। अतः C=S की आबंध ऊर्जा C=Te से अधिक होती है (C=S \(>\) C=Te)।
Cl—Cl बनाम F—F: फ्लोरीन (F) आवर्त सारणी के दूसरे आवर्त का तत्व है और इसका आकार अत्यंत छोटा होता है। छोटे आकार के कारण दोनों फ्लोरीन परमाणुओं के एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्मों (lone pairs) के बीच तीव्र अंतर-इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण होता है, जो F—F एकल आबंध को कमजोर कर देता है। क्लोरीन में बड़े आकार के कारण यह प्रतिकर्षण बहुत कम होता है। इसलिए Cl—Cl की आबंध ऊर्जा F—F से अधिक होती है (Cl—Cl \(>\) F—F)।
अतः, सही क्रम विकल्प (A) द्वारा दर्शाया गया है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह दोनों प्रणालियों में आबंध सामर्थ्य के सही भौतिक और रासायनिक कारणों की व्याख्या करता है। Quick Tip: फ्लोरीन (F—F) की कम आबंध ऊर्जा रासायनिक विज्ञान का एक बहुत ही प्रसिद्ध अपवाद है।
हमेशा याद रखें कि अत्यधिक एकाकी युग्म प्रतिकर्षण के कारण F—F की आबंध ऊर्जा Cl—Cl और यहाँ तक कि Br—Br से भी कम होती है।
नीचे दर्शायी गयी अभिक्रिया के संदर्भ में कौन सा एक कथन गलत है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड की नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया की क्रियाविधि (\(S_N1\)) से संबंधित है।
हमें दिए गए कथनों में से गलत कथन की पहचान करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
यह अभिक्रिया एक तृतीयक हैलाइड की उपस्थिति के कारण एकाणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (\(S_N1\)) क्रियाविधि का अनुसरण करती है।
\(S_N1\) अभिक्रिया का वेग केवल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करता है:
\[ वेग = k [t-butyl bromide] \]
अतः वेग सबस्ट्रेट की सांद्रता के समानुपाती होता है (कथन D सही है)।
नाभिकस्नेही (\(OH^-\)) वेग-निर्धारक चरण में भाग नहीं लेता, इसलिए इसकी सांद्रता बढ़ाने से वेग में कोई बदलाव नहीं होता (कथन B सही है)।
इस अभिक्रिया का सबसे धीमा चरण तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड का वियोजन होकर कार्बधनायन बनाना है, जो कि वेग निर्धारक चरण है (कथन C सही है)।
ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (जैसे जल) कार्बधनायन और संक्रमण अवस्था को स्थिर करके \(S_N1\) अभिक्रिया की दर को बढ़ाते हैं। एथिल ऐल्कोहॉल में जल मिलाने से विलायक की ध्रुवीयता बढ़ेगी, जिससे अभिक्रिया का वेग बढ़ना चाहिए, न कि कम होना। अतः कथन (A) गलत है।
इसलिए गलत कथन विकल्प (A) है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि जल मिलाने पर ध्रुवीयता बढ़ने के कारण अभिक्रिया का वेग बढ़ता है। Quick Tip: \(S_N1\) अभिक्रियाओं को ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (जैसे पानी) हमेशा बढ़ावा देते हैं क्योंकि वे मध्यवर्ती कार्बधनायन को हाइड्रेशन द्वारा स्थायित्व प्रदान करते हैं।
निम्न में से कौन सा एक अणु काईरल है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न त्रिविम रसायन (stereochemistry) और अणुओं की किरालता (chirality) से संबंधित है।
हमें दिए गए चक्रीय संरचनाओं (2,5-डाइमेथिल-1,4-डाइऑक्सेन) में से किराल अणु की पहचान करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
कोई अणु किराल (chiral) तब होता है जब उसमें सममिति का कोई तत्व जैसे सममिति तल (plane of symmetry) या सममिति केंद्र (center of symmetry) अनुपस्थित हो।
आरेख (a) में: यहाँ एक मेथिल समूह वेज (wedge) पर है और दूसरा डैश (dash) पर है (trans-isomer)। इस संरचना में एक सममिति केंद्र (center of inversion) पाया जाता, जिसके कारण यह अणु अकिराल (achiral) हो जाता है।
आरेख (b) में: यहाँ दोनों मेथिल समूह वेज (wedge) पर हैं (cis-isomer)। इस अणु में न तो कोई सममिति तल है और न ही कोई सममिति केंद्र है। इसकी वलय संरचना के कारण यह पूरी तरह असममित है और इसकी दर्पण छवि इस पर अध्यारोपित नहीं होती। अतः यह अणु किराल (chiral) है।
अन्य विकल्पों में भी सममिति के विभिन्न तत्व उपस्थित होने के कारण वे अकिराल हैं।
अतः केवल आरेख (b) ही किराल अणु है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (B) है क्योंकि इसमें सममिति के तत्वों की अनुपस्थिति के कारण यह अणु किराल है। Quick Tip: हमेशा याद रखें कि trans-1,4-प्रतिस्थापित वलयों में अक्सर सममिति का केंद्र (Center of Symmetry) होता है, जिससे वे अकिराल हो जाते हैं।
Cis-समावयवियों में यदि सममिति तल भी न हो, तो वे निश्चित रूप से किराल होते हैं।
योगिकों A एवम् B के लिए नीचे दिये गये सिलिका-जेल पर आधारित पतली-परत क्रोमाटोग्राम (silica-gel based thin-layer chromatogram) के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न पतली-परत क्रोमैटोग्राफी (Thin-Layer Chromatography - TLC) के सिद्धांतों और मन्दन गुणांक (\(R_f\) value) की गणना पर आधारित है।
हमें दिए गए क्रोमैटोग्राम से \(R_f\) मानों की गणना करनी है और यौगिकों की ध्रुवीयता (polarity) का संबंध ज्ञात करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
मन्दन गुणांक (\(R_f\)) का सूत्र:
\[ R_f = \frac{यौगिक द्वारा तय की गई दूरी}{विलायक अग्र (solvent front) द्वारा तय की गई दूरी} \]
सामान्य प्रावस्था (Normal Phase) TLC में ध्रुवीय सिलिका जेल का उपयोग स्थिर प्रावस्था के रूप में होता है। अधिक ध्रुवीय यौगिक सिलिका के साथ मजबूत अधिशोषण के कारण कम दूरी तय करते हैं (कम \(R_f\) मान)।
Step 3: Detailed Explanation:
विलायक द्वारा तय की गई कुल दूरी = 5 cm है।
यौगिक A द्वारा तय की गई दूरी = 3.75 cm है।
अतः A का \(R_f\) मान:
\[ R_f(A) = \frac{3.75}{5.0} = 0.75 \]
यौगिक B द्वारा तय की गई दूरी = 1.25 cm है।
अतः B का \(R_f\) मान:
\[ R_f(B) = \frac{1.25}{5.0} = 0.25 \]
चूंकि स्थिर प्रावस्था सिलिका जेल अत्यधिक ध्रुवीय है, इसलिए अधिक ध्रुवीय यौगिक सिलिका द्वारा अधिक मजबूती से अधिशोषित होते हैं और धीरे चलते हैं।
चूंकि यौगिक B का \(R_f\) मान (0.25) यौगिक A के \(R_f\) मान (0.75) से कम है, इसलिए यौगिक B, यौगिक A की तुलना में अधिक ध्रुवीय है।
यह निष्कर्ष विकल्प (A) से पूर्णतः मेल खाता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह \(R_f\) मान और यौगिकों की ध्रुवीयता के संबंधों को सही ढंग से दर्शाता है। Quick Tip: TLC प्लेट पर जो बिंदु जितना नीचे रहेगा (कम \(R_f\)), सामान्य प्रावस्था में वह उतना ही अधिक ध्रुवीय (polar) होगा।
जो बिंदु जितना ऊपर जाएगा (अधिक \(R_f\)), वह उतना ही कम ध्रुवीय (non-polar) होगा।
नीचे दी गयी अभिक्रिया क्रम में X और P क्या हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न अंतःअणुक कैनिजारो अभिक्रिया (Intramolecular Cannizzaro Reaction) और उसके बाद होने वाले अम्लीय लैक्टोनीकरण (lactonization) पर आधारित है।
हमें दिए गए ड्यूटेरियम-प्रतिस्थापित थैलालडिहाइड की विभिन्न रासायनिक रूपांतरणों द्वारा बनने वाले मुख्य उत्पादों X और P की पहचान करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
चरण 1 (कैनिजारो अभिक्रिया द्वारा X का निर्माण): जब सांद्र NaOH और ऊष्मा का उपयोग किया जाता है, तो थैलालडिहाइड के दोनों एल्डिहाइड समूहों में से एक का ऑक्सीकरण कार्बोक्सिलेट लवण (-COONa) में होता है और दूसरे का अपचयन अल्कोहल समूह में होता है।
चूँकि नीचे वाले एल्डिहाइड समूह पर ड्यूटेरियम (-CDO) उपस्थित है, इसलिए हाइड्राइड/ड्यूटेराइड स्थानांतरण के बाद हमें नीचे की ओर अल्कोहल समूह \(-CH(OH)D\) और ऊपर की ओर \(-COONa\) समूह प्राप्त होता है। यह संरचना **X** है।
चरण 2 (लैक्टोनीकरण द्वारा P का निर्माण): जब X को आधिक्य HCl गैस के साथ उपचारित किया जाता है, तो सबसे पहले कार्बोक्सिलेट लवण \(-COONa\) प्रोटॉन ग्रहण कर कार्बोक्सिलिक अम्ल \(-COOH\) में परिवर्तित हो जाता है।
तत्पश्चात, पास-पास स्थित एसिड और अल्कोहल समूहों के बीच स्वतः निर्जलीकरण (esterification) होता, जिससे चक्रीय एस्टर (लैक्टोन) **P** का निर्माण होता है।
इस लैक्टोन P में ऊपर की ओर कार्बोनिल समूह (\(C=O\)) और नीचे की ओर ड्यूटेरियम युक्त मेथिलीन समूह (\(CHD\)) उपस्थित होता है।
यह संपूर्ण प्रक्रम विकल्प (a) में दिखाए गए उत्पादों के बिल्कुल अनुकूल है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह कैनिजारो और लैक्टोनीकरण के बाद बनने वाले सही उत्पादों को दर्शाता है। Quick Tip: जब भी किसी बेंजीन वलय पर ortho-स्थिति में कार्बोक्सिलिक एसिड और अल्कोहल उपस्थित होते हैं, तो वे अम्ल की उपस्थिति में स्वतः निर्जलीकरण करके 5-सदस्यीय लैक्टोन (phthalide) वलय का निर्माण करते हैं।
नीचे दिए गये अणुओं का जलीय माध्यम में pKb का सही क्रम क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न ऐमीनों (amines) की क्षारीय सामर्थ्य (basic strength) और उनके \(pK_b\) मानों के बीच संबंध से संबंधित है।
हमें दिए गए बेंजिलएमीन (P), N-मेथिलएनिलीन (Q), N,N-डाइमेथिलएनिलीन (R) और एनिलीन (S) को जलीय माध्यम में उनके बढ़ते हुए \(pK_b\) मानों के क्रम में व्यवस्थित करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
क्षारीय सामर्थ्य और \(pK_b\) मान के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है:
\[ क्षारीय सामर्थ्य \propto \frac{1}{pK_b} \]
अर्थात, जो एमीन जितना अधिक क्षारीय होगा, उसका \(pK_b\) मान उतना ही कम होगा।
Step 3: Detailed Explanation:
बेंज़िलएमीन (P): इसमें नाइट्रोजन का एकाकी युग्म बेंजीन वलय के साथ सीधे अनुनाद में भाग नहीं लेता क्योंकि बीच में \(-CH_2-\) समूह उपस्थित है। इसलिए यह एक एलिफैटिक एमीन की तरह अत्यधिक क्षारीय है। इसका क्षारीय सामर्थ्य सर्वाधिक और \(pK_b\) मान न्यूनतम होगा।
एनिलीन (S): इसमें नाइट्रोजन का एकाकी युग्म सीधे बेंजीन वलय के साथ अनुनाद में व्यस्त रहता है, जिससे यह दान के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होता। अतः यह सबसे कमजोर क्षार है और इसका \(pK_b\) मान सबसे अधिक होगा।
Q और R: नाइट्रोजन पर उपस्थित मेथिल समूहों के इलेक्ट्रॉन-दाता (+I) प्रभाव के कारण ये दोनों एनिलीन (S) से अधिक क्षारीय हैं। चूँकि R में दो मेथिल समूह हैं, यह Q से अधिक क्षारीय है।
अतः, क्षारीयता का सही घटता क्रम: \(P > R > Q > S\).
इसके विपरीत, \(pK_b\) मान का सही बढ़ता क्रम होगा: \(P < R < Q < S\).
यह क्रम विकल्प (A) में दिया गया है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह क्षारीयता के आधार पर \(pK_b\) मानों के बढ़ते क्रम की सही व्याख्या करता है। Quick Tip: याद रखें कि \(pK_b\) और क्षारीयता एक-दूसरे के विपरीत काम करते हैं।
एलिफैटिक एमीन (जैसे बेंजिलएमीन) हमेशा एरोमैटिक एमीनों (जैसे एनिलीन) से काफी अधिक क्षारीय होते हैं और इनका \(pK_b\) बहुत कम होता है।
1.0 M NaOH के जलीय विलयन के 100 mL को जल मिलाकर 1.0 L तक तनु किया जाता है। इस विलयन का आधा हिस्सा फेंक दिया जाता है। बचे हुए विलयन में एक नए 0.5 M NaOH के जलीय विलयन का 100 mL मिलाया जाता है। इस अंतिम NaOH के जलीय विलयन की सांद्रता क्या होगी?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न विलयनों के तनुकरण (dilution) और मिश्रण (mixing) के बाद उनकी अंतिम मोलरता (molarity) की गणना से संबंधित है।
हमें प्रत्येक चरण के बाद विलयन में उपस्थित विलेय (NaOH) के मोलों और विलयन के कुल आयतन पर नज़र रखनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. मोलों की संख्या (\(n\)) = मोलरता (\(M\)) \(\times\) आयतन (\(V\) लीटर में)
2. मिश्रण की अंतिम मोलरता:
\[ M_{अंतिम} = \frac{कुल मोल}{कुल आयतन (लीटर में)} \]
Step 3: Detailed Explanation:
चरण 1 (प्रारंभिक अवस्था): 1.0 M NaOH के 100 mL (0.1 L) में उपस्थित मोल:
\[ n = 1.0 \times 0.1 = 0.1 मोल \]
चरण 2 (तनुकरण): इस विलयन का आयतन जल मिलाकर 1.0 L किया जाता है। अब सांद्रता 0.1 M हो जाती है, लेकिन मोलों की संख्या अभी भी 0.1 ही है।
चरण 3 (आधा विलयन फेंकने पर): जब आधा विलयन (500 mL) फेंक दिया जाता है, तो बचे हुए 500 mL (0.5 L) विलयन में बचे हुए मोल:
\[ n_{शेष} = \frac{0.1}{2} = 0.05 मोल \]
चरण 4 (नया विलयन मिलाने पर): इसमें 0.5 M NaOH का 100 mL (0.1 L) मिलाया जाता है। नए मिलाए गए मोल:
\[ n_{नया} = 0.5 \times 0.1 = 0.05 मोल \]
चरण 5 (अंतिम मोलरता की गणना):
कुल मोल = \(0.05 + 0.05 = 0.10 मोल\)
कुल आयतन = \(500 mL + 100 mL = 600 mL = 0.6 L\)
\[ M_{अंतिम} = \frac{0.10 मोल}{0.6 लीटर} = 0.167 M \approx 0.17 M \]
अतः, अंतिम सांद्रता 0.17 M होगी।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि गणना के अनुसार अंतिम विलयन की सांद्रता लगभग 0.17 M प्राप्त होती है। Quick Tip: सांद्रता और तनुकरण की समस्याओं में कभी भी केवल मोलरताओं को सीधे न जोड़ें।
हमेशा व्यक्तिगत विलयनों के 'मोल' निकालें, उन्हें जोड़ें और फिर अंतिम कुल आयतन से विभाजित करें।
एक आदर्श गैस पहले एक उत्क्रमणीय समतापीय प्रसरण (reversible isothermal expansion) (सॉलिड रेखा) से गुजरती है। तत्पश्चात वह आदर्श गैस उत्क्रमणीय रुधोष्म प्रसरण (reversible adiabatic expansion) (बिन्दुयुक्त रेखा) से गुजरती है। नीचे दिए गए रेखा चित्र/चित्रों में से कौन से इस समस्त प्रक्रम को बारीकी से दर्शाता है/दर्शाते हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न ऊष्मागतिकी (thermodynamics) के दो महत्वपूर्ण प्रक्रमों—समतापीय प्रसरण (isothermal expansion) और रुधोष्म प्रसरण (adiabatic expansion) के विभिन्न ग्राफ़ीय निरूपणों (P-V, T-V, P-T) पर आधारित है।
Step 2: Detailed Explanation:
ग्राफ (i) (P vs V): समतापीय प्रक्रम में ढाल (slope) कम होता है, जबकि रुधोष्म प्रक्रम में ढाल अधिक तीव्र होता है (\(ढाल = -\gamma \frac{P}{V}\)). अतः यहाँ ठोस रेखा (समतापीय) कम ढाल वाली है और बिंदुयुक्त रेखा (रुधोष्म) अधिक तीव्र ढाल वाली है। यह बिल्कुल सही है।
ग्राफ (ii) (T vs V): समतापीय चरण के दौरान तापमान (T) स्थिर रहता है, जिससे ठोस रेखा क्षैतिज बनती है। रुधोष्म प्रसरण में बाह्य कार्य करने के कारण आंतरिक ऊर्जा घटती है, जिससे गैस ठंडी होती है (T घटता है, जो बिंदुयुक्त रेखा नीचे की ओर दर्शाती है)। यह भी सही है।
ग्राफ (iii) (P vs T): समतापीय प्रक्रम में तापमान स्थिर रहता है (खड़ी ठोस रेखा)। रुधोष्म प्रसरण में दाब और तापमान दोनों ही घटते हैं, जिसे नीचे की ओर झुकी बिंदुयुक्त रेखा द्वारा सही दर्शाया गया है। यह भी सही है।
ग्राफ (iv) एक सीधी रेखा दिखाता है जो इस संयुक्त प्रक्रम के लिए सही नहीं है।
अतः केवल (i), (ii) और (iii) ही इस प्रक्रम को सही रूप से दर्शाते हैं।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (D) है जो इन तीनों महत्वपूर्ण ग्राफ़ीय संबंधों की पुष्टि करता है। Quick Tip: रुधोष्म प्रसरण (adiabatic expansion) में गैस हमेशा ठंडी होती है (तापमान गिरता है), जबकि समतापीय प्रसरण (isothermal expansion) में तापमान हमेशा स्थिर रहता है।
Be3+ के चतुर्थ कक्ष में एक इलेक्ट्रॉन के वेग तथा He+ के द्वितीय कक्ष में एक इलेक्ट्रॉन के वेग का अनुपात क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न बोहर के परमाणु मॉडल (Bohr's Atomic Model) के अनुसार विभिन्न हाइड्रोजन-सदृश आयनों (H-like ions) में घूम रहे इलेक्ट्रॉन के वेग की गणना से संबंधित है।
हमें \(Be^{3+}\) के चौथे कक्ष और \(He^+\) के दूसरे कक्ष में इलेक्ट्रॉन के वेगों का अनुपात ज्ञात करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
बोहर मॉडल के अनुसार, किसी \(n\) वें कक्ष में इलेक्ट्रॉन का वेग (\(v\)) निम्नलिखित सूत्र द्वारा दिया जाता है:
\[ v \propto \frac{Z}{n} \]
जहाँ \(Z\) परमाणु क्रमांक (atomic number) है और \(n\) कक्ष संख्या (orbit number) है।
अतः, \(v = v_0 \times \frac{Z}{n}\) (जहाँ \(v_0 = 2.18 \times 10^6 m/s\)).
Step 3: Detailed Explanation:
\(Be^{3+}\) आयन के लिए:
परमाणु क्रमांक (\(Z\)) = 4
कक्ष संख्या (\(n\)) = 4
वेग (\(v_1\)):
\[ v_1 \propto \frac{4}{4} = 1 \]
\(He^+\) आयन के लिए:
परमाणु क्रमांक (\(Z\)) = 2
कक्ष संख्या (\(n\)) = 2
वेग (\(v_2\)):
\[ v_2 \propto \frac{2}{2} = 1 \]
वेगों का अनुपात:
\[ अनुपात = \frac{v_1}{v_2} = \frac{1}{1} = 1:1 \]
अतः, दोनों आयनों में इलेक्ट्रॉनों का वेग समान होगा और उनका अनुपात 1:1 होगा।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि दोनों ही स्थितियों में \(Z/n\) का अनुपात 1 आता है। Quick Tip: याद रखें कि बोहर त्रिज्या (\(r \propto n^2/Z\)) और ऊर्जा (\(E \propto Z^2/n^2\)) के विपरीत, वेग केवल \(Z/n\) के सीधे समानुपाती होता है।
दो शुद्ध वाष्पशील द्रवों X एवं Y के लिए, X-X और Y-Y दोनों की अंतरआण्विक आकर्षण अन्योन्यक्रियाएं (attractive intermolecular interactions) X-Y की तुलना में कम हैं। X एवं Y के एक सममोलर विलयन का कुल वाष्पदाब ptotal है। शुद्ध X एवम् शुद्ध Y का वाष्पदाब क्रमशः \(p_X^0\) और \(p_Y^0\) है। नीचे दिए गये संबंधों में से कौन सा एक विकल्प सही है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न राउल्ट के नियम (Raoult's Law) और वास्तविक विलयनों द्वारा दर्शाए जाने वाले आदर्श व्यवहार से विचलन (deviation) पर आधारित है।
हमें अंतराआण्विक बलों की तुलना करके यह निर्धारित करना है कि विलयन किस प्रकार का विचलन प्रदर्शित करता है।
Step 2: Detailed Explanation:
प्रश्न के अनुसार, विलयन में उत्पन्न होने वाले नवीन आकर्षण बल (\(X-Y\)) शुद्ध द्रवों के आकर्षण बलों (\(X-X\) और \(Y-Y\)) से अधिक प्रबल हैं।
मजकूत आकर्षण बलों के कारण, विलयन में मौजूद अणुओं की वाष्प अवस्था में जाने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, विलयन का कुल वाष्पदाब आदर्श व्यवहार की तुलना में कम हो जाता है।
इसे राउल्ट के नियम से **ऋणात्मक विचलन (negative deviation)** कहा जाता है।
एक आदर्श सममोलर विलयन (जहाँ मोल प्रभाज \(\chi_X = \chi_Y = 0.5\)) का कुल वाष्पदाब निम्नलिखित होना चाहिए था:
\[ p_{ideal} = 0.5 p_X^0 + 0.5 p_Y^0 = \frac{p_X^0 + p_Y^0}{2} \]
चूंकि यह विलयन ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करता है, इसलिए इसका वास्तविक कुल वाष्पदाब (\(p_{total}\)) इस आदर्श मान से कम होगा:
\[ p_{total} < \frac{p_X^0 + p_Y^0}{2} \]
यह संबंध विकल्प (A) द्वारा सही ढंग से दर्शाया गया है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि आकर्षण बल अधिक होने के कारण कुल वाष्पदाब आदर्श मान से कम हो जाता है। Quick Tip: जब भी विलायक-विलेय आकर्षण बल (\(X-Y\)) शुद्ध घटकों से अधिक मजबूत होते हैं, तो हमेशा ऋणात्मक विचलन होता है (\(P_{total} < P_{ideal}\))।
यदि आकर्षण बल कमजोर होते हैं, तो धनात्मक विचलन होता है।
600 K पर, 191.47 kJ mol-1 की सक्रियण ऊर्जा के साथ एक अभिक्रिया का वेग स्थिरांक \(5.0 \times 10^{-5}\) s-1 है। किस तापमान पर इस अभिक्रिया की अर्धायु 152 s होगी? [पूर्व-चरघातांकी गुणक तथा सक्रियण ऊर्जा को तापमान पर निर्भर नहीं मानिए। R = 8.314 J K-1 mol-1]
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न रासायनिक बलगतिकी (chemical kinetics) के अंतर्गत वेग स्थिरांक, अर्धायु (half-life) और आरहेनियस समीकरण (Arrhenius Equation) पर आधारित एक संख्यात्मक प्रश्न है।
हमें दिए गए आंकड़ों का उपयोग करके नए तापमान की गणना करनी है जहाँ अर्धायु 152 s हो जाती है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए अर्धायु और वेग स्थिरांक में संबंध:
\[ k = \frac{\ln 2}{t_{1/2}} = \frac{0.693}{t_{1/2}} \]
2. आरहेनियस समीकरण:
\[ \ln\left(\frac{k_2}{k_1}\right) = \frac{E_a}{R} \left(\frac{1}{T_1} - \frac{1}{T_2}\right) \]
Step 3: Detailed Explanation:
चरण 1: वेग स्थिरांक की इकाई (\(s^{-1}\)) से स्पष्ट है कि यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है।
चरण 2: नए तापमान \(T_2\) पर वेग स्थिरांक \(k_2\) की गणना:
\[ k_2 = \frac{0.693}{152 s} \approx 4.56 \times 10^{-3} s^{-1} \]
चरण 3: आरहेनियस समीकरण में सभी मान प्रतिस्थापित करने पर:
\(T_1 = 600 K\)
\(k_1 = 5.0 \times 10^{-5} s^{-1}\)
\(E_a = 191.47 kJ/mol = 191470 J/mol\)
\[ \ln\left(\frac{4.56 \times 10^{-3}}{5.0 \times 10^{-5}}\right) = \frac{191470}{8.314} \left(\frac{1}{600} - \frac{1}{T_2}\right) \]
\[ \ln(91.2) = 23030 \left(\frac{1}{600} - \frac{1}{T_2}\right) \]
चूँकि \(\ln(91.2) \approx 4.51\),
\[ 4.51 = 23030 \left(\frac{1}{600} - \frac{1}{T_2}\right) \]
\[ \frac{1}{600} - \frac{1}{T_2} = \frac{4.51}{23030} \approx 0.000196 \]
\[ 0.001667 - \frac{1}{T_2} = 0.000196 \]
\[ \frac{1}{T_2} = 0.001471 \]
\[ T_2 \approx 680 K \]
अतः नया तापमान 680 K होगा।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि गणना के अनुसार आवश्यक तापमान 680 K प्राप्त होता है। Quick Tip: ऐसी बड़े संख्यात्मक गणनाओं में इकाइयों (units) का विशेष ध्यान रखें (जैसे \(E_a\) को kJ से J में बदलना न भूलें) और लॉग के अनुमानित मानों का उपयोग करके गणना को सरल बनाएं।
यदि p(x) एक ऐसा द्विघातीय बहुपद है जिसके लिए p(1) = p(−1) = 0 है, तो p(x) में x का गुणांक क्या है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न द्विघात बहुपद (quadratic polynomial) के मूलों (roots) और उसके गुणांकों (coefficients) के बीच संबंध पर आधारित है।
हमें दिया गया है कि \(p(x)\) के दो शून्यक (zeroes) \(1\) और \(-1\) हैं, और हमें \(x\) के गुणांक का मान ज्ञात करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
एक द्विघात बहुपद जिसके मूल \(\alpha\) और \(\beta\) हैं, उसे इस प्रकार लिखा जा सकता है:
\[ p(x) = a(x - \alpha)(x - \beta) \]
जहाँ \(a \neq 0\) एक वास्तविक संख्या है।
Step 3: Detailed Explanation:
चूँकि \(p(1) = 0\) और \(p(-1) = 0\), इसका अर्थ है कि \(x = 1\) और \(x = -1\) इस बहुपद के मूल हैं।
अतः, हम बहुपद \(p(x)\) को इस प्रकार लिख सकते हैं:
\[ p(x) = a(x - 1)(x - (-1)) \]
\[ p(x) = a(x - 1)(x + 1) \]
\[ p(x) = a(x^2 - 1) \]
\[ p(x) = ax^2 - a \]
यदि हम इसकी तुलना मानक द्विघात बहुपद \(p(x) = ax^2 + bx + c\) से करें, तो हम पाते हैं:
- \(x^2\) का गुणांक = \(a\)
- \(x\) का गुणांक (\(b\)) = 0
- अचर पद (\(c\)) = \(-a\)
अतः, \(p(x)\) में \(x\) का गुणांक 0 है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि दोनों मूल परिमाण में समान और विपरीत चिन्ह के होने के कारण \(x\) का गुणांक शून्य हो जाता है। Quick Tip: जब भी किसी द्विघात समीकरण के मूल \(\alpha\) और \(\beta\) एक-दूसरे के ऋणात्मक हों (\(\alpha = -\beta\)), तो मूलों का योग (\(\alpha + \beta\)) शून्य होता है।
चूंकि मूलों का योग \(-b/a\) होता है, इसलिए \(x\) का गुणांक (\(b\)) हमेशा शून्य होगा।
सम्मिश्र संख्याओं के तल में निम्न समुच्चयों पर विचार कीजिए:
\[ A = \left\{ \cos \left(\frac{2n\pi}{5}\right) + i\sin \left(\frac{2n\pi}{5}\right) : n \in \mathbb{Z} \right\} \] तथा
\[ B = \left\{ \cos \left(\frac{2n}{5}\right) + i\sin \left(\frac{2n}{5}\right) : n \in \mathbb{Z} \right\} \].
निम्न कथनों में से कौन सा कथन सत्य है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न सम्मिश्र संख्याओं (complex numbers) के समुच्चयों की परिमितता (finiteness) से संबंधित है।
हमें ओइलर के सूत्र (\(e^{i\theta} = \cos\theta + i\sin\theta\)) का उपयोग करके दोनों समुच्चयों में भिन्न-भिन्न अवयवों की संख्या ज्ञात करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
समुच्चय A के लिए:
माना \(z_n = \cos \left(\frac{2n\pi}{5}\right) + i\sin \left(\frac{2n\pi}{5}\right) = e^{i\frac{2n\pi}{5}}\).
यदि हम \(n\) को \(n+5\) से प्रतिस्थापित करें:
\[ z_{n+5} = e^{i\frac{2(n+5)\pi}{5}} = e^{i\frac{2n\pi}{5}} \cdot e^{i 2\pi} = e^{i\frac{2n\pi}{5}} = z_n \]
चूंकि सम्मिश्र संख्याएं प्रत्येक 5 अंतरालों के बाद दोहराई जाती हैं, इसलिए समुच्चय A में केवल 5 अद्वितीय अवयव (इकाई के 5वें मूल) होंगे। अतः, A एक परिमित (finite) समुच्चय है।
समुच्चय B के लिए:
माना \(w_n = \cos \left(\frac{2n}{5}\right) + i\sin \left(\frac{2n}{5}\right) = e^{i\frac{2n}{5}}\).
दो अलग-अलग पूर्णांकों \(n_1\) और \(n_2\) के लिए मान समान होने की शर्त है:
\[ \frac{2n_1}{5} - \frac{2n_2}{5} = 2k\pi \quad (जहाँ k \in \mathbb{Z}) \]
\[ n_1 - n_2 = 5k\pi \]
चूंकि \(\pi\) एक अपरिमेय संख्या (irrational number) है, दो पूर्णांकों का अंतर कभी भी \(\pi\) का पूर्णांक गुणज नहीं हो सकता (जब तक कि \(k = 0\) न हो, जिससे \(n_1 = n_2\))।
अतः, सभी \(n \in \mathbb{Z}\) के लिए \(w_n\) के मान भिन्न होंगे। इसलिए, समुच्चय B में अनंत अवयव हैं, अर्थात यह अपरिमित (infinite) है।
अतः, "A परिमित है परन्तु B अपरिमित है" कथन सत्य है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि \(\pi\) की अपरिमेयता के कारण समुच्चय B के मान कभी पुनरावृत्ति नहीं करते। Quick Tip: जब सम्मिश्र संख्या के कोणांक (argument) में \(\pi\) उपस्थित होता है (जैसे \(2n\pi/5\)), तो पूर्णांक मानों के लिए वह हमेशा एक परिमित समुच्चय (जैसे इकाई के मूल) बनाएगा।
परंतु यदि \(\pi\) अनुपस्थित हो (जैसे \(2n/5\)), तो वह हमेशा एक अपरिमित समुच्चय बनाएगा।
बिन्दु A(\(4\hat{i} + \hat{j} + 3\hat{k}\)), B(\(2\hat{j}\)) तथा C(\(-4\hat{i} + 3\hat{j} - 3\hat{k}\)) के संदर्भ में निम्न कथनों में से कौन सा कथन सत्य है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न त्रिविमीय सदिश बीजगणित (3D Vector Algebra) के अंतर्गत बिन्दुओं की समरैखिकता (collinearity) और सदिशों के संबंधों से संबंधित है।
हमें दिए गए स्थिति सदिशों (position vectors) की सहायता से सही विकल्प की जांच करनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
तीन बिन्दु A, B और C समरैखिक होंगे यदि सदिश \(\vec{AB}\) और \(\vec{BC}\) एक-दूसरे के समानांतर हों:
\[ \vec{AB} = \lambda \vec{BC} \quad (जहाँ \lambda एक अदिश है) \]
Step 3: Detailed Explanation:
दिए गए बिन्दुओं के स्थिति सदिश इस प्रकार हैं:
\[ \vec{OA} = 4\hat{i} + \hat{j} + 3\hat{k} \]
\[ \vec{OB} = 2\hat{j} \]
\[ \vec{OC} = -4\hat{i} + 3\hat{j} - 3\hat{k} \]
अब हम सदिशों \(\vec{AB}\) और \(\vec{BC}\) की गणना करते हैं:
\[ \vec{AB} = \vec{OB} - \vec{OA} = (0 - 4)\hat{i} + (2 - 1)\hat{j} + (0 - 3)\hat{k} = -4\hat{i} + \hat{j} - 3\hat{k} \]
\[ \vec{BC} = \vec{OC} - \vec{OB} = (-4 - 0)\hat{i} + (3 - 2)\hat{j} + (-3 - 0)\hat{k} = -4\hat{i} + \hat{j} - 3\hat{k} \]
ध्यान दीजिए कि:
\[ \vec{AB} = \vec{BC} \]
यहाँ \(\lambda = 1\) है।
चूँकि \(\vec{AB}\) और \(\vec{BC}\) समान सदिश हैं और दोनों में बिन्दु B उभयनिष्ठ (common) है, इसलिए बिन्दु A, B और C एक ही सीधी रेखा पर स्थित हैं, अर्थात वे समरैखिक (collinear) हैं।
अतः, विकल्प (A) पूर्णतः सत्य है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि दोनों सदिश पूर्णतः संरेख हैं जिससे समरैखिकता सिद्ध होती है। Quick Tip: समरैखिकता की जाँच करने के लिए हमेशा \(\vec{AB}\) और \(\vec{BC}\) निकालें।
यदि एक सदिश दूसरे का अदिश गुणज हो (\(\vec{AB} = \lambda \vec{BC}\)), तो बिन्दु हमेशा समरैखिक होते हैं।
यदि रेखा l1 बिन्दु(1, 1, 1) व बिन्दु(3, 1, 3) को जोड़ती है तथा रेखा l2 बिन्दु(0, 2, −1) व बिन्दु(2, 0, 3) को जोड़ती है, तो रेखा l1 तथा l2 के बीच का कोण क्या है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न त्रिविमीय ज्यामिति (Three Dimensional Geometry) के अंतर्गत दो रेखाओं के बीच के कोण की गणना से संबंधित है।
हमें दो बिन्दुओं से गुजरने वाली रेखाओं के दिक्-अनुपात (direction ratios) ज्ञात करके उनके बीच का कोण निकालना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
दो सदिशों \(\vec{d_1}\) और \(\vec{d_2}\) के बीच का कोण \(\theta\) निम्नलिखित सूत्र द्वारा दिया जाता है:
\[ \cos\theta = \frac{\vec{d_1} \cdot \vec{d_2}}{|\vec{d_1}| |\vec{d_2}|} \]
Step 3: Detailed Explanation:
रेखा \(l_1\) की दिशा सदिश (\(\vec{d_1}\)): यह बिन्दु \((1, 1, 1)\) और \((3, 1, 3)\) को मिलाती है।
\[ \vec{d_1} = (3-1)\hat{i} + (1-1)\hat{j} + (3-1)\hat{k} = 2\hat{i} + 0\hat{j} + 2\hat{k} \]
इसकी लंबाई:
\[ |\vec{d_1}| = \sqrt{2^2 + 0^2 + 2^2} = \sqrt{8} = 2\sqrt{2} \]
रेखा \(l_2\) की दिशा सदिश (\(\vec{d_2}\)): यह बिन्दु \((0, 2, -1)\) और \((2, 0, 3)\) को मिलाती है।
\[ \vec{d_2} = (2-0)\hat{i} + (0-2)\hat{j} + (3 - (-1))\hat{k} = 2\hat{i} - 2\hat{j} + 4\hat{k} \]
इसकी लंबाई:
\[ |\vec{d_2}| = \sqrt{2^2 + (-2)^2 + 4^2} = \sqrt{4 + 4 + 16} = \sqrt{24} = 2\sqrt{6} \]
दोनों सदिशों का अदिश गुणनफल (Dot Product):
\[ \vec{d_1} \cdot \vec{d_2} = (2)(2) + (0)(-2) + (2)(4) = 4 + 0 + 8 = 12 \]
कोण \(\theta\) की गणना:
\[ \cos\theta = \frac{12}{(2\sqrt{2})(2\sqrt{6})} = \frac{12}{4\sqrt{12}} = \frac{12}{8\sqrt{3}} = \frac{3}{2\sqrt{3}} = \frac{\sqrt{3}}{2} \]
चूंकि \(\cos\theta = \frac{\sqrt{3}}{2}\), इसलिए:
\[ \theta = 30^\circ \]
अतः, रेखाओं के बीच का कोण \(30^\circ\) है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि दिक्-अनुपातों के अदिश गुणनफल से कोण का मान ठीक \(30^\circ\) प्राप्त होता है। Quick Tip: जब भी रेखाओं के बीच का कोण निकालना हो, पहले उनके दिशा सदिशों \(\vec{d_1}\) और \(\vec{d_2}\) को सरलतम रूप में लिखें।
उदाहरण के लिए, यहाँ \(\vec{d_1}\) को \(\hat{i} + \hat{k}\) और \(\vec{d_2}\) को \(\hat{i} - \hat{j} + 2\hat{k}\) लेकर भी समान उत्तर आसानी से प्राप्त किया जा सकता था।
दो पूर्णांक r व l लीजए जिनके लिए r \(\ge\) l \(\ge\) 3 है। ऐसे कितने फलन f : {1, 2, . . . r \(\rightarrow\) {1, 2, . . . r हैं जिनके लिए f(1), f(2), . . . , f(l) सर्वथा अलग-अलग हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न क्रमचय और संचय (Permutations and Combinations) के सिद्धांतों का उपयोग करके विशिष्ट फलनों (functions) की संख्या की गणना करने से संबंधित है।
हमें उन फलनों की कुल संख्या ज्ञात करनी है जिनके डोमेन (domain) के पहले \(l\) अवयवों के प्रतिबिंब (images) सह-डोमेन (codomain) में सर्वथा भिन्न-भिन्न हों।
Step 2: Detailed Explanation:
फलन का डोमेन \(D = \{1, 2, \dots, r\}\) है (अवयवों की संख्या = \(r\))।
फलन का सह-डोमेन \(C = \{1, 2, \dots, r\}\) है (अवयवों की संख्या = \(r\))।
हमें यह प्रतिबंध दिया गया है कि पहले \(l\) अवयवों के मान \(f(1), f(2), \dots, f(l)\) सर्वथा भिन्न-भिन्न होने चाहिए।
इन पहले \(l\) अवयवों को भिन्न-भिन्न मान देने के कुल तरीके:
- \(f(1)\) के लिए उपलब्ध विकल्प = \(r\)
- \(f(2)\) के लिए उपलब्ध विकल्प = \(r - 1\)
- \(f(3)\) के लिए उपलब्ध विकल्प = \(r - 2\)
- ...
- \(f(l)\) के लिए उपलब्ध विकल्प = \(r - l + 1\)
इनका गुणनफल = \(r(r - 1)(r - 2)\dots(r - l + 1)\) होगा।
शेष बचे हुए \((r - l)\) अवयवों (जैसे \(l+1, l+2, \dots, r\)) पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इनमें से प्रत्येक अवयव सह-डोमेन के सभी \(r\) अवयवों में से किसी से भी संबद्ध हो सकता है।
अतः, इनके संबद्ध होने के कुल तरीके = \(\underbrace{r \times r \times \dots \times r}_{(r-l) बार} = r^{r - l}\) होंगे।
कुल फलनों की संख्या:
\[ कुल फलन = [r(r - 1)(r - 2)\dots(r - l + 1)] \times r^{r - l} \]
चूँकि \(r \times r^{r - l} = r^{r - l + 1}\) होता है, हम इसे इस प्रकार लिख सकते हैं:
\[ कुल फलन = r^{r - l + 1} (r - 1)(r - 2)\dots(r - l + 1) \]
यह परिणाम विकल्प (A) से बिल्कुल मेल खाता है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह गणना के सरल गुणन नियम के सिद्धांतों का पूर्णतः पालन करता है। Quick Tip: जब डोमेन के कुछ विशिष्ट अवयवों को भिन्न मान देने हों, तो पहले उन्हें 'एक-एक' (one-one) नियम से व्यवस्थित करें और शेष बचे अवयवों को स्वतंत्र रूप से सह-डोमेन के आकार की घात के रूप में व्यवस्थित करें।
एक तल में स्थित सभी वृत्तों के समुच्चय को C से निरूपित कीजिए। उपसमुच्चय R \(\subseteq\) C \(\times\) C को निम्न द्वारा परिभाषित कीजिए:
R = {(C1, C2) \(\in\) C \(\times\) C \(|\) C1 व C2 एक दूसरे को प्रतिच्छेद करते हैं.
निम्न में से कौन सा कथन सत्य है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न संबंध एवं फलन (Relations and Functions) के अंतर्गत संबंधों के प्रकारों जैसे स्वतुल्य (reflexive), सममित (symmetric), और संक्रामक (transitive) संबंधों की जांच पर आधारित है।
हमें समतल में स्थित वृत्तों के प्रतिच्छेदन संबंध \(R\) के गुणों का विश्लेषण करना है।
Step 2: Detailed Explanation:
स्वतुल्यता (Reflexivity):
कोई वृत्त \(C_1\) स्वयं के संपाती (coincident) होता है, अर्थात वह स्वयं के साथ अनंत बिन्दुओं पर प्रतिच्छेद करता है।
अतः, प्रत्येक \(C_1 \in \mathcal{C}\) के लिए \((C_1, C_1) \in \mathcal{R}\) सत्य है।
तो, संबंध \(R\) स्वतुल्य (reflexive) है।
सममितता (Symmetry):
यदि वृत्त \(C_1\) वृत्त \(C_2\) को प्रतिच्छेद करता है, तो निश्चित रूप से वृत्त \(C_2\) भी वृत्त \(C_1\) को प्रतिच्छेद करेगा।
यानी, \((C_1, C_2) \in \mathcal{R} \implies (C_2, C_1) \in \mathcal{R}\) हमेशा सत्य होगा।
इसलिए, संबंध \(R\) सममित (symmetric) है।
संक्रामकता (Transitivity):
मान लीजिए कि वृत्त \(C_1\) वृत्त \(C_2\) को प्रतिच्छेद करता है, और वृत्त \(C_2\) वृत्त \(C_3\) को प्रतिच्छेद करता है।
क्या यह आवश्यक है कि \(C_1\) और \(C_3\) भी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करें?
नहीं, यह आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि \(C_1\) बाईं ओर एक छोटा वृत्त है और \(C_3\) दाईं ओर स्थित एक अन्य छोटा वृत्त है जो \(C_1\) से बहुत दूर है। अब \(C_2\) को एक बहुत बड़ा वृत्त मान लीजिए जो दोनों को अपने भीतर या सीमाओं पर प्रतिच्छेद करता है।
यहाँ \((C_1, C_2) \in \mathcal{R}\) और \((C_2, C_3) \in \mathcal{R}\) है, परंतु \(C_1\) और \(C_3\) आपस में प्रतिच्छेद नहीं करते (\((C_1, C_3) \notin \mathcal{R}\))।
इसलिए, संबंध \(R\) संक्रामक (transitive) नहीं है।
अतः, संबंध \(R\) स्वतुल्य व सममित है किन्तु संक्रामक नहीं है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि प्रतिच्छेदन संबंध सममित और स्वतुल्य होता है परंतु इसमें संक्रामकता का अभाव होता है। Quick Tip: ज्यामितीय संबंधों (जैसे प्रतिच्छेदन, लम्बवत होना, स्पर्श करना आदि) में संक्रामकता आमतौर पर लागू नहीं होती है, क्योंकि दो अलग-अलग वस्तुएं किसी तीसरी वस्तु से स्वतंत्र रूप से जुड़ी हो सकती हैं बिना आपस में जुड़े।
जहाँ समाकलन सीमा −1 से 2 है, \(\int_{-1}^{2} \min\{1 - x, 1 - x^3\} \, dx\) का मान क्या है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न निश्चित समाकलन (definite integration) के अंतर्गत न्यूनतम फलन (\(\min\{f(x), g(x)\}\)) के समाकलन से संबंधित है।
हमें समाकलन की सीमा \([-1, 2]\) को उप-अंतरालों में विभाजित करना होगा जहाँ फलन \(1 - x\) और \(1 - x^3\) में से कौन छोटा है, यह निश्चित किया जा सके।
Step 2: Key Formula or Approach:
सबसे पहले दोनों फलनों के प्रतिच्छेदन बिन्दु ज्ञात करें:
\[ 1 - x = 1 - x^3 \implies x^3 - x = 0 \implies x(x-1)(x+1) = 0 \]
अतः प्रतिच्छेदन बिन्दु \(x = -1, 0, 1\) हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
अंतराल \([-1, 0]\) में:
यदि हम \(x = -0.5\) पर मानों की जांच करें:
\(1 - x = 1.5\)
\(1 - x^3 = 1.125\)
चूंकि \(1 - x^3 < 1 - x\), अतः इस अंतराल में \(\min\{1-x, 1-x^3\} = 1 - x^3\) होगा।
अंतराल \([0, 1]\) में:
यदि हम \(x = 0.5\) पर मानों की जांच करें:
\(1 - x = 0.5\)
\(1 - x^3 = 0.875\)
चूंकि \(1 - x < 1 - x^3\), अतः इस अंतराल में \(\min\{1-x, 1-x^3\} = 1 - x\) होगा।
अंतराल \([1, 2]\) में:
यदि हम \(x = 1.5\) पर मानों की जांच करें:
\(1 - x = -0.5\)
\(1 - x^3 = -2.375\)
चूंकि \(1 - x^3 < 1 - x\), अतः इस अंतराल में \(\min\{1-x, 1-x^3\} = 1 - x^3\) होगा।
समाकलन की गणना:
\[ I = \int_{-1}^{0} (1-x^3) \, dx + \int_{0}^{1} (1-x) \, dx + \int_{1}^{2} (1-x^3) \, dx \]
प्रत्येक भाग का समाकलन करने पर:
- प्रथम भाग:
\[ I_1 = \left[ x - \frac{x^4}{4} \right]_{-1}^{0} = 0 - \left( -1 - \frac{1}{4} \right) = \frac{5}{4} \]
- द्वितीय भाग:
\[ I_2 = \left[ x - \frac{x^2}{2} \right]_{0}^{1} = 1 - \frac{1}{2} = \frac{1}{2} \]
- तृतीय भाग:
\[ I_3 = \left[ x - \frac{x^4}{4} \right]_{1}^{2} = (2 - 4) - \left( 1 - \frac{1}{4} \right) = -2 - \frac{3}{4} = -\frac{11}{4} \]
- कुल समाकलन:
\[ I = I_1 + I_2 + I_3 = \frac{5}{4} + \frac{2}{4} - \frac{11}{4} = -\frac{4}{4} = -1 \]
अतः समाकलन का मान \(-1\) है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि विभिन्न अंतरालों में फलन के न्यूनतम मानों का योग ठीक \(-1\) आता है। Quick Tip: जब भी दो वक्रों का तुलनात्मक समाकलन करना हो, तो हमेशा दोनों वक्रों को एक रफ़ आलेख (graph) पर खींचें।
इससे न्यूनतम या अधिकतम भाग का निर्धारण अत्यधिक सरल और त्रुटिहीन हो जाता है।
एक परीक्षा में विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंकों के आँकड़ों पर विचार कीजिए। यदि प्रत्येक विद्यार्थी के अंकों को 2 अंकों से बढ़ा दिया जाए तो निम्न में से कौन सा कथन सत्य है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न सांख्यिकी (statistics) के अंतर्गत विक्षेपण के मापों (measures of dispersion) पर मूल बिन्दु के परिवर्तन (change of origin) के प्रभाव से संबंधित है।
हमें यह निर्धारित करना है कि प्रत्येक आंकड़े में एक अचर संख्या (2) जोड़ने पर माध्य विचलन (mean deviation) और प्रसरण (variance) पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Step 2: Detailed Explanation:
मान लीजिए कि मूल आंकड़े \(x_1, x_2, \dots, x_n\) हैं और उनका माध्य \(\bar{x}\) है।
जब प्रत्येक विद्यार्थी के अंक को 2 से बढ़ा दिया जाता है, तो नए आंकड़े \(y_i = x_i + 2\) हो जाते हैं।
नया माध्य भी 2 से बढ़ जाएगा:
\[ \bar{y} = \bar{x} + 2 \]
माध्य के सापेक्ष नया विचलन (deviation):
\[ y_i - \bar{y} = (x_i + 2) - (\bar{x} + 2) = x_i - \bar{x} \]
चूँकि प्रत्येक आंकड़े का अपने नए माध्य से अंतर (\(|y_i - \bar{y}|\)) मूल अंतर (\(|x_i - \bar{x}|\)) के बिल्कुल समान है, इसलिए माध्य के सापेक्ष माध्य विचलन (Mean Deviation about Mean) अपरिवर्तित रहेगा।
\[ M.D.(\bar{y}) = \frac{1}{n} \sum |y_i - \bar{y}| = \frac{1}{n} \sum |x_i - \bar{x}| = M.D.(\bar{x}) \]
इसी प्रकार, माध्यिका के सापेक्ष माध्य विचलन भी नहीं बदलेगा। प्रसरण भी मूल बिंदु के बदलाव से स्वतंत्र होता है, अतः प्रसरण भी नहीं बदलेगा (प्रसरण केवल पैमाने के बदलाव से बदलता है)।
अतः, "माध्य के सापेक्ष माध्य विचलन नहीं बदलेगा" कथन पूर्णतः सत्य है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि विक्षेपण के सभी माप (अपकिरण की मापें) आँकड़ों में कोई नियत संख्या जोड़ने या घटाने से प्रभावित नहीं होते हैं। Quick Tip: याद रखें कि अपकिरण की मापें (जैसे माध्य विचलन, मानक विचलन, प्रसरण, परास आदि) मूल बिन्दु के परिवर्तन (जोड़ने या घटाने) से 'अपरिवर्तित' रहती हैं, परंतु पैमाने के परिवर्तन (गुणा या भाग करने) से प्रभावित होती हैं।
फलन f : R \(\rightarrow\) R को f(x) = sin2(7x) − sin2(5x) से परिभाषित करें। निम्न में से कौन सा कथन सत्य नहीं है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न त्रिकोणमितीय फलनों (trigonometric functions) की विशेषताओं जैसे अंतराल में वर्धमान/ह्रासमान होना, धनात्मकता, और आवर्तता (periodicity) पर आधारित है।
हमें दिए गए चार कथनों में से उस कथन की पहचान करनी है जो **सत्य नहीं** (असत्य) है।
Step 2: Key Formula or Approach:
त्रिकोणमितीय सर्वसमिका का उपयोग करके फलन को सरल करें:
\[ \sin^2 A - \sin^2 B = \sin(A+B)\sin(A-B) \]
अतः, \(f(x) = \sin(12x)\sin(2x)\)
Step 3: Detailed Explanation:
कथन (D) की जांच:
\[ f\left(\frac{\pi}{12}\right) = \sin\left(12 \times \frac{\pi}{12}\right)\sin\left(2 \times \frac{\pi}{12}\right) = \sin(\pi)\sin\left(\frac{\pi}{6}\right) = 0 \times \frac{1}{2} = 0 \]
यह कथन बिल्कुल सत्य है।
कथन (B) की जांच:
यदि \(x \in \left(0, \frac{\pi}{48}\right)\), तो:
- \(2x \in \left(0, \frac{\pi}{24}\right) \implies \sin(2x) > 0\)
- \(12x \in \left(0, \frac{\pi}{4}\right) \implies \sin(12x) > 0\)
दोनों धनात्मक होने के कारण इनका गुणनफल \(f(x) > 0\) होगा। यह कथन भी सत्य है।
कथन (C) की जांच:
\[ f\left(x + \frac{\pi}{2}\right) = \sin^2\left(7x + \frac{7\pi}{2}\right) - \sin^2\left(5x + \frac{5\pi}{2}\right) \]
चूँकि \(\sin\left(\theta + \frac{7\pi}{2}\right) = -\cos\theta\) और \(\sin\left(\theta + \frac{5\pi}{2}\right) = \cos\theta\) होता है,
\[ f\left(x + \frac{\pi}{2}\right) = \cos^2(7x) - \cos^2(5x) = (1-\sin^2(7x)) - (1-\sin^2(5x)) = \sin^2(5x) - \sin^2(7x) = -f(x) \]
अतः, \(f\left(x + \frac{\pi}{2}\right) + f(x) = 0\) सत्य है।
कथन (A) की जांच:
चूंकि विकल्प B, C, D पूर्णतः सत्य हैं, इसलिए आकलित रूप से कथन (A) असत्य होना चाहिए क्योंकि इस विस्तृत अंतराल में फलन लगातार वर्धमान नहीं रह सकता।
अतः, कथन (A) सत्य नहीं है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि यह दी गई शर्तों के अंतर्गत असत्य कथन है। Quick Tip: जब ऐसे बहुविकल्पीय प्रश्नों में तीन विकल्प (B, C और D) आसानी से और सीधे सिद्ध हो जाएं, तो समय बचाने के लिए शेष बचे विकल्प को सीधे असत्य घोषित कर देना सबसे सटीक रणनीति है।
वास्तविक संख्याओं a तथा b के लिए निम्न फलन f : R \(\rightarrow\) R पर विचार कीजिए:
\[ f(x) = \begin{cases} -ax - b & यदि x < -1, \\
5x + 1 & यदि -1 \le x \le 1, \\
a^2x + 3b & यदि x > 1. \end{cases} \]
ऐसे कितने युग्म (a, b) संभव हैं जिनके लिए f सभी बिंदुओं पर सतत है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न फलनों की सांतत्यता (continuity) की अवधारणा पर आधारित है।
हमें वास्तविक संख्याओं \(a\) और \(b\) के उन संभावित मानों की संख्या ज्ञात करनी है जो फलन \(f(x)\) को सभी वास्तविक संख्याओं पर सतत बनाते हैं।
Step 2: Key Formula or Approach:
फलन \(f(x)\) को संधिकाल बिन्दुओं (joint points) \(x = -1\) and \(x = 1\) पर सतत होना चाहिए:
1. \(x = -1\) पर: \(\lim_{x \to -1^-} f(x) = \lim_{x \to -1^+} f(x) = f(-1)\)
2. \(x = 1\) पर: \(\lim_{x \to 1^-} f(x) = \lim_{x \to 1^+} f(x) = f(1)\)
Step 3: Detailed Explanation:
\(x = -1\) पर सांतत्यता की जाँच:
- वाम हस्त सीमा (LHL) = \(\lim_{x \to -1^-} (-ax - b) = a - b\)
- दक्षिण हस्त सीमा (RHL) = \(f(-1) = 5(-1) + 1 = -4\)
अतः, सतत होने के लिए:
\[ a - b = -4 \implies b = a + 4 \quad --- (समीकरण 1) \]
\(x = 1\) पर सांतत्यता की जाँच:
- वाम हस्त सीमा (LHL) = \(f(1) = 5(1) + 1 = 6\)
- दक्षिण हस्त सीमा (RHL) = \(\lim_{x \to 1^+} (a^2x + 3b) = a^2 + 3b\)
अतः, सतत होने के लिए:
\[ a^2 + 3b = 6 \quad --- (समीकरण 2) \]
समीकरण 1 का मान समीकरण 2 में प्रतिस्थापित करने पर:
\[ a^2 + 3(a + 4) = 6 \]
\[ a^2 + 3a + 12 = 6 \]
\[ a^2 + 3a + 6 = 0 \]
इस द्विघात समीकरण के विविक्तकर (discriminant, \(D\)) की गणना करते हैं:
\[ D = b^2 - 4ac = 3^2 - 4(1)(6) = 9 - 24 = -15 \]
चूँकि \(D < 0\) है, इसलिए इस समीकरण का कोई भी वास्तविक हल (real solution) संभव नहीं है।
चूंकि \(a\) और \(b\) वास्तविक संख्याएं होनी चाहिए, इसलिए ऐसा कोई भी वास्तविक युग्म \((a, b)\) अस्तित्व में नहीं है जो इस फलन को सतत बना सके।
अतः, संभव युग्मों की संख्या 0 है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि विविक्तकर के ऋणात्मक होने से वास्तविक हलों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। Quick Tip: जब भी सतत फलनों में द्विघात समीकरण का निर्माण हो, तो तुरंत उसके विविक्तकर (\(D = b^2 - 4ac\)) की जांच करें।
यदि \(D < 0\) आता है, तो वास्तविक अचरों के लिए हलों की संख्या हमेशा शून्य होगी।
एक 2×2 आव्यूह A जिसके अवयव वास्तविक संख्याएं हैं, के लिए गुणनफल AA · · · A (m times), जबकि m एक धनात्मक पूर्णांक है, को Am द्वारा निरूपित कीजिए। मान लीजिए कि x0 = 0, x1 = 1 है तथा सभी n \(\ge\) 2 के लिए xn = xn−1 + xn−2 है। परिभाषित कीजिए:
\[ A_n = \begin{bmatrix} x_{n+1} & x_n \\
x_n & x_{n-1} \end{bmatrix}, सभी n \ge 1 के लिए। \]
निम्न में से कौन सा कथन सभी m \(\ge\) 3 के लिए सत्य है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न आव्यूह सिद्धांत (Matrix Theory) और प्रसिद्ध फिबोनाची अनुक्रम (Fibonacci Sequence) के बीच अंतर्संबंधों पर आधारित है।
हमें आव्यूह \(A_n\) की घातों की विशेषताओं का विश्लेषण करके दिए गए कथनों की सत्यता की जांच करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
फिबोनाची अनुक्रम के अनुसार:
\(x_0 = 0\), \(x_1 = 1\), \(x_2 = 1\), \(x_3 = 2\), \(x_4 = 3\), आदि।
अब हम \(n=1\) के लिए आव्यूह \(A_1\) का मान लिखते हैं:
\[ A_1 = \begin{bmatrix} x_2 & x_1
x_1 & x_0 \end{bmatrix} = \begin{bmatrix} 1 & 1
1 & 0 \end{bmatrix} \]
आव्यूह \(A_1\) के क्रमिक गुणनफल ज्ञात करते हैं:
\[ A_1^2 = \begin{bmatrix} 1 & 1 \\
1 & 0 \end{bmatrix} \begin{bmatrix} 1 & 1 \\
1 & 0 \end{bmatrix} = \begin{bmatrix} 2 & 1 \\
1 & 1 \end{bmatrix} = \begin{bmatrix} x_3 & x_2 \\
x_2 & x_1 \end{bmatrix} = A_2 \]
\[ A_1^3 = A_1^2 \cdot A_1 = \begin{bmatrix} 2 & 1 \\
1 & 1 \end{bmatrix} \begin{bmatrix} 1 & 1 \\
1 & 0 \end{bmatrix} = \begin{bmatrix} 3 & 2 \\
2 & 1 \end{bmatrix} = \begin{bmatrix} x_4 & x_3 \\
x_3 & x_2 \end{bmatrix} = A_3 \]
गणितीय आगमन (Mathematical Induction) से हम लिख सकते हैं कि:
\[ A_1^m = A_m \quad (सभी m \ge 1 के लिए) \]
अब कैली-हैमिल्टन प्रमेय (Cayley-Hamilton Theorem) का उपयोग करके \(A_1\) का अभिलाक्षणिक समीकरण (characteristic equation) ज्ञात करते हैं:
\[ \det(A_1 - \lambda I) = 0 \implies \det\begin{bmatrix} 1-\lambda & 1
1 & -\lambda \end{bmatrix} = 0 \]
\[ -\lambda(1-\lambda) - 1 = 0 \implies \lambda^2 - \lambda - 1 = 0 \]
अतः आव्यूह रूप में:
\[ A_1^2 - A_1 - I = O \]
समीकरण को दोनों तरफ \(A_1^{m-2}\) से गुणा करने पर (जहाँ \(m \ge 3\)):
\[ A_1^m - A_1^{m-1} - A_1^{m-2} = O \]
\[ A_1^m = A_1^{m-1} + A_1^{m-2} \]
यह परिणाम सीधे विकल्प (A) को संतुष्ट करता है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि कैली-हैमिल्टन समीकरण से सीधे फिबोनाची आव्यूह का यह संबंध स्थापित होता है। Quick Tip: फिबोनाची आव्यूह \(\begin{bmatrix} 1 & 1 \\
1 & 0 \end{bmatrix}\) की \(m\)-वीं घात हमेशा \(\begin{bmatrix} x_{m+1} & x_m \\
x_m & x_{m-1} \end{bmatrix}\) के समान होती है।
यह एक मानक परिणाम है जिसे परीक्षा की दृष्टि से याद रखना बहुत लाभकारी होता है।
मान लीजिए कि a1, a2, a3, . . . धनात्मक पूर्णांकों की एक गुणोत्तर श्रेणी है। यदि a1 = 3 है, तथा सभी धनात्मक पूर्णांकों n के लिए an+2 − 2an = an+1 है, तो a1 + a2 + a3 + a4 + a5 का मान क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न गुणोत्तर श्रेणी (Geometric Progression) की अवधारणा और उसके पदों के योगफल पर आधारित है।
हमें गुणोत्तर श्रेणी का सार्वअनुपात (common ratio, \(r\)) ज्ञात करके पहले पांच पदों का योगफल निकालना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
1. गुणोत्तर श्रेणी का \(n\) वां पद: \(a_n = a_1 r^{n-1}\)
2. \(n\) पदों का योगफल:
\[ S_n = \frac{a_1(r^n - 1)}{r - 1} \]
Step 3: Detailed Explanation:
माना श्रेणी का पहला पद \(a_1 = 3\) है और सार्वअनुपात \(r\) है।
हमें दिया गया संबंध है:
\[ a_{n+2} - 2a_n = a_{n+1} \]
सभी पदों को \(a_n = a_1 r^{n-1}\) के रूप में रखने पर:
\[ a_1 r^{n+1} - 2 a_1 r^{n-1} = a_1 r^n \]
चूँकि \(a_1 = 3 \neq 0\) और \(r > 0\) (धनात्मक पूर्णांकों की श्रेणी होने के कारण), हम दोनों पक्षों को \(a_1 r^{n-1}\) से विभाजित कर सकते हैं:
\[ r^2 - 2 = r \]
\[ r^2 - r - 2 = 0 \]
इस द्विघात समीकरण को हल करते हैं:
\[ (r - 2)(r + 1) = 0 \]
चूँकि श्रेणी के सभी पद धनात्मक पूर्णांक हैं, इसलिए सार्वअनुपात \(r\) भी धनात्मक होना चाहिए।
अतः, \(r = 2\).
अब, श्रेणी के पहले 5 पद इस प्रकार हैं:
- \(a_1 = 3\)
- \(a_2 = 3 \times 2 = 6\)
- \(a_3 = 6 \times 2 = 12\)
- \(a_4 = 12 \times 2 = 24\)
- \(a_5 = 24 \times 2 = 48\)
इन सभी पदों का योगफल:
\[ S_5 = 3 + 6 + 12 + 24 + 48 = 93 \]
अतः, योगफल का मान 93 है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि सार्वअनुपात \(r=2\) होने से पदों का योग ठीक 93 प्राप्त होता है। Quick Tip: जब भी अनुक्रम के कर्मागत पदों का संबंध दिया हो (जैसे \(a_{n+2} - a_{n+1} - 2a_n = 0\)), तो गुणोत्तर श्रेणी के लिए इसे सीधे \(r^2 - r - 2 = 0\) लिखकर सार्वअनुपात तुरंत ज्ञात किया जा सकता है।
मान लीजिए कि n = 2026 है। यदि 49n + 41n + 10n को 100 से भाग दें तो शेषफल कितना होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न संख्या पद्धति (Number System) के अंतर्गत शेषफल प्रमेय (Remainder Theorem) और मॉड्यूलो अंकगणित (Modulo Arithmetic) से संबंधित है।
हमें बड़ी घातांक संख्या \((49^n + 41^n + 10^n)\) को 100 से भाग देने पर प्राप्त होने वाले शेषफल को ज्ञात करना है।
Step 2: Detailed Explanation:
हमें दिया गया है कि \(n = 20^{26}\) है।
चूँकि \(n = 20^{26}\), इसका अर्थ है कि \(n\) एक सम संख्या (even number) है और यह 100 का भी गुणज है क्योंकि इसके अंत में दो से अधिक शून्य होंगे।
अब हम प्रत्येक पद को अलग-अलग 100 के सापेक्ष (modulo 100) सरल करते हैं:
पद 1: \(10^n \pmod{100}\)
चूँकि \(n = 20^{26} \ge 2\), इसलिए \(10^n\) में कम से कम 26 शून्य होंगे।
अतः, \(10^n \equiv 0 \pmod{100}\).
पद 2: \(49^n \pmod{100}\)
हम जानते हैं कि:
\[ 49^2 = 2401 \equiv 1 \pmod{100} \]
चूँकि \(n = 20^{26}\) एक सम संख्या है, हम इसे \(n = 2k\) लिख सकते हैं।
\[ 49^n = (49^2)^k \equiv 1^k \equiv 1 \pmod{100} \]
पद 3: \(41^n \pmod{100}\)
हम जानते हैं कि \((41)^5 \equiv 1 \pmod{100}\) क्योंकि:
- \(41^1 \equiv 41\)
- \(41^2 \equiv 81\)
- \(41^3 \equiv 21\)
- \(41^4 \equiv 61\)
- \(41^5 \equiv 01 \pmod{100}\)
चूँकि \(n = 20^{26}\), यह संख्या 5 से पूरी तरह विभाजित होती है (\(n = 5m\))।
\[ 41^n = (41^5)^m \equiv 1^m \equiv 1 \pmod{100} \]
कुल शेषफल की गणना:
\[ (49^n + 41^n + 10^n) \pmod{100} \equiv 1 + 1 + 0 \equiv 2 \pmod{100} \]
अतः, कुल शेषफल 2 होगा।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि सम और 5 के गुणज घातांकों के कारण प्रत्येक पद का सरल शेषफल क्रमशः 1, 1 और 0 बचता है। Quick Tip: जब भी किसी संख्या के अंत में 1 हो (जैसे 41), तो उसकी \(5k\) घातांक हमेशा अंत में 01 देगी।
उसी प्रकार, यदि अंत में 9 हो (जैसे 49), तो सम घातांक हमेशा अंत में 01 देगी। इस नियम से ऐसी गणनाएँ बहुत आसान हो जाती हैं।
दो डब्बों B1 और B2, प्रत्येक में 3 लाल और 4 काली गेंदें हैं। B1 से एक गेंद यादृच्छिक रूप से चुनी जाती है। यदि वह गेंद लाल है तो B2 में 4 लाल गेंदें और डाल दी जाती हैं, अन्यथा B2 में 3 काली गेंदें और डाल दी जाती हैं। इसके बाद B2 में से एक गेंद यादृच्छिक रूप से चुनी जाती है। यदि यह गेंद लाल है तो इस बात की सप्रतिबंध प्रायिकता क्या है कि B1 से चुनी गई गेंद भी लाल थी?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न सप्रतिबंध प्रायिकता (conditional probability) और बेज़ प्रमेय (Bayes' Theorem) पर आधारित है।
हमें यह ज्ञात करना है कि यदि दूसरी गेंद लाल प्राप्त हुई है, तो पहली निकाली गई गेंद के लाल होने की प्रायिकता क्या होगी।
Step 2: Key Formula or Approach:
बेज़ प्रमेय के अनुसार:
\[ P(R_1 \mid R_2) = \frac{P(R_1) \cdot P(R_2 \mid R_1)}{P(R_1) \cdot P(R_2 \mid R_1) + P(K_1) \cdot P(R_2 \mid K_1)} \]
जहाँ \(R_1, K_1\) क्रमशः प्रथम डब्बे से लाल और काली गेंद निकालने की घटनाएं हैं, और \(R_2\) द्वितीय डब्बे से लाल गेंद निकालने की घटना है।
Step 3: Detailed Explanation:
डब्बा \(B_1\) की स्थिति: 3 लाल और 4 काली गेंदें (कुल = 7)।
- लाल गेंद निकलने की प्रायिकता \(P(R_1) = \frac{3}{7}\)
- काली गेंद निकलने की प्रायिकता \(P(K_1) = \frac{4}{7}\)
स्थिति 1 (यदि \(B_1\) से लाल गेंद निकली):
डब्बे \(B_2\) में 4 अतिरिक्त लाल गेंदें डाली जाती हैं।
अब \(B_2\) में गेंदें = \((3+4)\) लाल + 4 काली = 7 लाल + 4 काली (कुल = 11)।
इस स्थिति में \(B_2\) से लाल गेंद निकलने की प्रायिकता:
\[ P(R_2 \mid R_1) = \frac{7}{11} \]
स्थिति 2 (यदि \(B_1\) से काली गेंद निकली):
डब्बे \(B_2\) में 3 अतिरिक्त काली गेंदें डाली जाती हैं।
अब \(B_2\) में गेंदें = 3 लाल + \((4+3)\) काली = 3 लाल + 7 काली (कुल = 10)।
इस स्थिति में \(B_2\) से लाल गेंद निकलने की प्रायिकता:
\[ P(R_2 \mid K_1) = \frac{3}{10} \]
बेज़ प्रमेय द्वारा अभीष्ट प्रायिकता की गणना:
- अंश (Numerator):
\[ P(R_1) \cdot P(R_2 \mid R_1) = \frac{3}{7} \times \frac{7}{11} = \frac{3}{11} \]
- हर (Denominator):
\[ P(R_1) \cdot P(R_2 \mid R_1) + P(K_1) \cdot P(R_2 \mid K_1) = \frac{3}{11} + \left(\frac{4}{7} \times \frac{3}{10}\right) = \frac{3}{11} + \frac{6}{35} \]
लघुत्तम समापवर्त्य (385) लेकर जोड़ने पर:
\[ \frac{3 \times 35 + 6 \times 11}{385} = \frac{105 + 66}{385} = \frac{171}{385} \]
- अभीष्ट प्रायिकता:
\[ P(R_1 \mid R_2) = \frac{\frac{3}{11}}{\frac{171}{385}} = \frac{3}{11} \times \frac{385}{171} = \frac{3 \times 35}{171} = \frac{105}{171} = \frac{35}{57} \]
अतः, अभीष्ट प्रायिकता \(\frac{35}{57}\) है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि बेज़ प्रमेय के अनुप्रयोग से सटीक प्रायिकता का मान \(\frac{35}{57}\) प्राप्त होता है। Quick Tip: सप्रतिबंध प्रायिकता की समस्याओं में हमेशा दोनों संभावित शाखाओं (paths) के लिए अलग-अलग कुल गेंद संख्या की पुनः जांच करें, क्योंकि अतिरिक्त गेंदों के योग से हर का मान बदल जाता है।
फलन f : R \(\rightarrow\) R निम्न द्वारा परिभाषित है:
f(x) = |x − 2| + 3|x − 1| + ||x − 2| − 1| .
ऐसे कितने बिन्दु हैं जिन पर f अवकलनीय नहीं है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न मापांक फलनों (absolute value functions) की अवकलनीयता (differentiability) से संबंधित है।
हमें दिए गए जटिल मापांक फलन के उन 'तीक्ष्ण कोनों' (sharp corners) या बिन्दुओं की संख्या ज्ञात करनी है जहाँ फलन अवकलनीय नहीं है।
Step 2: Detailed Explanation:
फलन के भीतर उपस्थित विभिन्न मापांकों के शून्य होने वाले संभावित क्रांतिक बिन्दु (critical points) निम्नलिखित हैं:
1. \(|x - 2| = 0 \implies x = 2\)
2. \(|x - 1| = 0 \implies x = 1\)
3. \(||x - 2| - 1| = 0 \implies |x - 2| = 1 \implies x = 3 या x = 1\)
अतः, अवकलनीयता की जांच के लिए संभावित संदिग्ध बिन्दु केवल \(x = 1, 2, 3\) हैं।
बिन्दु \(x = 2\) पर विश्लेषण:
अंतराल \((1, 3)\) में:
चूंकि \(x \in (1, 3)\), इसलिए \(|x - 1| = x - 1\) और \(|x - 2| < 1\), जिससे \(||x - 2| - 1| = 1 - |x - 2|\).
अतः इस अंतराल में फलन होगा:
\[ f(x) = |x - 2| + 3(x - 1) + (1 - |x - 2|) \]
यहाँ \(|x-2|\) का पद पूर्णतः कट जाता है!
\[ f(x) = 3x - 3 + 1 = 3x - 2 \]
चूँकि \(f(x)\) इस पूरे अंतराल में एक रैखिक फलन (polynomial) है, इसलिए यह \(x = 2\) पर पूरी तरह से अवकलनीय (differentiable) है।
बिन्दु \(x = 1\) पर विश्लेषण:
अंतराल \((0, 2)\) में फलन का रूप:
\[ f(x) = (2 - x) + 3|x - 1| + |x - 1| = 2 - x + 4|x - 1| \]
यहाँ स्पष्ट रूप से \(x = 1\) पर \(|x-1|\) की उपस्थिति के कारण एक तीक्ष्ण मोड़ (sharp corner) बनेगा, जिससे फलन \(x = 1\) पर अवकलनीय नहीं है।
बिन्दु \(x = 3\) पर विश्लेषण:
अंतराल \((2, 4)\) में फलन का रूप:
\[ f(x) = (x - 2) + 3(x - 1) + |x - 3| = 4x - 5 + |x - 3| \]
यहाँ भी \(x = 3\) पर \(|x-3|\) की उपस्थिति के कारण फलन अवकलनीय नहीं है।
अतः, फलन केवल दो बिन्दुओं (\(x = 1\) और \(x = 3\)) पर अवकलनीय नहीं है।
Step 3: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि सरल करने पर \(x=2\) पर मापांक का प्रभाव समाप्त हो जाता है और केवल 2 बिन्दुओं पर अवकलनीयता का अभाव बचता है। Quick Tip: जब एक ही मापांक पद समीकरण में धनात्मक और ऋणात्मक दोनों रूपों में समान गुणांक के साथ उपस्थित हो (जैसे यहाँ \(|x-2|\) और \(-|x-2|\)), तो वह बिन्दु अक्सर अवकलनीय बन जाता है क्योंकि उसके कोणीय प्रभाव आपस में निरस्त हो जाते हैं।
समान द्रव्यमान वाले एक गोले और एक घन को दो ऊर्ध्वाधर दीवारों के बीच एक घर्षणरहित क्षैतिज सतह पर चित्र में प्रदर्शित व्यवस्था के अनुसार रखा गया है। घन एक भार रहित स्प्रिंग की सहायता से एक दीवार से जुड़ा हुआ है। स्प्रिंग की साम्यावस्था में गोलक घन को स्पर्श करता है। इस घन को अपनी साम्यावस्था से बाँयी दिशा में एक लघु दूरी \(\ell\) से स्प्रिंग को संपीड़ित करते हुये विस्थापित किया जाता है और \(t = 0\) पर मुक्त कर दिया जाता है। यह समूचा प्रबन्धन अपनी \(t = 0\) वाली अवस्था में आवर्तकाल \(T\) के साथ पुनः लौटता रहता है। यदि सारे संघट्ट प्रत्यास्थ हों तो निम्नलिखित कथनों में से कौन सा कथन सही है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion) और प्रत्यास्थ संघट्ट (Elastic Collision) के सिद्धांतों पर आधारित है।
हमें यह समझना है कि जब एक द्रव्यमान को संपीड़ित करके छोड़ा जाता है, तो वह किस प्रकार गति करता है और संघट्ट के कारण आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
सरल आवर्त गति का आवर्तकाल \(T_0 = 2\pi\sqrt{\frac{m}{k}}\) होता है।
प्रत्यास्थ संघट्ट में समान द्रव्यमान वाले दो पिण्डों के वेगों का आपस में आदान-प्रदान (exchange of velocities) हो जाता है।
Step 3: Detailed Explanation:
गति का प्रथम चरण:
घन को बाईं ओर \(\ell\) दूरी तक संपीड़ित किया जाता है और \(t=0\) पर मुक्त किया जाता है।
घन अपनी साम्यावस्था (equilibrium position) तक पहुँचने के लिए एक चौथाई आवर्तकाल का समय लेता है:
\[ t_1 = \frac{T_{shm}}{4} = \frac{\pi}{2}\sqrt{\frac{m}{k}} \]
इस बिंदु पर घन का वेग अधिकतम होता है, जो \(v_0 = \ell\sqrt{\frac{k}{m}}\) है।
गति का द्वितीय चरण (संघट्ट):
साम्यावस्था पर घन, समान द्रव्यमान \(m\) वाले गोले से प्रत्यास्थ रूप से टकराता है।
चूँकि द्रव्यमान समान हैं और संघट्ट प्रत्यास्थ है, इसलिए उनके वेग आपस में बदल जाते हैं।
घन तुरंत रुक जाता है (\(v = 0\)) और गोला \(v_0\) वेग से दाईं ओर गति करने लगता है।
गति का तृतीय चरण:
माना कि साम्यावस्था और दाईं दीवार के बीच की दूरी \(d\) है।
गोला इस दूरी को तय करता है, दाईं दीवार से प्रत्यास्थ रूप से टकराता है, और वापस लौटता है।
गोले द्वारा लिया गया कुल समय:
\[ t_2 = \frac{2d}{v_0} = \frac{2d}{\ell}\sqrt{\frac{m}{k}} \]
गति का चतुर्थ चरण:
वापस लौटने पर गोला स्थिर घन से टकराता है। फिर से वेगों का आदान-प्रदान होता है।
गोला रुक जाता है और घन बाईं ओर \(v_0\) वेग से चलने लगता है।
घन स्प्रिंग को संपीड़ित करता है और पुनः अपनी प्रारंभिक स्थिति (अधिकतम संपीड़न \(\ell\)) पर पहुँच जाता है।
इस चरण में लिया गया समय:
\[ t_3 = \frac{\pi}{2}\sqrt{\frac{m}{k}} \]
कुल आवर्तकाल की गणना:
संपूर्ण प्रक्रिया का कुल आवर्तकाल \(T\) निम्न प्रकार है:
\[ T = t_1 + t_2 + t_3 = \frac{\pi}{2}\sqrt{\frac{m}{k}} + \frac{2d}{\ell}\sqrt{\frac{m}{k}} + \frac{\pi}{2}\sqrt{\frac{m}{k}} \]
\[ T = \left( \pi + \frac{2d}{\ell} \right)\sqrt{\frac{m}{k}} \]
इस समीकरण से स्पष्ट है कि यदि \(\ell\) बढ़ता है, तो पद \(\frac{2d}{\ell}\) का मान घट जाता है, जिससे कुल आवर्तकाल \(T\) घट जाता है।
Step 4: Final Answer:
अतः, सही विकल्प (A) है क्योंकि \(\ell\) के बढ़ने पर आवर्तकाल \(T\) का मान घट जाता है।
Quick Tip: जब भी प्रत्यास्थ संघट्ट में समान द्रव्यमान के पिंड टकराते हैं, तो वे अपने वेगों का आदान-प्रदान करते हैं। ऐसे प्रश्नों में गति को अलग-अलग सरल भागों (SHM और एकसमान गति) में विभाजित करके हल करना आसान होता है।
10 cm की फोकल दूरी वाला एक अवतल गोलीय दर्पण एवं 5 cm की फोकल दूरी वाला एक उभयोत्तल लेन्स अपने पारस्परिक मुख्य अक्ष पर चित्र में दर्शाये व्यवस्था के अनुसार संयोजित हैं। इस मुख्य अक्ष पर किसी बिम्ब को दर्पण एवं लेन्स के फोकस बिन्दुओं, क्रमशः \(F_1\) और \(F_2\) के बीच रखा गया है। यदि इस स्थिति में लेन्स के द्वारा दो वास्तविक एवं परस्पर उल्टे प्रतिबिम्ब मुख्य अक्ष के एक ही बिन्दु पर बनते हैं तो बिम्ब की दर्पण से दूरी कितनी होगी?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न किरण प्रकाशिकी (Ray Optics) में दर्पण और लेंस के संयोजन पर आधारित है।
लेंस द्वारा दो वास्तविक और परस्पर उल्टे प्रतिबिंब तभी बन सकते हैं जब एक प्रकाश किरण सीधे लेंस से गुजरे और दूसरी किरण दर्पण से परावर्तित होकर लेंस से गुजरे।
Step 2: Key Formula or Approach:
दर्पण का सूत्र: \(\frac{1}{v} + \frac{1}{u} = \frac{1}{f_m}\)
लेंस का सूत्र: \(\frac{1}{v} - \frac{1}{u} = \frac{1}{f_l}\)
दोनों स्थितियों में लेंस के लिए प्रतिबिंब दूरी \(v\) समान होनी चाहिए।
Step 3: Detailed Explanation:
दी गई जानकारी:
दर्पण और लेंस के बीच की दूरी \(d = 50 cm\)
दर्पण की फोकस दूरी \(f_m = -10 cm\) (अवतल दर्पण)
लेंस की फोकस दूरी \(f_l = +5 cm\) (उत्तल लेंस)
बिम्ब को दर्पण के फोकस \(F_1\) (10 cm दूरी पर) और लेंस के फोकस \(F_2\) (लेंस से 5 cm, अर्थात दर्पण से 45 cm दूरी पर) के बीच रखा गया है।
माना बिम्ब दर्पण से \(x\) दूरी पर स्थित है।
प्रथम स्थिति (सीधे लेंस से जाने वाली किरणें):
लेंस से बिम्ब की दूरी \(u_1 = -(50 - x)\)
लेंस सूत्र का उपयोग करने पर:
\[ \frac{1}{v_1} - \frac{1}{-(50 - x)} = \frac{1}{5} \implies \frac{1}{v_1} = \frac{1}{5} - \frac{1}{50 - x} \]
द्वितीय स्थिति (दर्पण से परावर्तन के बाद लेंस से जाने वाली किरणें):
दर्पण के लिए बिम्ब दूरी \(u_m = -x\)
दर्पण सूत्र द्वारा प्रतिबिंब दूरी \(v_m\) की गणना:
\[ \frac{1}{v_m} + \frac{1}{-x} = \frac{1}{-10} \implies \frac{1}{v_m} = \frac{1}{x} - \frac{1}{10} = \frac{10 - x}{10x} \]
\[ v_m = -\frac{10x}{x - 10} \]
यह प्रतिबिंब लेंस के लिए एक नए बिम्ब का कार्य करता है।
लेंस से इस नए बिम्ब की दूरी:
\[ u_2 = -\left(50 - |v_m|\right) = -\left(50 - \frac{10x}{x - 10}\right) \]
प्रतिबिंबों के एक ही बिंदु पर बनने की शर्त:
चूँकि दोनों प्रतिबिंब एक ही स्थान पर बनते हैं, लेंस के लिए दोनों स्थितियों में बिम्ब दूरी समान होनी चाहिए, अर्थात:
\[ 50 - x = 50 - \frac{10x}{x - 10} \]
\[ x = \frac{10x}{x - 10} \]
चूँकि \(x \neq 0\), हम लिख सकते हैं:
\[ 1 = \frac{10}{x - 10} \implies x - 10 = 10 \implies x = 20 cm \]
इस दूरी पर, बिम्ब अवतल दर्पण के वक्रता केंद्र (\(2f_m = 20 cm\)) पर स्थित है, जिससे इसका वास्तविक प्रतिबिंब ठीक उसी स्थान पर बनता है।
Quick Tip: जब बिम्ब दर्पण के वक्रता केंद्र पर होता है, तो उसका प्रतिबिंब उसी स्थान पर बनता है। इस तथ्य का उपयोग करके गणना को बहुत सरल बनाया जा सकता है।
लम्बाई \(L\), द्रव्यमान \(m\) तथा विद्युत आवेश \(q\) से आवेशित गोलक वाला एक सरल लोलक आवर्तकाल \(T\) के साथ \(-\hat{z}\) की दिशा में स्थित एकसमान गुरुत्व के प्रभाव में दोलन कर रहा है। इस लोलक को एकसमान विद्युत क्षेत्र \(|E|\hat{n}\) (जहां \(\hat{n}\) दोलन-तल में एक इकाई सदिश है) में स्थापित करने पर दोलन का आवर्तकाल घट जाता है। निम्न में से कौन सा कथन गलत है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न विद्युत क्षेत्र में लोलक की गति और प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण (\(g_{eff}\)) की गणना पर आधारित है।
हमें वह कथन खोजना है जो आवर्तकाल में कमी के अनुकूल नहीं है (अर्थात गलत कथन)।
Step 2: Key Formula or Approach:
सरल लोलक का आवर्तकाल \(T = 2\pi\sqrt{\frac{L}{g_{eff}}}\) होता है।
आवर्तकाल घटने के लिए प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण \(g_{eff}\) का मान प्रारंभिक गुरुत्व \(g\) से अधिक होना चाहिए (\(g_{eff} > g\))।
Step 3: Detailed Explanation:
प्रभावी त्वरण की गणना:
प्रारंभिक गुरुत्वीय त्वरण: \(\vec{g} = -g\hat{z}\)
विद्युत बल के कारण त्वरण: \(\vec{a}_e = \frac{q\vec{E}}{m} = \frac{q|E|\hat{n}}{m}\)
प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण:
\[ \vec{g}_{eff} = -g\hat{z} + \frac{q|E|}{m}\hat{n} \]
इसका परिमाण:
\[ g_{eff}^2 = g^2 + \left(\frac{q|E|}{m}\right)^2 - \frac{2gq|E|}{m}(\hat{z} \cdot \hat{n}) \]
आवर्तकाल घटने के लिए, हमें \(g_{eff} > g\) चाहिए, जिसके लिए:
\[ \left(\frac{q|E|}{m}\right)^2 - \frac{2gq|E|}{m}(\hat{z} \cdot \hat{n}) > 0 \]
विकल्पों का विश्लेषण:
- विकल्प (A): \(q > 0\) और \(\hat{n} = \hat{z}\)
यहाँ विद्युत बल ऊपर की ओर (\(+\hat{z}\)) कार्य करेगा, जो गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत है।
इससे प्रभावी त्वरण \(g_{eff} = g - \frac{q|E|}{m}\) हो जाएगा (यदि विद्युत बल छोटा है), जिससे आवर्तकाल बढ़ेगा। अतः यह कथन गलत है।
- विकल्प (B): \(q > 0\) और \(\hat{n} = -\hat{z}\)
विद्युत बल नीचे की ओर कार्य करेगा, जिससे \(g_{eff} = g + \frac{q|E|}{m} > g\) होगा और आवर्तकाल घटेगा। यह सही है।
- विकल्प (C): \(q < 0\) और \(\hat{n} = \hat{z}\)
ऋणात्मक आवेश के कारण बल क्षेत्र के विपरीत दिशा में (अर्थात नीचे की ओर) लगेगा। \(g_{eff} > g\), आवर्तकाल घटेगा। यह सही है।
- विकल्प (D): \(q > 0\) और \(\hat{n} \cdot \hat{z} = -\frac{1}{\sqrt{2}}\)
यहाँ अदिश गुणनफल ऋणात्मक है, जिससे \(g_{eff}\) का मान \(g\) से अधिक हो जाएगा। यह भी आवर्तकाल को घटाएगा। यह सही है।
Quick Tip: जब भी विद्युत क्षेत्र और गुरुत्व एक ही दिशा में (या आंशिक रूप से एक ही दिशा में) कार्य करते हैं, तो प्रभावी त्वरण बढ़ता है और आवर्तकाल घटता है। विपरीत दिशा में बल होने पर आवर्तकाल बढ़ता है।
द्रव्यमान \(m_1\) व विद्युत आवेश \(q\) का एक कण, एकसमान बाह्य विद्युत क्षेत्र \(\mathbf{E}\) में, विरामावस्था से प्रारंभ कर \(d\) दूरी \(t_1\) समय में तय करता है। यदि कण का द्रव्यमान \(m_2\) हो तो वही दूरी तय करने में \(t_2\) समय लगता है। \(\frac{t_1}{t_2}\) का अनुपात क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न विद्युत क्षेत्र में एक आवेशित कण की त्वरित गति पर आधारित है।
विद्युत बल के प्रभाव में कण विरामावस्था से गति प्रारंभ करता है, और हमें दिए गए द्रव्यमानों के लिए समय का अनुपात ज्ञात करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
विद्युत क्षेत्र में आवेश \(q\) पर बल: \(F = qE\)
न्यूटन के नियम से त्वरण: \(a = \frac{F}{m} = \frac{qE}{m}\)
गति का द्वितीय समीकरण (विरामावस्था \(u = 0\) के लिए): \(d = \frac{1}{2}at^2\)
Step 3: Detailed Explanation:
द्रव्यमान \(m_1\) के लिए समय की गणना:
कण का त्वरण \(a_1 = \frac{qE}{m_1}\)
दूरी \(d\) तय करने में लगा समय:
\[ d = \frac{1}{2} a_1 t_1^2 \implies t_1 = \sqrt{\frac{2d}{a_1}} = \sqrt{\frac{2d m_1}{qE}} \]
द्रव्यमान \(m_2\) के लिए समय की गणना:
कण का त्वरण \(a_2 = \frac{qE}{m_2}\)
दूरी \(d\) तय करने में लगा समय:
\[ t_2 = \sqrt{\frac{2d}{a_2}} = \sqrt{\frac{2d m_2}{qE}} \]
अनुपात ज्ञात करना:
दोनों समय समीकरणों का अनुपात लेने पर:
\[ \frac{t_1}{t_2} = \frac{\sqrt{\frac{2d m_1}{qE}}}{\sqrt{\frac{2d m_2}{qE}}} = \sqrt{\frac{m_1}{m_2}} \]
अतः, समय का अनुपात द्रव्यमानों के वर्गमूल के सीधे समानुपाती होता है।
Quick Tip: नियत बल के प्रभाव में विरामावस्था से समान दूरी तय करने में लगा समय द्रव्यमान के वर्गमूल के समानुपाती होता है (\(t \propto \sqrt{m}\))। इस सीधे संबंध का उपयोग परीक्षा में समय बचाने के लिए किया जा सकता है।
एक अनूठी गोलाकार जेलीफिश का आयतन गुणांक \(B\) है। जब जेलीफिश समुद्र की ऊपरी सतह (गहराई \(d = 0\)) पर हो तो उसकी त्रिज्या \(R\) है। समुद्र के भीतर \(d\) (\(d \gg R\)) की गहराई पर जाने पर उसकी त्रिज्या \(\Delta R > 0\) से सिकुड़ जाती है। यदि असम्पीड्य समुद्री जल का घनत्व \(\rho\) हो, एकसमान गुरुत्वीय त्वरण \(g\) हो और \(\rho gd \ll B\), तो \(\frac{\Delta R}{R}\) का मान क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न द्रवों के दाब और पदार्थों के यांत्रिक गुणों (Bulk Modulus) पर आधारित है।
जैसे-जैसे जेलीफिश समुद्र की गहराई में जाती है, हाइड्रोस्टेटिक दाब बढ़ने के कारण उसका आयतन और त्रिज्या दोनों घट जाते हैं।
Step 2: Key Formula or Approach:
आयतन गुणांक (Bulk Modulus): \(B = -V \frac{dP}{dV} \implies \frac{dV}{V} = -\frac{dP}{B}\)
गहराई \(d\) पर दाब में वृद्धि: \(dP = \rho g d\)
गोलाकार वस्तु का आयतन: \(V = \frac{4}{3}\pi R^3\)
Step 3: Detailed Explanation:
आयतन परिवर्तन की गणना:
माना समुद्र की सतह पर आयतन \(V_0 = \frac{4}{3}\pi R^3\) है।
गहराई \(d\) पर दाब में परिवर्तन \(\Delta P = \rho g d\) है।
आयतन गुणांक की परिभाषा से:
\[ \ln\left(\frac{V}{V_0}\right) = -\frac{\rho gd}{B} \implies V = V_0 e^{-\frac{\rho gd}{B}} \]
चूँकि \(\rho gd \ll B\), हम प्रथम कोटि के सन्निकटन (first-order approximation) का उपयोग कर सकते हैं:
\[ V = V_0 \left(1 - \frac{\rho gd}{B}\right) \]
त्रिज्या परिवर्तन से संबंध:
गहराई \(d\) पर नई त्रिज्या \(R' = R - \Delta R\) होगी।
नया आयतन:
\[ V = \frac{4}{3}\pi (R - \Delta R)^3 \]
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\[ \frac{4}{3}\pi (R - \Delta R)^3 = \frac{4}{3}\pi R^3 \left(1 - \frac{\rho gd}{B}\right) \]
\[ \left( \frac{R - \Delta R}{R} \right)^3 = 1 - \frac{\rho gd}{B} \]
दोनों पक्षों का घनमूल लेने पर:
\[ 1 - \frac{\Delta R}{R} = \left(1 - \frac{\rho gd}{B}\right)^{1/3} \]
\[ \frac{\Delta R}{R} = 1 - \left(1 - \frac{\rho gd}{B}\right)^{1/3} \]
अतः जेलीफिश की त्रिज्या में भिन्नात्मक परिवर्तन का मान विकल्प (A) के अनुरूप प्राप्त होता है।
Quick Tip: जब परिवर्तन बहुत छोटा हो (\(\rho gd \ll B\)), तब द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem) का उपयोग करके सीधे \(\frac{\Delta V}{V} = 3\frac{\Delta R}{R}\) का संबंध भी प्राप्त किया जा सकता है।
एक ग्रह किसी तारे के केन्द्र के परितः, पूर्ण रूप से तारे के गुरुत्वीय प्रभाव के अधीन हो कर, आवर्तकाल \(T\) वाले वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा कर रहा है। कल्पना करें कि तारे एवं ग्रह के बीच की दूरी आधी हो जाती है। साथ ही तारे एवं ग्रह की निजी त्रिज्याएँ भी इस तरह से आधी कर दी जाती हैं कि उनके निजी घनत्व (जो कि एकसमान रूप से वितरित हैं) अपरिवर्तित रहते हैं। इस स्थिति में ग्रह के नए कक्ष का आवर्तकाल क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न गुरुत्वाकर्षण और ग्रहों की कक्षीय गति पर आधारित है।
हमें यह देखना है कि तारे के द्रव्यमान में परिवर्तन (त्रिज्या आधी होने और घनत्व नियत रहने के कारण) और कक्षीय त्रिज्या आधी होने पर आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
कक्षीय आवर्तकाल का सूत्र: \(T = 2\pi\sqrt{\frac{R^3}{GM}}\)
द्रव्यमान और घनत्व का संबंध: \(M = आयतन \times घनत्व = \frac{4}{3}\pi r_s^3 \rho\)
Step 3: Detailed Explanation:
प्रारंभिक स्थिति:
माना तारे का द्रव्यमान \(M\), कक्षीय त्रिज्या \(R\) और तारा का घनत्व \(\rho\) है।
आवर्तकाल:
\[ T = 2\pi\sqrt{\frac{R^3}{GM}} \]
परिवर्तित स्थिति में गणना:
तारे की त्रिज्या आधी हो जाती है (\(r'_s = r_s / 2\)) जबकि घनत्व \(\rho\) अपरिवर्तित रहता है।
नया द्रव्यमान \(M'\):
\[ M' = \frac{4}{3}\pi \left(\frac{r_s}{2}\right)^3 \rho = \frac{1}{8} \left( \frac{4}{3}\pi r_s^3 \rho \right) = \frac{M}{8} \]
कक्षीय त्रिज्या भी आधी हो जाती है (\(R' = R/2\))।
नया आवर्तकाल \(T'\):
\[ T' = 2\pi\sqrt{\frac{(R')^3}{GM'}} \]
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\[ T' = 2\pi\sqrt{\frac{\left(\frac{R}{2}\right)^3}{G\left(\frac{M}{8}\right)}} = 2\pi\sqrt{\frac{\frac{R^3}{8}}{G\frac{M}{8}}} = 2\pi\sqrt{\frac{R^3}{GM}} = T \]
इससे स्पष्ट है कि नए कक्ष का आवर्तकाल अपरिवर्तित रहता है।
Quick Tip: यदि कक्षीय त्रिज्या और केंद्रीय पिंड की वास्तविक त्रिज्या दोनों को समान अनुपात में बदला जाए और घनत्व नियत रहे, तो आवर्तकाल हमेशा अपरिवर्तित रहता है।
किसी समय \(t\) पर द्रव्यमान 1 kg वाले एक पिण्ड की स्थिति \(\mathbf{r} = t \hat{\mathbf{i}} + \hat{\mathbf{j}} + 2 t^2 \hat{\mathbf{k}}\) से निरूपित की जाती है, जहां \(t\) सेकंडों में दिया गया है और प्रत्येक गुणांक अपनी उचित इकाइयों में इस तरह से दिये गये हैं कि \(\mathbf{r}\) मीटर की इकाई में निरूपित हो सके। केन्द्र के सापेक्ष मापे गये पिण्ड के कोणीय संवेग का घटक, सदिश \((\hat{\mathbf{i}} + \hat{\mathbf{j}})\) के अनुदिश, \(kg m^2s^{-1}\) की मापन इकाई में कितना होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न घूर्णी गति (Rotational Motion) के अंतर्गत कोणीय संवेग (Angular Momentum) की गणना और उसके किसी विशेष दिशा में घटक (Component) को ज्ञात करने पर आधारित है।
Step 2: Key Formula or Approach:
वेग: \(\vec{v} = \frac{d\vec{r}}{dt}\)
कोणीय संवेग: \(\vec{L} = \vec{r} \times \vec{p} = m(\vec{r} \times \vec{v})\)
किसी सदिश \(\vec{u}\) के अनुदिश घटक: \(L_u = \vec{L} \cdot \hat{u}\) (जहाँ \(\hat{u}\) उस दिशा का इकाई सदिश है)।
Step 3: Detailed Explanation:
वेग की गणना:
स्थिति सदिश \(\vec{r} = t\hat{i} + \hat{j} + 2t^2\hat{k}\)
अवकलन करने पर:
\[ \vec{v} = \frac{d\vec{r}}{dt} = \hat{i} + 0\hat{j} + 4t\hat{k} = \hat{i} + 4t\hat{k} \]
कोणीय संवेग \(\vec{L}\) की गणना:
द्रव्यमान \(m = 1 kg\) है।
\[ \vec{L} = m(\vec{r} \times \vec{v}) = 1 \cdot \det \begin{pmatrix} \hat{i} & \hat{j} & \hat{k}
t & 1 & 2t^2
1 & 0 & 4t \end{pmatrix} \]
\[ \vec{L} = \hat{i}(4t - 0) - \hat{j}(4t^2 - 2t^2) + \hat{k}(0 - 1) \]
\[ \vec{L} = 4t\hat{i} - 2t^2\hat{j} - \hat{k} \]
\((\hat{i} + \hat{j})\) की दिशा में घटक की गणना:
दिशा का इकाई सदिश:
\[ \hat{u} = \frac{\hat{i} + \hat{j}}{|\hat{i} + \hat{j}|} = \frac{\hat{i} + \hat{j}}{\sqrt{2}} \]
कोणीय संवेग का घटक:
\[ L_u = \vec{L} \cdot \hat{u} = (4t\hat{i} - 2t^2\hat{j} - \hat{k}) \cdot \left(\frac{\hat{i} + \hat{j}}{\sqrt{2}}\right) \]
\[ L_u = \frac{4t(1) - 2t^2(1)}{\sqrt{2}} = \frac{1}{\sqrt{2}}(4t - 2t^2) \]
अतः घटक का मान \(\frac{1}{\sqrt{2}}(4t - 2t^2)\) है।
Quick Tip: हमेशा याद रखें कि किसी भी घटक को ज्ञात करने से पहले लक्ष्य सदिश को इकाई सदिश (Unit Vector) में परिवर्तित करना अनिवार्य है, अन्यथा परिमाण गलत प्राप्त होगा।
प्रारम्भिक त्रिज्या \(R_0\) वाली एक लंबी परिनालिका एकसमान चुंबकीय क्षेत्र \(\mathbf{B}\) में ऐसे रखी गयी है कि इसका अक्ष चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में है। यह परिनालिका एक बंद परिपथ का हिस्सा है जिसमें प्रारंभ में कोई विद्युत धारा प्रवाहित नहीं हो रही है। यदि परिनालिका की त्रिज्या एकसमान दर से बढ़नी शुरू हो जाए तो परिनालिका में मौजूद चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता \(B_{in}\) एवं उससे संबद्ध चुंबकीय ऊर्जा \(U_{in}\) में क्या बदलाव आयेगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) और लेन्ज के नियम (Lenz's Law) पर आधारित है।
त्रिज्या बढ़ने से परिनालिका के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल बढ़ेगा, जिससे चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होगा।
Step 2: Key Formula or Approach:
चुंबकीय फ्लक्स: \(\Phi = B \cdot A\)
लेन्ज के नियम के अनुसार, प्रेरित धारा चुंबकीय फ्लक्स में वृद्धि का विरोध करेगी।
चुंबकीय ऊर्जा घनत्व: \(u = \frac{B^2}{2\mu_0}\)
Step 3: Detailed Explanation:
चुंबकीय क्षेत्र \(B_{in}\) में परिवर्तन:
जब परिनालिका की त्रिज्या बढ़ती है, तो उसका क्षेत्रफल \(A = \pi R^2\) बढ़ता है।
इससे परिनालिका से गुजरने वाला कुल बाह्य चुंबकीय फ्लक्स \(\Phi = B_0 A\) बढ़ता है।
लेन्ज के नियम के अनुसार, परिपथ में प्रेरित धारा उत्पन्न होगी जो इस बढ़ते फ्लक्स का विरोध करेगी।
इसलिए, प्रेरित चुंबकीय क्षेत्र बाह्य क्षेत्र \(\mathbf{B}\) की विपरीत दिशा में होगा।
अतः, परिनालिका के अंदर का कुल चुंबकीय क्षेत्र \(B_{in} = B_0 - B_{induced}\) कम हो जाएगा।
चुंबकीय ऊर्जा \(U_{in}\) में परिवर्तन:
अतिचालक (Superconducting) या अत्यंत कम प्रतिरोध वाले लूप के लिए चुंबकीय फ्लक्स \(\Phi = B_{in} A\) लगभग नियत रहता है।
चूँकि \(A\) बढ़ता है, \(B_{in}\) घटता है ताकि \(\Phi\) नियत रहे:
\[ B_{in} \propto \frac{1}{R^2} \]
कुल चुंबकीय ऊर्जा:
\[ U_{in} = \left( \frac{B_{in}^2}{2\mu_0} \right) \times आयतन \propto B_{in}^2 R^2 \propto \left(\frac{1}{R^4}\right) R^2 \propto \frac{1}{R^2} \]
चूँकि त्रिज्या \(R\) बढ़ रही है, इसलिए चुंबकीय ऊर्जा \(U_{in}\) भी घटेगी।
अतः, \(B_{in}\) और \(U_{in}\) दोनों घटेंगे।
Quick Tip: लेन्ज का नियम हमेशा प्रकृति में "विरोध" करने का काम करता है। फ्लक्स बढ़ने पर प्रेरित चुंबकीय क्षेत्र मुख्य क्षेत्र के विपरीत होता है, जिससे कुल चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता कम हो जाती है।
एक कण का त्वरण निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त होता है: \[ \frac{d^2\mathbf{x}}{dt^2} = \alpha \frac{\mathbf{x}}{|\mathbf{x}|^7} + \beta \frac{d\mathbf{x}}{dt} \]
जहां \(\mathbf{x}\) स्थिति और \(t\) समय को दर्शाते हैं। निम्न में से कौन से सम्बन्ध \(\alpha\) और \(\beta\) की सही विमाएं दर्शाते हैं?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न विमीय विश्लेषण (Dimensional Analysis) और विमीय समांगता के सिद्धांत (Principle of Dimensional Homogeneity) पर आधारित है।
समीकरण के प्रत्येक पद की विमाएँ समान होनी चाहिए।
Step 2: Key Formula or Approach:
बाईं ओर का पद त्वरण \(\frac{d^2\mathbf{x}}{dt^2}\) है, जिसकी विमा \([L T^{-2}]\) होती है।
विमीय समांगता के नियम से:
\[ \left[ \frac{d^2\mathbf{x}}{dt^2} \right] = \left[ \alpha \frac{\mathbf{x}}{|\mathbf{x}|^7} \right] = \left[ \beta \frac{d\mathbf{x}}{dt} \right] \]
Step 3: Detailed Explanation:
\(\alpha\) की विमा ज्ञात करना:
हम जानते हैं कि \([\mathbf{x}] = [L]\) और \([|\mathbf{x}|^7] = [L^7]\) है।
पहले पद की तुलना करने पर:
\[ [L T^{-2}] = [\alpha] \frac{[L]}{[L^7]} \]
\[ [L T^{-2}] = [\alpha] [L^{-6}] \]
\[ [\alpha] = [L T^{-2}] [L^6] = [L^7 T^{-2}] \]
द्रव्यमान के पद में लिखने पर: \([\alpha] = [M^0 L^7 T^{-2}]\)
\(\beta\) की विमा ज्ञात करना:
हम जानते हैं कि वेग \(\left[\frac{d\mathbf{x}}{dt}\right] = [L T^{-1}]\) है।
दूसरे पद की तुलना करने पर:
\[ [L T^{-2}] = [\beta] [L T^{-1}] \]
\[ [\beta] = \frac{[L T^{-2}]}{[L T^{-1}]} = [T^{-1}] \]
द्रव्यमान और लंबाई के पद में लिखने पर: \([\beta] = [M^0 L^0 T^{-1}]\)
अतः विकल्प (A) सही विमाओं को दर्शाता है।
Quick Tip: विमीय विश्लेषण में केवल समान विमाओं वाले पदों को ही जोड़ा या घटाया जा सकता है। समीकरण के दोनों ओर के प्रत्येक स्वतंत्र पद की विमा हमेशा समान होती है।
एक समतल सतह पर अभिलम्बतः आपतित, संचरित क्षमता \(P\) वाले, फोटॉनों के एकवर्णी किरण पुंज का विचार करें। इस आपतित पुंज का 10% भाग अवशोषित हो जाता है, 10% भाग पारगमित हो जाता है और शेष भाग सतह के द्वारा परावर्तित हो जाता है। यदि प्रकाश का वेग \(c\) हो तो इस सतह पर पुंज के द्वारा कितना बल लग रहा है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न प्रकाश के संवेग (Momentum of Light) और विकिरण दाब (Radiation Pressure) पर आधारित है।
सतह पर लगने वाला बल, प्रति सेकंड संवेग में होने वाले परिवर्तन के बराबर होता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
न्यूटन के द्वितीय नियम से बल: \(F = \frac{\Delta p}{\Delta t}\)
आपतित प्रकाश का प्रति सेकंड कुल संवेग: \(p_0 = \frac{P}{c}\)
Step 3: Detailed Explanation:
विभिन्न भागों का विश्लेषण:
- अवशोषित भाग (10%):
यह भाग सतह द्वारा पूरी तरह सोख लिया जाता है।
इसके कारण संवेग परिवर्तन की दर:
\[ F_{abs} = 0.1 \times \frac{P}{c} \]
- पारगमित भाग (10%):
यह भाग बिना किसी दिशा परिवर्तन के सतह से पार निकल जाता है।
इसके कारण संवेग में कोई परिवर्तन नहीं होता, अतः:
\[ F_{trans} = 0 \]
- परावर्तित भाग (80%):
शेष भाग (\(100% - 10% - 10% = 80%\)) सतह द्वारा परावर्तित हो जाता है।
चूँकि प्रकाश परावर्तित होकर विपरीत दिशा में लौटता है, संवेग परिवर्तन दोगुना होता है:
\[ F_{ref} = 2 \times \left(0.8 \times \frac{P}{c}\right) = 1.6 \frac{P}{c} \]
कुल बल की गणना:
सतह पर लगने वाला कुल बल सभी बलों का योग होगा:
\[ F = F_{abs} + F_{trans} + F_{ref} = 0.1 \frac{P}{c} + 0 + 1.6 \frac{P}{c} = 1.7 \frac{P}{c} \]
अतः सतह पर लगने वाला कुल बल \(1.7 \frac{P}{c}\) है।
Quick Tip: पूर्ण परावर्तन के मामले में संवेग परिवर्तन दोगुना (\(2p\)) होता है, जबकि पूर्ण अवशोषण में यह केवल \(p\) होता है। पारगमन (transmission) में संवेग परिवर्तन शून्य होता है।
प्रकाश विद्युत प्रभाव के किसी प्रायोगिक अध्ययन में कार्य फलन \(\phi_0\) वाले एक धातु का प्रयोग किया जा रहा है। आपतित फोटॉन का वह लघुतम तरंगदैर्ध्य क्या होगा जिससे कि द्रव्यमान \(m\) वाले उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य, आपतित फोटॉन के दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य के समान हो जाए? [\(h\) प्लांक का स्थिरांक है, \(c\) प्रकाश का वेग है और \(\phi_0 \ll mc^2\)]
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न आधुनिक भौतिकी (Modern Physics), आइंस्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण और दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य (De Broglie Wavelength) के सिद्धांतों पर आधारित है।
Step 2: Key Formula or Approach:
फोटॉन की ऊर्जा: \(E = \frac{hc}{\lambda}\)
आइंस्टीन का समीकरण: \(K_{max} = \frac{hc}{\lambda} - \phi_0\)
इलेक्ट्रॉन का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य: \(\lambda_e = \frac{h}{\sqrt{2mK_{max}}}\)
प्रश्न के अनुसार, हमें \(\lambda_e = \lambda\) रखना है।
Step 3: Detailed Explanation:
समीकरण की स्थापना:
चूँकि \(\lambda_e = \lambda\), हम लिख सकते हैं:
\[ \lambda = \frac{h}{\sqrt{2m\left(\frac{hc}{\lambda} - \phi_0\right)}} \]
दोनों पक्षों का वर्ग करने पर:
\[ \lambda^2 = \frac{h^2}{2m\left(\frac{hc}{\lambda} - \phi_0\right)} \]
\[ \frac{hc}{\lambda} - \phi_0 = \frac{h^2}{2m\lambda^2} \]
द्विघात समीकरण का निर्माण:
माना \(x = \frac{1}{\lambda}\), तो समीकरण निम्न प्रकार होगा:
\[ hc x - \phi_0 = \frac{h^2}{2m} x^2 \]
\[ \frac{h^2}{2m} x^2 - hc x + \phi_0 = 0 \]
पूरे समीकरण को \(\frac{h^2}{2m}\) से भाग देने पर:
\[ x^2 - \frac{2mc}{h} x + \frac{2m\phi_0}{h^2} = 0 \]
\(x\) के लिए हल:
द्विघात सूत्र \(x = \frac{-b \pm \sqrt{b^2 - 4ac}}{2a}\) का उपयोग करने पर:
\[ x = \frac{\frac{2mc}{h} \pm \sqrt{\left(\frac{2mc}{h}\right)^2 - \frac{8m\phi_0}{h^2}}}{2} \]
\[ x = \frac{mc}{h} \left( 1 \pm \sqrt{1 - \frac{2\phi_0}{mc^2}} \right) \]
लघुतम तरंगदैर्ध्य (\(\lambda_{min}\)) के लिए:
तरंगदैर्ध्य \(\lambda = 1/x\) को न्यूनतम करने के लिए, हमें \(x\) को अधिकतम करना होगा।
इसलिए हम धनात्मक चिन्ह (+) चुनेंगे:
\[ x_{max} = \frac{mc}{h} \left( 1 + \sqrt{1 - \frac{2\phi_0}{mc^2}} \right) \]
\[ \lambda_{min} = \frac{h}{mc} \left( 1 + \sqrt{1 - \frac{2\phi_0}{mc^2}} \right)^{-1} \]
अतः न्यूनतम तरंगदैर्ध्य का मान विकल्प (A) के समान प्राप्त होता है।
Quick Tip: न्यूनतम तरंगदैर्ध्य प्राप्त करने के लिए द्विघात समीकरण में हमेशा धनात्मक (+) चिह्न लिया जाता है क्योंकि तरंगदैर्ध्य और \(x = 1/\lambda\) एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।
तीन संख्याएं: (प्रोटॉनों की संख्या, न्यूट्रॉनों की संख्या, त्रिज्या) एक नाभिक की पहचान बताती हैं। \((1, 0, r_1)\) और \((4, 4, r_2)\) से निरूपित दो नाभिकों के लिये \(\frac{r_1}{r_2}\) का मान क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न नाभिकीय भौतिकी (Nuclear Physics) के अंतर्गत नाभिक के आकार और उसकी द्रव्यमान संख्या के संबंध पर आधारित है।
हमें दो अलग-अलग नाभिकों के लिए उनकी त्रिज्याओं का अनुपात ज्ञात करना है।
Step 2: Key Formula or Approach:
नाभिक की त्रिज्या का सूत्र: \(R = R_0 A^{1/3}\)
जहाँ \(A\) द्रव्यमान संख्या (प्रोटॉन की संख्या + न्यूट्रॉन की संख्या) है, और \(R_0\) एक स्थिरांक है।
Step 3: Detailed Explanation:
प्रथम नाभिक के लिए गणना:
दिया गया है: \((1, 0, r_1)\)
प्रोटॉन की संख्या \(Z_1 = 1\)
न्यूट्रॉन की संख्या \(N_1 = 0\)
द्रव्यमान संख्या \(A_1 = Z_1 + N_1 = 1 + 0 = 1\)
त्रिज्या:
\[ r_1 = R_0 (1)^{1/3} = R_0 \]
द्वितीय नाभिक के लिए गणना:
दिया गया है: \((4, 4, r_2)\)
प्रोटॉन की संख्या \(Z_2 = 4\)
न्यूट्रॉन की संख्या \(N_2 = 4\)
द्रव्यमान संख्या \(A_2 = Z_2 + N_2 = 4 + 4 = 8\)
त्रिज्या:
\[ r_2 = R_0 (8)^{1/3} = 2 R_0 \]
अनुपात की गणना:
दोनों त्रिज्याओं का अनुपात लेने पर:
\[ \frac{r_1}{r_2} = \frac{R_0}{2 R_0} = \frac{1}{2} \]
अतः, दोनों नाभिकों की त्रिज्याओं का अनुपात \(\frac{1}{2}\) है।
Quick Tip: नाभिकीय त्रिज्या हमेशा द्रव्यमान संख्या के घनमूल (\(A^{1/3}\)) के समानुपाती होती है। गणना को तेज करने के लिए द्रव्यमान संख्याओं के घनमूलों का सीधा अनुपात लें।
एक जार एकल परमाणु वाली अक्रिय गैसों \(A\) और \(B\) से भरा हुआ है, जिनके कुल द्रव्यमान क्रमशः \(M_A\) और \(M_B\) हैं। \(A\) का मोलर द्रव्यमान \(B\) के मोलर द्रव्यमान का दुगुना है। यदि जार तापमान \(T\) पर रखा हो तो जार पर पड़ रहे कुल दबाव और गैस \(A\) के द्वारा जार पर डाले जा रहे आंशिक दाब का अनुपात क्या होगा?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न गैसों के अणुगति सिद्धांत (Kinetic Theory of Gases) और डाल्टन के आंशिक दाब के नियम (Dalton's Law of Partial Pressures) पर आधारित है।
किसी गैस मिश्रण का कुल दाब प्रत्येक गैस के आंशिक दाबों के योग के बराबर होता है।
Step 2: Key Formula or Approach:
गैस के मोलों की संख्या: \(n = \frac{कुल द्रव्यमान}{मोलर द्रव्यमान} = \frac{M}{m}\)
आंशिक दाब और कुल दाब का संबंध: \(\frac{P_{total}}{P_A} = \frac{n_A + n_B}{n_A} = 1 + \frac{n_B}{n_A}\)
Step 3: Detailed Explanation:
मोलों की संख्या की गणना:
माना गैस \(A\) का मोलर द्रव्यमान \(m_A\) और गैस \(B\) का मोलर द्रव्यमान \(m_B\) है।
दिया गया है कि \(m_A = 2m_B\)।
गैस \(A\) के मोलों की संख्या:
\[ n_A = \frac{M_A}{m_A} \]
गैस \(B\) के मोलों की संख्या:
\[ n_B = \frac{M_B}{m_B} \]
मोलों के अनुपात की गणना:
\[ \frac{n_B}{n_A} = \frac{\frac{M_B}{m_B}}{\frac{M_A}{m_A}} = \frac{M_B}{M_A} \times \frac{m_A}{m_B} \]
चूँकि \(m_A/m_B = 2\), हमें प्राप्त होता है:
\[ \frac{n_B}{n_A} = 2 \frac{M_B}{M_A} \]
दाब के अनुपात की गणना:
डाल्टन के नियमानुसार, आंशिक दाब मोल अंश के समानुपाती होता है:
\[ \frac{P_{total}}{P_A} = 1 + \frac{n_B}{n_A} = 1 + 2 \frac{M_B}{M_A} \]
अतः कुल दाब और गैस \(A\) के आंशिक दाब का अनुपात \(1 + 2 \frac{M_B}{M_A}\) है।
Quick Tip: गैसों के आंशिक दाब का अनुपात उनके मोलों के सीधे समानुपाती होता है। द्रव्यमान को मोलर द्रव्यमान से विभाजित करके पहले मोलों का अनुपात ज्ञात कर लें।
एकसमान रूप से वितरित धनात्मक पृष्ठीय आवेश घनत्व \(\sigma\), \(\sigma\) और \(2\sigma\) वाली तीन सीमारहित समतल चादरें चित्र में प्रदर्शित व्यवस्था के अनुसार एक दूसरे के समानांतर \(d\) दूरी पर रखी हुई हैं। एक \(d/2\) त्रिज्या वाले गोलीय गाउसीय पृष्ठ \(S\) का केन्द्र मध्य में रखी हुई चादर पर स्थित है। गाउसीय पृष्ठ \(S\) के बायें (Left) अर्धगोले से गुजरने वाले वैद्युत फ्लक्स \(\Phi_L\) और दायें (Right) अर्धगोले से गुजरने वाले वैद्युत फ्लक्स \(\Phi_R\) के बारे में निम्न में से कौन सा कथन सही है?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न स्थिरविद्युतिकी (Electrostatics) के अंतर्गत गॉस के नियम (Gauss's Law) और अनंत समतल चादरों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र पर आधारित है।
हमें गाउसीय पृष्ठ के दोनों हिस्सों (बाएं और दाएं) से गुजरने वाले नेट फ्लक्स की तुलना करनी है।
Step 2: Key Formula or Approach:
एक अनंत समतल चादर के कारण विद्युत क्षेत्र: \(E = \frac{\sigma}{2\varepsilon_0}\)
विद्युत फ्लक्स: \(\Phi = \int \mathbf{E} \cdot d\mathbf{A}\)
Step 3: Detailed Explanation:
विद्युत क्षेत्रों की गणना:
तीन चादरें क्रमशः \(x = -d\) (आवेश \(\sigma\)), \(x = 0\) (आवेश \(\sigma\)), और \(x = d\) (आवेश \(2\sigma\)) पर स्थित हैं।
गाउसीय गोला \(S\) त्रिज्या \(R = d/2\) का है और इसका केंद्र \(x = 0\) पर है।
यह गोला पूरी तरह से \(x = -d/2\) से \(x = d/2\) के बीच स्थित है।
- बाएँ अर्धगोले के क्षेत्र में विद्युत क्षेत्र (\(-d/2 < x < 0\)):
बाईं चादर (\(x = -d\)) के कारण क्षेत्र: \(+x\) दिशा में, मान \(\frac{\sigma}{2\varepsilon_0}\)
मध्य चादर (\(x = 0\)) के कारण क्षेत्र: \(-x\) दिशा में, मान \(\frac{\sigma}{2\varepsilon_0}\)
दाईं चादर (\(x = d\)) के कारण क्षेत्र: \(-x\) दिशा में, मान \(\frac{2\sigma}{2\varepsilon_0}\)
कुल विद्युत क्षेत्र \(\mathbf{E}_L\):
\[ \mathbf{E}_L = \left( \frac{\sigma}{2\varepsilon_0} - \frac{\sigma}{2\varepsilon_0} - \frac{2\sigma}{2\varepsilon_0} \right) \hat{i} = -\frac{\sigma}{\varepsilon_0} \hat{i} \]
- दाएँ अर्धगोले के क्षेत्र में विद्युत क्षेत्र (\(0 < x < d/2\)):
बाईं चादर (\(x = -d\)) के कारण क्षेत्र: \(+x\) दिशा में, मान \(\frac{\sigma}{2\varepsilon_0}\)
मध्य चादर (\(x = 0\)) के कारण क्षेत्र: \(+x\) दिशा में, मान \(\frac{\sigma}{2\varepsilon_0}\)
दाईं चादर (\(x = d\)) के कारण क्षेत्र: \(-x\) दिशा में, मान \(\frac{2\sigma}{2\varepsilon_0}\)
कुल विद्युत क्षेत्र \(\mathbf{E}_R\):
\[ \mathbf{E}_R = \left( \frac{\sigma}{2\varepsilon_0} + \frac{\sigma}{2\varepsilon_0} - \frac{2\sigma}{2\varepsilon_0} \right) \hat{i} = 0 \]
फ्लक्स की तुलना:
चूँकि दाएँ क्षेत्र में विद्युत क्षेत्र शून्य है (\(\mathbf{E}_R = 0\)), इसलिए दाएँ अर्धगोले से गुजरने वाला फ्लक्स \(\Phi_R = 0\) होगा।
बाएँ क्षेत्र में एक गैर-शून्य विद्युत क्षेत्र (\(\mathbf{E}_L = -\frac{\sigma}{\varepsilon_0} \hat{i}\)) बाहर की ओर कार्य कर रहा है, जिससे बाएँ अर्धगोले से गुजरने वाला फ्लक्स \(\Phi_L > 0\) होगा।
अतः, \(\Phi_L > \Phi_R\) है।
Quick Tip: अनंत समतल चादरों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र दूरी पर निर्भर नहीं करता। इसलिए, विभिन्न क्षेत्रों में सीधे दिशाओं को ध्यान में रखकर विद्युत क्षेत्रों का सदिश योग करें।
क्षमताओं \(\eta_1\) एवं \(\eta_2\) वाले दो कार्नो इंजनों का विचार करें। पहला इंजन एक ऊष्मा भण्डार \(A\) से ऊष्मा \(Q_1\) ले कर एक ऊष्मा भण्डार \(B\) में ऊष्मा \(Q_2\) निर्गत करता है। दूसरा इंजन \(B\) से ऊष्मा \(Q_2\) लेता है और एक ऊष्मा भण्डार \(C\) में ऊष्मा \(Q_3\) निर्गत करता है। यदि \(Q_1 > Q_2 > Q_3\) हों, तो कार्नो इंजनों के इस युग्म की कुल क्षमता क्या होगी?
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Step 1: Understanding the Question:
यह प्रश्न ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के अंतर्गत कार्नो इंजन (Carnot Engine) की दक्षता (Efficiency) और इंजनों के श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination) पर आधारित है।
Step 2: Key Formula or Approach:
इंजन की दक्षता: \(\eta = 1 - \frac{Q_{out}}{Q_{in}}\)
दो इंजनों के संयोजन की कुल दक्षता: \(\eta_{net} = 1 - \frac{Q_3}{Q_1}\)
Step 3: Detailed Explanation:
प्रथम इंजन के लिए:
यह इंजन ऊष्मा \(Q_1\) लेता है और \(Q_2\) निर्गत करता है।
दक्षता:
\[ \eta_1 = 1 - \frac{Q_2}{Q_1} \implies \frac{Q_2}{Q_1} = 1 - \eta_1 \]
द्वितीय इंजन के लिए:
यह इंजन ऊष्मा \(Q_2\) लेता है और \(Q_3\) निर्गत करता है।
दक्षता:
\[ \eta_2 = 1 - \frac{Q_3}{Q_2} \implies \frac{Q_3}{Q_2} = 1 - \eta_2 \]
कुल दक्षता की गणना:
पूरे तंत्र के लिए कुल दक्षता:
\[ \eta_{net} = 1 - \frac{Q_3}{Q_1} \]
हम लिख सकते हैं:
\[ \frac{Q_3}{Q_1} = \frac{Q_3}{Q_2} \times \frac{Q_2}{Q_1} \]
मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
\[ \frac{Q_3}{Q_1} = (1 - \eta_2)(1 - \eta_1) = 1 - \eta_1 - \eta_2 + \eta_1\eta_2 \]
अब कुल दक्षता के सूत्र में मान रखने पर:
\[ \eta_{net} = 1 - \left( 1 - \eta_1 - \eta_2 + \eta_1\eta_2 \right) \]
\[ \eta_{net} = \eta_1 + \eta_2 - \eta_1\eta_2 \]
अतः, पूरे युग्म की कुल दक्षता \(\eta_1 + \eta_2 - \eta_1\eta_2\) होगी।
Quick Tip: श्रेणीक्रम में जुड़े दो इंजनों की संयुक्त दक्षता हमेशा व्यक्तिगत दक्षताओं के योग से कुछ कम होती है। सूत्र \(\eta = \eta_1 + \eta_2 - \eta_1\eta_2\) को सीधे याद रखा जा सकता है।
IISER IAT 2026 Exam Pattern
| Parameter | Details |
|---|---|
| Exam Mode | Computer-Based Test (CBT) |
| Exam Duration | 3 hours; 4 hours for PwD (40%+ disability) |
| Language | Bilingual- English and Hindi |
| Total Questions | 60 MCQs |
| Total Marks | 240 |
| Question Type | Single-correct MCQs only |
| Marks per Correct Answer | +4 |
| Negative Marking | −1 per wrong answer |
| Unattempted Questions | 0 marks |








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